क्या रात में फहरा सकते हैं तिरंगा? घर की बालकनी में झंडा लगाने से पहले जान लें नियम
Har Ghar Tiranga 2026: भारत इस बार अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मनाने जा रहा है. देशभर में 15 अगस्त को आजादी का जश्न मनाया जाएगा. पीएम मोदी ने इस खास मौके पर देशवासियों आजादी के इस जश्न में पूरे उत्साह के साथ भाग लेने का आह्वान किया है. लेकिन इससे पहले देशभर में हर घर तिरंगा अभियान चलाया जा रहा है. जिसकी शुरुआत 9 अगस्त से की गई थी. ये अभियान 17 अगस्त तक चलेगा. इस अभियान में पूरा देश भाग ले रहा है.
इस अभियान के तहत लोगों को अपने घर पर तिरंगा फहराना होता है. हालांकि तिरंगा फहराने से पहले आपको कुछ जरूरी नियम भी जान लेने चाहिए. जो आपको जानना जरूरी हैं. क्योंकि तिरंगा फहराने से लेकर उतारने तक कुछ नियमों का पालन करना जरूरी होता है. हर घर तिरंगा अभियान के तहत अगर आप तिरंगे के साथ सेल्फी पोस्ट करते हैं, तो आपको सर्टिफिकेट भी मिलेगा. ऐसे में हम आपको बताते हैं कि तिरंगा लगाने के नियम क्या है क्या रात में भी तिरंगा फहराया जा सकता है और घर पर तिरंगा फहराने के नियम क्या हैं.
क्या है इस बार हर घर तिरंगा अभियान की थीम?
बता दें कि 'हर घर तिरंगा' भारत सरकार का एक राष्ट्रव्यापी अभियान है. जिसकी शुरुआत 'आजादी का अमृत महोत्सव' के तहत की गई थी. इस बार के अभियान की खासियत ये है कि इस बार ये राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' को समर्पित किया गया है. इसकी थीम वंदे मातरम की भावना है. बता दें कि भारत इस साल ‘वंदे मातरम’ की रचना के 150वें वर्ष का भी उत्सव मना रहा है.
क्या रात में फहराया जा सकता है तिरंगा?
बता दें कि 2022 में भारतीय ध्वज संहिता 2002 में किए गए संशोधन के बाद नागरिकों को रात में तिरंगा फहराने की अनुमति दी गई है. हालांकि पहले नियम था कि तिरंगा सिर्फ सूर्योदय से सूर्यास्त तक ही फहराया जा सकता है. लेकिन बाद में ये नियम बदल दिया गया. यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि रात में तिरंगा फहराने के लिए उचित रोशनी की व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि झंडा स्पष्ट रूप से दिखाई दे और उसकी गरिमा बनी रहे.
तिरंगा फहराने और क्या है नियम
1. तिरंगा फहराने के अन्य नियमों के मुताबिक, तिरंगे का केसरिया रंग हमेशा ऊपर और हरा रंग नीचे होना चाहिए. उल्टा तिरंगा फहराना अपमान माना जाता है.
2. इसके अलावा झंडा कटा-फटा, गंदा, या फीका नहीं होना चाहिए और ना ही इसे जमीन में रखा जाता है ना ही झुकाया जाता है तिरंगा को हमेशा अन्य झंडों से ऊंचा रखना चाहिए.
3. छत पर तिरंगा फहराते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि वह सम्मानजनक स्थान पर हो और हवा में स्वतंत्र रूप से लहरा सके. तिरंगे का उपयोग सजावट, परदा, या कपड़े के रूप में नहीं किया जा सकता.
4. इसके साथ ही झंडे को पानी में नहीं डुबाया जाना चाहिए. गंदा या फटा होने पर तिरंगे के सम्मान को ठेस पहुंचा माना जाता है.
5. तिरंगे का हमेशा सम्मान करें, इसके साथ ही आप अपने घर, ऑफिस, कॉलेज, स्कूल कहीं पर भी तिरंगा फहरा सकेत हैं लेकिन इसके सम्मान का पूरा ध्यान रखना चाहिए. घर घर तिरंगा अभियान के दौरान 9 अगस्त से 17 अगस्त के बीच तिरंगा झंडा घर पर फहराकर आप भी इस अभियान का हिस्सा बन सकते हैं.
6. अगर आप अपने घर की छत या बालकनी में तिरंगा फहरा रहे तो इस बात का ध्यान रखना होगा कि तिरंगा पानी में न भीगे.
