Explainer: जस्टिस यशवंत वर्मा पर महाभियोग की तैयारी, जानें क्या होता है Impeachment और कैसे हटाए जाते हैं जज
Explainer: राजधानी दिल्ली स्थित अपने सरकारी आवास में कथित तौर पर बड़ी मात्रा में कैश मिलने और उससे जुड़े साक्ष्यों के संरक्षण को लेकर गठित जांच समिति ने बुधवार को अपनी रिपोर्ट जारी कर दी. जिसमें जस्टिस वर्मा के खिलाफ लगाए गए तीनों आरोपों में दोषी माना है. इसके साथ ही समिति ने अपनी अंतिम रिपोर्ट के साथ संबंधित दस्तावेज, साक्ष्य और पूरी कार्यवाही का रिकॉर्ड भी सक्षम अधिकारियों को सौंप दिए.
जांच समिति को नहीं मिला संतोषजनक स्पष्टीकरण
जांच समिति ने कहा है कि दिल्ली स्थित आधिकारिक आवासीय परिसर में बड़ी मात्रा में भारतीय करेंसी नोटों की मौजूदगी और उसके स्रोत या मालिकाना हक को लेकर संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया. इसके साथ ही जांच समिति की रिपोर्ट में कहा गया है कि घटनास्थल पर पहुंचे पुलिस और फायर अधिकारियों की ओर से नकदी को जब्त और सुरक्षित नहीं करने को भी 'गंभीर चूक' हुई है. जांच समिति की रिपोर्ट सामने आने के बाद जस्टिस यशवंत वर्मा को हटाने के लिए महाभियोग की तैयारी भी शुरू हो गई है. जिसके लिए संसद के शीतकालीन सत्र में महाभियोग लाया जा सकता है.
जस्टिस वर्मा पर लगे तीनों आरोप पाए गए सही
सरकारी सूत्रों की मानें तो जस्टिस यशवंत वर्मा को पद से हटाने के लिए संसद के शीतकालीन सत्र में महाभियोग प्रस्ताव लाए जाने की तैयारी शुरू हो गई है. इस मामले में बनाई गई तीन सदस्यीय जांच समिति में जस्टिस यशवंत वर्मा पर लगे तीनों आरोपों को सही पाया है.
जांच समिति ने की आगे की कार्रवाई की सिफारिश
रिपोर्ट आने के बाद जांच समिति ने आगे कार्रवाई की सिफारिश भी की है. हालांकि सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय पीठ द्वारा 1978 में दिए गए फैसले के मुताबिक, किसी जज का इस्तीफा देना ही उसका पद से हटना है, जिसके स्वीकार करने की आवश्यकता नहीं है.
इसी साल अप्रैल में राष्ट्रपति को भेजा था जस्टिस वर्मा ने इस्तीफा
बता दें कि कैश कांड के बाद जस्टिस यशवंत वर्मा ने इस साल अप्रैल में राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा भेज दिया था. बावजूद इसके जस्टिस वर्मा का नाम इलाहाबाद हाई कोर्ट की सूची में दर्ज है. ऐसे में इस बात पर बहस शुरू हो गई है कि जांच समिति की रिपोर्ट में उन्हें दोषी पाए जाने के बाद अब क्या उन्हें पद से हटाने के लिए महाभियोग प्रस्ताव लाया जा सकता है? क्योंकि ये अपनी तरह का ऐसा पहला मामला है जब जज के इस्तीफा देने के बावजूद उनके खिलाफ जांच हुई और उनका नाम हाई कोर्ट के जजों की लिस्ट में भी मौजूद है.
इस्तीफे के बावजूद महाभियोग की तैयारी!
सूत्रों की मानें तो आम लोगों के बीच इस बात की चर्चा होने लगी है कि आखिर जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास पर इतनी बड़ी संख्या में कैश कहां से आया. ऐसे में महाभियोग प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान जस्टिस वर्मा को अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाएगा.
- ये भी अपनी तरह का पहला मामला है जब इस्तीफा देने के बाद भी जज को उनके पर रखा गया है. साथ ही उनके खिलाफ जांच भी हुई है. इसके बाद अब उन्हें पद से हटाने का प्रस्ताव भी लाया जाएगा.
- सूत्रों की मानें तो जब पिछले साल मार्च में उनके घर से कैश मिला था, तब भी उन्हें इस्तीफा देने को कहा गया था, लेकिन तब उन्होंने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया था.
जानें क्या होता है महाभियोग या इंपीचमेंट मोशन?
दरअसल, हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के किसी जज को उनके पद से हटाने के लिए महाभियोग की प्रक्रिया अपनाई जाती है. महाभियोग के जरिए ही हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाया जा सकता है. महाभियोग यानी 'इम्पीचमेंट' शब्द लैटिन भाषा से लिया गया है. जिसका अर्थ पकड़ा जाना है.
- इस शब्द की उत्पति भले ही लैटिन भाषा से हुई है लेकिन इस वैधानिक प्रक्रिया की शुरूआत ब्रिटेन से मानी जाती है. जहां 14वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में महाभियोग का प्रावधान शुरू किया गया था.
- संविधान के अनुच्छेद 124(4)127 में सुप्रीम कोर्ट या किसी हाई कोर्ट के जज को हटाए जाने का प्रावधान है. जिसमें महाभियोग का जिक्र किया गया है और उसे महाभियोग के जरिए हटाए जाने की प्रक्रिया का निर्धारण जज इन्क्वायरी एक्ट 1968 द्वारा किया जाता है.
