Explainer: क्या आपकी थाली का चावल बढ़ा रहा है धरती का तापमान? वैज्ञानिकों ने बताई बड़ी वजह
Global Warming: दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी का पेट भरने वाला चावल अब हमारी धरती के स्वास्थ्य के लिए एक बड़ा खतरा बनता जा रहा है. हम रोज जिस चावल को बड़े चाव से खाते हैं, उसकी खेती अब जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ाने में बहुत बड़ी भूमिका निभा रही है. एक नए और चौंकाने वाले अध्ययन में यह बात सामने आई है कि धान के खेतों से निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसों का स्तर पिछले 65 वर्षों में बढ़कर दोगुना हो चुका है. यह स्थिति पर्यावरण के लिए बेहद चिंताजनक है क्योंकि वर्तमान में यह उत्सर्जन सालाना 1.1 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर के आंकड़े को छू चुका है.
वैज्ञानिकों ने बताई बड़ी वजह
अमेरिका के मशहूर बोस्टन कॉलेज के शोधकर्ताओं ने यह महत्वपूर्ण अध्ययन किया है, जिसे विज्ञान जगत की प्रतिष्ठित पत्रिका 'नेचर फूड' जर्नल में जगह मिली है. इस शोध में साफ तौर पर बताया गया है कि साल 2001 से लेकर 2020 के बीच के दो दशकों में पूरे एशिया महाद्वीप में चावल के उत्पादन के कारण ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी दर्ज की गई है.
धान के खेत ग्लोबल वार्मिंग से कैसे जुड़े?
आखिरकार धान की खेती से पर्यावरण को इतना नुकसान कैसे पहुंच रहा है, इसे समझना बहुत जरूरी है. वैज्ञानिकों ने अपनी रिपोर्ट में विस्तार से समझाया है कि धान की फसल को तैयार करने के लिए खेतों को लंबे समय तक पानी से भरकर जलमग्न रखना पड़ता है. जब यह खेत पानी से पूरी तरह भरे रहते हैं, तो वहां की मिट्टी में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है. ऐसी स्थिति में वहां मौजूद बैक्टीरिया बड़ी मात्रा में मीथेन गैस पैदा करने लगते हैं. इसके साथ ही इन खेतों से नाइट्रस ऑक्साइड गैस भी बाहर निकलती है.
यह दोनों ही गैसें कार्बन डाइऑक्साइड के मुकाबले वातावरण में गर्मी को रोकने में कहीं ज्यादा खतरनाक और असरदार होती हैं. यह गैसें हमारे वायुमंडल में एक मोटी परत बना लेती हैं जो सूरज की गर्मी को वापस अंतरिक्ष में जाने से रोक देती है. इसके कारण धरती का तापमान लगातार बढ़ रहा है और ग्लोबल वार्मिंग का खतरा गहराता जा रहा है.
दुनिया में धान की खेती से कितना बढ़ रहा है प्रदूषण?
इस पूरे मामले को गहराई से समझने के लिए शोध दल के प्रमुख और बोस्टन कॉलेज के प्रोफेसर हानक्विन तियान की देखरेख में एक बड़ा विश्लेषण किया गया. इस शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने 21 हजार से भी ज्यादा क्षेत्रीय आंकड़ों को खंगाला. इसके साथ ही इस काम में आधुनिक मशीन लर्निंग तकनीक और वैश्विक स्तर के विश्लेषण का सहारा लिया गया ताकि नतीजे पूरी तरह सटीक आ सकें.
इस तकनीक से सामने आए नतीजों से पता चला है कि पूर्वी एशिया के देशों में मीथेन का उत्सर्जन सबसे ज्यादा दर्ज किया गया है. वहीं दूसरी तरफ, अफ्रीका महाद्वीप में अब धान की खेती का चलन बहुत तेजी से बढ़ रहा है, जिसके कारण वह भी अब इस मामले में एक नया हॉटस्पॉट बनकर उभर रहा है. साल 2001 से 2020 के आंकड़ों को देखें तो दुनिया भर में धान के खेतों से होने वाले कुल उत्सर्जन में अकेले एशिया की हिस्सेदारी 90 प्रतिशत से भी ज्यादा रही है. इसमें भी दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों का योगदान सबसे आगे पाया गया है.
मीथेन गैस क्यों है इतनी खतरनाक?
मीथेन जमीनी-स्तर के ओजोन के बनने में मुख्य भूमिका निभाती है. यह एक खतरनाक वायु प्रदूषक और ग्रीनहाउस गैस है, जिसके संपर्क में आने से हर साल 10 लाख लोगों की समय से पहले मौत हो जाती है. मीथेन एक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस भी है. 20 साल की अवधि में, यह कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में 80 गुना ज्यादा गर्मी पैदा करती है.