7. अगर आप खुद से ही तिरंगा बनवाकर फहरा रहे हैं तो इस बात का ध्यान रखें कि तिरंगे का कपड़ा सही हो. तिरंगे का कपड़ा हमेशा सूती, पॉलिएस्टर, ऊन, सिल्क या खादी का होना चाहिए. तिरंगे का इस्तेमाल कपड़ों के रूप में या सजावट के लिए नहीं करना चाहिए.
8. इसके अलावा तिरंगे के आकार का भी ध्यान रखना चाहिए. क्योंकि कई लोग तिरंगा घर पर बनाकर ही फहराते हैं, ऐसे में उसके सही आकार का ध्यान नहीं रखते. बता दें कि राष्ट्रीय ध्वज आयताकार होना चाहिए. इसकी लंबाई और ऊंचाई यानी चौड़ाई का अनुपात 3:2 होना चाहिए.
9. अगर रात में तिरंगा फहरा रहे हैं तो इस बात का ध्यान रखें कि उस स्थान पर हल्की रोशनी होनी चाहिए.
10. तिरंगा फहराते वक्त इस बात का भी ध्यान रखें कि अशोक चक्र दिखना चाहिए. इसलिए तिरंगे को हमेशा ऐसे स्थान पर फहराएं कि जहां उस पर हवा लगने पर उड़े और अशोक चक्र साफ दिखाई दे. अशोक चक्र के डिजाइन या स्वरूप में भी किसी तरह की गलती नहीं होनी चाहिए.
विश्व अंग दान दिवस : 'जिंदगी के सफर में' विराम से भी संभव जीवनदान...
नई दिल्ली, 12 अगस्त (आईएएनएस)। सांसें थम जाने के बाद भी अगर किसी इंसान के अंग किसी जरूरतमंद के शरीर में मौजूद रहें, तो यह इंसानियत की एक बड़ी मिसाल है। अगर कोई अंग दान करता है, तो यह कई परिवारों को मुस्कुराने का मौका दे सकता है।
इसी संदेश के साथ हर साल 13 अगस्त को विश्व अंगदान दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन को मनाने का मकसद अंगदान के प्रति जागरूकता बढ़ाने के साथ-साथ उन तमाम मिथकों और गलतफहमियों को दूर करना भी है, जो किसी जरूरतमंद तक जीवन पहुंचने की राह में बाधा बनते हैं।
अंगदान वह प्रक्रिया है, जिसमें किसी व्यक्ति की सहमति और निर्धारित कानूनी-चिकित्सकीय प्रक्रिया के तहत उसके स्वस्थ अंग या ऊतक किसी ऐसे मरीज को प्रत्यारोपित किए जाते हैं, जिसका संबंधित अंग काम नहीं कर रहा हो। परिस्थितियों के अनुसार जीवित व्यक्ति भी कुछ अंगों या अंग के हिस्से का दान कर सकता है, जबकि मृत्यु के बाद भी उपयुक्त अंगों और ऊतकों का दान संभव है। गुर्दा, हृदय, फेफड़े, आंखों समेत कई अंग गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों को नया जीवन दे सकते हैं।
कुछ परिस्थितियों में एक दाता से प्राप्त अंगों और ऊतकों से कई लोगों की जिंदगी बचाने या उनके जीवन की गुणवत्ता बेहतर करने में मदद मिल सकती है। अक्सर कहा जाता है कि एक अंगदाता आठ लोगों तक की जान बचाने में योगदान दे सकता है, हालांकि वास्तविक संख्या दाता की चिकित्सकीय स्थिति और उपलब्ध अंगों पर निर्भर करती है।
किडनी, लिवर, हृदय, फेफड़े जैसे महत्वपूर्ण अंगों के खराब हो जाने पर कई मरीजों के सामने प्रत्यारोपण ही जीवन बचाने का विकल्प रह जाता है। समस्या यह है कि जरूरतमंद मरीजों की संख्या और उपलब्ध अंगों के बीच बड़ा अंतर है। यही वजह है कि अंगदान के लिए स्वैच्छिक रूप से आगे आना बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। केवल इच्छा जताना ही नहीं, बल्कि अपने परिवार को भी अपनी इच्छा के बारे में बताना जरूरी है, ताकि जरूरत पड़ने पर परिवार उस निर्णय को समझ सके और उसका सम्मान कर सके।
भारत में सरकार और स्वास्थ्य संस्थाओं की ओर से अंगदान को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। राष्ट्रीय अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन देश में अंग और ऊतक दान तथा प्रत्यारोपण की व्यवस्था को समन्वित करने वाली महत्वपूर्ण संस्था है।