ये महाभियोग चलाने की पूरी प्रक्रिया
सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट के किसी जज को हटाने के लिए महाभियोग लाया जाता है. जिसकी शुरुआत संसद से होती है. ये शुरुआत लोकसभा के 100 सदस्यों या राज्यसभा के 50 सदस्यों के सहमति वाले प्रस्ताव से की जाती है. ये सदस्य संबंधित सदन के पीठासीन अधिकारी को जज के खिलाफ महाभियोग चलाने की अपनी मांग का नोटिस दे सकते हैं.
- इसके बाद प्रस्ताव पारित होने पर संबंधित सदन के पीठासीन अधिकारी द्वारा तीन जजों की एक समिति का गठन किया जाता है. इस समिति में सुप्रीम कोर्ट के एक मौजूदा न्यायाधीश, हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश या न्यायाधीश और एक कानूनविद को शामिल किया जाता है.
- उसके बाद तीन जजों की समिति संबंधित जज पर लगे आरोपों की जांच करती है.
- जब समिति अपनी जांच पूरी कर लेती है तो उस रिपोर्ट को पीठासीन अधिकारी को सौंपा जाता है. आरोपी जज यानी जिनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया गया है, उन्हें भी अपने बचाव का मौका दिया जाता है.
- पीठासीन अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत की गई जांच रिपोर्ट में अगर आरोपी जज पर लगाए गए दोष सिद्ध हो जाते हैं तो पीठासीन अधिकारी मामले में बहस के प्रस्ताव को मंजूरी देते हुए सदन में वोट कराते हैं.
महाभियोग के लिए दो तिहाई बहुमत जरूरी
बता दें कि किसी जज को तभी महाभियोग द्वारा हटाया जा सकता है जब संसद के दोनों सदनों में दो तिहाई मतों यानी उपस्थिति और वोटिंग से यह प्रस्ताव पारित हो जाए.
जानें क्या है पूरा मामला?
बता दें कि लुटियंस दिल्ली इलाके में स्थित जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास पर 14 मार्च 2025 को स्टोर रूम में आग लग गई. इस घटना के बाद फायर ब्रिगेड कर्मचारियों और पुलिसकर्मियों को कथित तौर पर सरकारी आवास के स्टोर रूम में करोड़ों रुपये की नकदी मिली थी.
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- इसके बाद 21 मार्च को दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय ने अपनी रिपोर्ट को सार्वजनिक किया. इस रिपोर्ट में आरोपों की गहन जांच की बात कही गई थी.
- उसके बाद इस मामले की जांच के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश ने 3 सदस्यीय जांच समिति का गठन किया. जिसके आज यानी बुधवार (12 अगस्त) को अपनी रिपोर्ट पीठासीन अधिकारी को सौंप दी.
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ताइक्वांडो खिलाड़ी के मामले में सामने आए पूरे तथ्य, भ्रामक प्रचार से बचें
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने हाल ही में सीएनआई गर्ल्स स्कूल की छात्राओं के साथ 'युवा संवाद' किया था. इस कार्यक्रम में एक छात्रा ने सीएम धामी के सामने ताइक्वांडो की अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए लगभग 1.5 लाख रुपये की आवश्यकता का विषय रखा था, लेकिन इसे तोड़-मरोड़कर पेश किया जा रहा है, जैसे किसी अधिकारी ने छात्रा से रिश्वत मांगी हो. सोशल मीडिया पर भी यह खबर तेजी से वायरल हो गई थी, लेकिन असलियत यह है कि बात रिश्वत की नहीं, बल्कि खेल के लिए वित्तीय फंड की थी.
प्राइवेट संस्था की ओर से 3 लाख 70 हजार रुपये बताया गया खर्च
वह छात्रा 'ताइक्वांडो काउंसिल ऑफ इंडिया' नाम की एक प्राइवेट संस्था से ट्रेनिंग ले रही थी. इसी संस्था के जरिए उसका सिलेक्शन एक इंटरनेशनल कॉम्पटीशन के लिए हुआ था. इस विदेशी प्रतियोगिता में हिस्सा लेने और वहां आने-जाने का कुल खर्च करीब 3 लाख 70 हजार रुपये बताया गया था. छात्रा ने खुद वीडियो जारी कर बताया कि उन्होंने पैसे की बात किसी को नहीं बताया, जिसके कारण वो इंटरनेशनल खेलने जा नहीं सकी.
प्राइवेट संस्था 1 लाख 70 हजार रुपये खर्च उठाने को था तैयार
इसमें संबंधित उस प्राइवेट संस्था ने छात्रा की मदद करते हुए करीब 1 लाख 70 हजार रुपये का खर्च खुद उठाने का भरोसा दिया था, जबकि बचे हुए करीब 1.50 से 1.60 लाख रुपये का इंतजाम खुद उस खिलाड़ी (छात्रा) को करना था. यानी सीधे शब्दों में कहें तो, यह मामला न तो किसी सरकारी अफसर द्वारा घूस मांगने का था और न ही इसका सरकार की किसी चयन प्रक्रिया से कोई लेना-देना था. यह पूरी तरह से एक प्राइवेट संस्था के जरिए निजी तौर पर होने वाली खेल प्रतियोगिता में हिस्सा लेने और उसके खर्च से जुड़ा मामला था.
CM धामी ने अधिकारियों को दिए मामले की जांच के निर्देश
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के साथ बातचीत के दौरान समय की कमी होने की वजह से वह छात्रा अपनी बात पूरी तरह खुलकर नहीं समझा पाई, जिसकी वजह से इस पूरे मामले को लेकर एक गलतफहमी पैदा हो गई. बता दें कि सीएनआई गर्ल्स स्कूल की छात्रा सायरा जब अपनी बात रखी तब मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने तुरंत मंच से ही अधिकारियों को निर्देश दिया था कि "नाम नोट कर लें और एक बार देख लें. मुख्यमंत्री धामी ने अधिकारियों से इस पूरे मामले की विस्तृत रिपोर्ट मांगी है.
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