औद्योगिक काल से पहले के समय से अब तक ग्लोबल वार्मिंग में मीथेन का योगदान लगभग 30 प्रतिशत रहा है, और 1980 के दशक में रिकॉर्ड रखना शुरू होने के बाद से यह किसी भी अन्य समय की तुलना में तेजी से बढ़ रही है. असल में, यूनाइटेड स्टेट्स नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन के आंकड़ों के अनुसार, 2020 में महामारी से जुड़े लॉकडाउन के दौरान जब कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन की गति धीमी हुई, तब भी वायुमंडलीय मीथेन का स्तर तेजी से बढ़ गया.
खेती के विस्तार से बढ़ी मुसीबत
शोधकर्ताओं ने अपनी रिपोर्ट में इस बात का भी अंदेशा जताया है कि आने वाले समय में चावल की खेती का दायरा और ज्यादा फैलने वाला है. आंकड़ों के अनुसार, साल 2015 में दुनिया भर में करीब 39.7 करोड़ एकड़ जमीन पर धान उगाया जा रहा था, जिसके साल 2024 तक बढ़कर 42.6 करोड़ एकड़ तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया है.
इस बढ़ते उत्सर्जन के पीछे मुख्य रूप से दो बड़ी वजहें काम कर रही हैं. पहली वजह यह है कि विकासशील देशों में आबादी की भोजन संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए धान की खेती का बहुत तेजी से विस्तार किया जा रहा है. दूसरी बड़ी वजह यह है कि आजकल किसान फसल की कटाई के बाद बचे हुए अवशेषों को पानी से भरे खेतों में ही वापस मिला देते हैं. जब यह अवशेष पानी के अंदर सड़ते हैं, तो इनसे मीथेन गैस बनने की रफ्तार कई गुना ज्यादा बढ़ जाती है.
भारत के लिए क्यों बड़ी चुनौती है यह मुद्दा?
भारत में धान की खेती अब बड़ी चुनौती बनती जा रही है. इसकी सबसे बड़ी वजह पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ता दबाव है. धान की फसल को बहुत अधिक पानी चाहिए, जिससे खासकर पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में भूजल तेजी से घट रहा है. कई इलाकों में जलस्तर हर साल करीब 0.7 मीटर नीचे जा रहा है.
धान आधारित खेती का असर सिर्फ पानी तक सीमित नहीं है. हर साल करीब 9.2 करोड़ टन पराली जलाने से दिल्ली-एनसीआर में सर्दियों के दौरान प्रदूषण और स्मॉग बढ़ता है. वहीं, जरूरत से ज्यादा यूरिया इस्तेमाल करने से मिट्टी की गुणवत्ता खराब हो रही है और पानी भी दूषित हो रहा है. विशेषज्ञों के अनुसार, धान के खेत देश के कुल मीथेन उत्सर्जन का लगभग 11% हिस्सा पैदा करते हैं. तापमान में 1 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी से धान की पैदावार करीब 6% तक घट सकती है. बिहार और पश्चिम बंगाल के कुछ इलाकों में भूजल में आर्सेनिक की मात्रा भी चिंता बढ़ा रही है.
क्या धान की खेती बंद करनी पड़ेगी?
इस गंभीर समस्या के बीच वैज्ञानिकों ने राहत की बात भी बताई है. शोध की सह-लेखिका और इंजीनियरिंग की प्रोफेसर सुसान पैन का कहना है कि हमें चावल का उत्पादन कम करने की बिल्कुल जरूरत नहीं है. अगर किसान खेती के कुछ बेहतर और वैज्ञानिक तरीकों को अपना लें, तो बिना पैदावार घटाए भी इस खतरनाक उत्सर्जन में करीब 10 प्रतिशत तक की कमी आसानी से लाई जा सकती है.
वैज्ञानिक क्या समाधान बता रहे हैं?
इसके लिए सबसे पहला कदम यह उठाना होगा कि खेतों में लगातार पानी भरकर रखने के बजाय पानी का बेहतर प्रबंधन किया जाए. खेतों को बीच-बीच में सुखाया जा सकता है जिससे मीथेन बनाने वाले बैक्टीरिया पनप न पाएं. इसके अलावा फसल के अवशेषों का संतुलित तरीके से निस्तारण करना होगा और खेतों में उर्वरकों यानी खादों का अधिक प्रभावी और सीमित उपयोग करना होगा. यह सभी ऐसे व्यावहारिक उपाय हैं जिन्हें आम किसान बहुत आसानी से अपने खेतों में लागू कर सकते हैं. ऐसा करके हम अपनी थाली के स्वाद को बनाए रखने के साथ-साथ अपनी धरती को भी सुरक्षित रख सकते हैं.
