न्यूजीलैंड में अमेरिका से आधे खर्च में पढ़ाई:भारतीय छात्र 1 साल में 33% बढ़े, छात्रों को पढ़ाई के बाद 3 साल का वर्क वीजा भी
अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की सख्ती और वहां महंगी पढ़ाई से भारतीय छात्र नए देश तलाश रहे हैं। न्यूजीलैंड भारतीय छात्रों का पसंदीदा देश बना है। यहां अमेरिका के मुकाबले लगभग आधे खर्च में पढ़ाई और फिर बाद में 3 साल का वर्क वीजा मिलता है। इसके कारण यहां 1 साल में भारतीय छात्रों की संख्या में 33% बढ़ी है। ऑफर... 4 यूनिवर्सिटी में मेरिट से स्कॉलरशिप न्यूजीलैंड में 4 यूनिवर्सिटी- वाइकातो, कैंटरबरी, विक्टोरिया और वेलिंगटन में मेरिट बेस से भारतीय स्टूडेंट्स को फुल स्कॉलरशिप का ऑफर भी शुरू किया गया है। एनजेड स्कॉलरशिप: पीएचडी वाले भारतीय छात्रों के लिए 14 लाख रुपए तक की फीस माफी। साथ ही हेल्थ इंश्योरेंस कवर भी मुफ्त में उपलब्ध कराया जाता है। कॉमनवेल्थ स्कॉलरशिप: फीस, रहन-सहन, यात्रा कवर। साप्ताहिक भत्ता भी। एक्सीलेंस अवॉर्ड: साढ़े 5 लाख रुपए की एकमुश्त राशि छात्रों को दी जाती है। हाई अचीवर्स स्कॉलरशिप: मेधावी भारतीय छात्रों को फीस में 11 लाख छूट। राहत...यहां इमिग्रेशन फोर्स की धरपकड़ का डर नहीं वेलिंगटन में रहने वाले छात्र आकाश का कहना है कि न्यूजीलैंड में इमिग्रेशन फोर्स का खतरा नहीं होता है। आकाश का कहना है कि अमेरिका में रहने वाले उनके साथी छात्र बताते हैं कि कैसे इमिग्रेशन की धरपकड़ का डर रहता है। भारतीय छात्रों को वहां हमेशा अपने वीसा, पासपोर्ट और अन्य डॉक्यूमेंट्स साथ रखने पड़ते हैं। स्टूडेंट ट्रैकर आईसीईएफ के अनुसार 2025 में 12 हजार छात्रों की तुलना में इस साल जुलाई दाखिले में ये संख्या 16 हजार पहुंचेगी। अमेरिका में फीस, कॉस्ट ऑफ लिविंग व हेल्थ इंश्योरेंस का खर्च 85 लाख रुपए पड़ता है। इसकी तुलना में न्यूजीलैंड में ये खर्च लगभग 44 लाख रुपए ही बैठता है। गारंटी... पार्टटाइम और फुलटाइम जॉब आसान ऑकलैंड यूनिवर्सिटी के छात्र गौरव शर्मा कहते हैं कि न्यूजीलैंड में पढ़ाई के दौरान पार्ट टाइम जॉब भी आसानी से मिल जाती है। छात्र हर हफ्ते 25 घंटे काम कर सकता है। पढ़ाई पूरी होने के बाद न्यूजीलैंड में हेल्थकेयर, आईटी, कंस्ट्रक्शन और एग्री सेक्टर की ग्रीन लिस्ट में ढेरों जॉब ऑफर होते हैं।
नेपाल PM बालेन सोमवार को पहले भारतीय राजदूत से मिलेंगे:बाद में चीन के दूत से बात होगी, अगले दिन अमेरिकी अधिकारी से वन-टू-वन बैठक
नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह सोमवार को सबसे पहले भारत के राजदूत नवीन श्रीवास्तव से मुलाकात करेंगे। इसके बाद वे चीन के राजदूत झांग माओमिंग से बातचीत करेंगे। मंगलवार को शाह अमेरिकी दूतावास के प्रभारी अधिकारी स्कॉट अर्बोम से वन-टू-वन बैठक करेंगे। काठमांडू पोस्ट के मुताबिक, प्रधानमंत्री बनने के बाद यह पहली बार होगा, जब शाह किसी विदेशी राजदूत से अकेले में मिलेंगे। इससे पहले वे विदेशी राजदूतों के साथ सामूहिक बैठकों को प्राथमिकता देते रहे थे। इन बैठकों में नेपाल के भारत, चीन और अमेरिका के साथ रिश्तों और मौजूदा मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है। दो हफ्ते पहले होनी थी मुलाकात, हिंसा के बाद टली शाह की इन राजनयिकों से मुलाकात करीब दो हफ्ते पहले तय थी, लेकिन सुनसरी और दूसरे जिलों में हुई सांप्रदायिक हिंसा के बाद इसे टाल दिया गया था। अब सरकार ने दोबारा बैठकें तय की हैं। प्रधानमंत्री के एक सलाहकार के मुताबिक, संबंधित दूतावासों को मुलाकात का समय बता दिया गया है। पहले विदेशी अधिकारियों से अकेले नहीं मिलते थे शाह प्रधानमंत्री बनने के शुरुआती दौर में शाह ने विदेश मंत्री के स्तर से नीचे के विदेशी अधिकारियों से वन-टू-वन मुलाकात नहीं करने की नीति अपनाई थी। इसी वजह से भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिस्री की 11-12 मई की नेपाल यात्रा भी विवादों के बीच टल गई थी। नेपाली अधिकारियों के मुताबिक, शाह का मिस्री से अकेले में मिलने से इनकार भी इसकी वजहों में शामिल था। शाह ने अमेरिकी अधिकारियों समीर पॉल कपूर और सर्जियो गोर से मुलाकात के अनुरोध भी स्वीकार नहीं किए थे। अमेरिकी विदेश विभाग की अंडर सेक्रेटरी सारा बी. रोजर्स भी नेपाल दौरे पर आई थीं, लेकिन उनकी शाह से मुलाकात नहीं हो सकी थी। इसके बजाय शाह ने 9 अप्रैल और 26 मई को काठमांडू में तैनात कई देशों के राजदूतों के साथ सामूहिक बैठकें की थीं। अब क्यों बदल रही है शाह की नीति? शाह की सामूहिक बैठकों की नीति को नेपाल के कई राजनयिकों और विदेश नीति के जानकारों ने संतुलित कदम बताया था। उनका मानना था कि इससे किसी एक देश को ज्यादा तवज्जो देने का संदेश नहीं जाता और सभी देशों के साथ बराबरी का व्यवहार दिखता है। लेकिन सरकार के 100 दिन पूरे होने के बाद शाह के सलाहकारों ने उन्हें घरेलू और विदेशी स्तर पर अलग-अलग लोगों से मिलने की सलाह दी। इसके बाद शाह ने मधेश के राजनीतिक दलों और सांसदों के साथ-साथ कारोबारियों, उद्योगपतियों, ठेकेदारों और निर्यातकों से भी अलग-अलग मुलाकातें शुरू कीं। अब विदेशी राजदूतों से वन-टू-वन बातचीत भी इसी बदली हुई रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है
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