अंगदान के संदर्भ में सड़क दुर्घटनाओं और गंभीर मस्तिष्क चोटों का भी विशेष महत्व है, क्योंकि कुछ मामलों में ब्रेनडेड के बाद व्यक्ति के स्वस्थ अंगों का दान संभव हो सकता है। ब्रेनडेड की स्थिति में चिकित्सकीय और कानूनी मानकों के अनुसार अंगदान की संभावना पैदा हो सकती है। यही वह क्षेत्र है, जहां जागरूकता, प्रशिक्षित चिकित्सा व्यवस्था और परिवार की सहमति महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
अंग प्रत्यारोपण का इतिहास इंसानी संवेदना और चिकित्सा विज्ञान के अद्भुत मेल की कहानी भी है। रोनाल्ड ली हेरिक ने वर्ष 1954 में अपने जुड़वां भाई रिचर्ड हेरिक को एक किडनी दान की थी। इस ऐतिहासिक प्रत्यारोपण को डॉक्टर जोसेफ मरे और उनकी टीम ने अंजाम दिया। यह सफल जीवित-दाता किडनी प्रत्यारोपण चिकित्सा इतिहास में मील का पत्थर बना। बाद में डॉ. जोसेफ मरे को अंग और कोशिका प्रत्यारोपण से संबंधित उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए 1990 में शरीर क्रिया विज्ञान या चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया।
13 अगस्त को विश्व स्तर पर अंगदान के प्रति जागरूकता से जुड़ा दिवस मनाया जाता है। भारत ने अंगदान और प्रत्यारोपण के लिए कानूनी और संस्थागत व्यवस्था भी विकसित की है। अंगदान को लेकर सबसे बड़ी गलतफहमियों में से एक यह है कि इसके लिए केवल युवा और पूरी तरह स्वस्थ व्यक्ति ही पात्र होते हैं। वास्तविकता यह है कि अंगदान की उपयुक्तता व्यक्ति की उम्र से ज्यादा उसकी चिकित्सकीय स्थिति और संबंधित अंग की स्थिति पर निर्भर करती है। जीवित व्यक्ति कुछ परिस्थितियों में एक किडनी या लिवर के एक हिस्से का दान कर सकता है। मृत्यु के बाद भी उपयुक्त अंगों और ऊतकों का दान संभव हो सकता है। 18 वर्ष से कम उम्र के संभावित दाताओं के मामले में पंजीकरण और दान से जुड़े निर्णयों के लिए माता-पिता या कानूनी अभिभावक की सहमति आवश्यक होती है।
अंगदान का संकल्प लेना महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी जरूरी है कि व्यक्ति अपनी इच्छा के बारे में अपने परिवार को बताए। मृत्यु के बाद अंगदान की प्रक्रिया में परिवार की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। ऐसे में परिवार अगर पहले से व्यक्ति की इच्छा से परिचित हो, तो कठिन समय में निर्णय लेना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है।
अंगदान को लेकर समाज में कई तरह की गलत धारणाएं मौजूद हैं, उम्र को लेकर भ्रम, बीमारी को लेकर डर, धार्मिक मान्यताओं को लेकर आशंका या यह सोच कि अंगदान के बाद शरीर का सम्मान नहीं किया जाएगा। चिकित्सा विज्ञान में हुई प्रगति ने इनमें से कई भ्रांतियों को चुनौती दी है। किसी व्यक्ति के अंगदान की उपयुक्तता का निर्णय चिकित्सकीय विशेषज्ञ संबंधित परिस्थितियों और अंगों की स्थिति के आधार पर करते हैं। इसलिए केवल किसी बीमारी, उम्र या पूर्व स्वास्थ्य समस्या के आधार पर खुद को संभावित दाता मानने से इनकार कर देना उचित नहीं है।
भारत में प्रत्यारोपण की संख्या बढ़ रही है, लेकिन जरूरत और उपलब्धता के बीच अंतर अब भी बड़ी चुनौती है। हाल के वर्षों में देश में प्रत्यारोपण सुविधाओं और बुनियादी ढांचे में विस्तार हुआ है, फिर भी मृतक-दाता अंगदान की दर को और बढ़ाने की जरूरत बनी हुई है। इसके लिए लोगों को सिर्फ अंगदान के लिए प्रेरित करना पर्याप्त नहीं है। उन्हें सही जानकारी देना भी उतना ही जरूरी है।
अंगदान का फैसला व्यक्तिगत है, लेकिन उसका प्रभाव सामाजिक और मानवीय होता है। जागरूकता, वैज्ञानिक सोच और परिवार से संवाद के जरिए प्रतीक्षा सूची में जिंदगी की उम्मीद लगाए बैठे अनेक मरीजों तक मदद पहुंचाई जा सकती है।
--आईएएनएस
पीएसके/एबीएम
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
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