उत्तर भारत में गर्मी से राहत, आंधी-बारिश का अलर्ट; अगले दो दिनों में गिरेगा तापमान
नई दिल्ली, 28 मई (आईएएनएस)। भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने उत्तर-पश्चिम भारत में जारी भीषण और गंभीर लू से राहत मिलने की संभावना जताई है। मौसम विभाग के अनुसार गुरुवार से क्षेत्र के अधिकांश हिस्सों में तापमान में गिरावट शुरू होगी, जबकि राजस्थान, विदर्भ और पूर्वी मध्य प्रदेश के कुछ इलाकों में अगले कुछ दिनों तक गर्मी का असर बना रह सकता है।
आईएमडी के ताजा बुलेटिन के मुताबिक 28 से 30 मई के बीच उत्तर-पश्चिम भारत में अधिकतम तापमान में 6 से 8 डिग्री सेल्सियस तक की कमी आने की संभावना है। इसके बाद तापमान में हल्की बढ़ोतरी हो सकती है।
पिछले 24 घंटों के दौरान राजस्थान के श्रीगंगानगर में अधिकतम तापमान 48.2 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। पश्चिमी राजस्थान के कई इलाकों के अलावा उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली और पूर्वी मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में लू की स्थिति बनी रही।
मौसम विभाग ने बताया कि पश्चिमी विक्षोभ और सक्रिय मानसूनी प्रणालियों के प्रभाव से मौसम में बड़ा बदलाव आने वाला है। 28 से 31 मई के बीच उत्तर-पश्चिम, मध्य और पूर्वी भारत के कई हिस्सों में मध्यम से तीव्र गरज-चमक के साथ आंधी और बारिश होने की संभावना है।
पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में 28 और 29 मई को 60 से 80 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तेज हवाएं चल सकती हैं। कुछ स्थानों पर हवा की गति 100 किलोमीटर प्रति घंटे तक पहुंचने की आशंका है। इसके साथ ही बिजली गिरने और ओलावृष्टि की भी संभावना जताई गई है।
पूर्वोत्तर भारत, ओडिशा, गंगा के मैदानी पश्चिम बंगाल, बिहार तथा दक्षिण भारत के तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक के कुछ हिस्सों में अगले कुछ दिनों के दौरान भारी बारिश हो सकती है।
आईएमडी के अनुसार दक्षिण-पश्चिम मानसून अरब सागर, बंगाल की खाड़ी और लक्षद्वीप के कुछ और हिस्सों तक आगे बढ़ चुका है। अगले दो से तीन दिनों में इसके और आगे बढ़ने के लिए परिस्थितियां अनुकूल बनी हुई हैं।
दिल्ली-एनसीआर में 28 मई की शाम तक आंशिक रूप से बादल छाए रहने के बाद मौसम पूरी तरह बदल सकता है। हल्की बारिश, गरज-चमक और 70 किलोमीटर प्रति घंटे तक की रफ्तार से तेज हवाएं चलने का अनुमान है।
मौसम विभाग ने कहा कि राजधानी में अधिकतम तापमान 29 मई को 35 से 37 डिग्री सेल्सियस और 30 मई को 34 से 36 डिग्री सेल्सियस के बीच रह सकता है। इससे पिछले कई दिनों से पड़ रही 44 से 46 डिग्री सेल्सियस की भीषण गर्मी से लोगों को राहत मिलेगी।
आईएमडी ने तेज आंधी, बिजली गिरने और तेज हवाओं से पेड़ों, बिजली लाइनों तथा कमजोर ढांचों को नुकसान पहुंचने की चेतावनी जारी की है। लोगों को खराब मौसम के दौरान घरों के अंदर रहने, पेड़ों के नीचे शरण न लेने और बिजली के उपकरणों को सुरक्षित रखने की सलाह दी गई है।
किसानों से भी खड़ी फसलों और कटे हुए कृषि उत्पादों को सुरक्षित स्थान पर रखने का आग्रह किया गया है। मौसम विभाग का कहना है कि मानसून की प्रगति के साथ देश के बड़े हिस्से में तापमान में कमी और बारिश की गतिविधियां बढ़ेंगी, हालांकि स्थानीय स्तर पर बाढ़, ओलावृष्टि और तेज हवाओं के खतरे को देखते हुए सतर्क रहने की जरूरत है।
--आईएएनएस
डीएससी
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
होम
जॉब
पॉलिटिक्स
बिजनेस
ऑटोमोबाइल
गैजेट
लाइफस्टाइल
फोटो गैलरी
Others 
News Nation