West Bengal Bypoll: मतदान से 48 घंटे पहले बड़ा सियासी उलटफेर, TMC प्रत्याशी जहांगीर खान ने वापस लिया नाम
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बीच दक्षिण 24 परगना जिले की फलता सीट पर एक बेहद चौंकाने वाला और बड़ा सियासी उलटफेर सामने आया है। आगामी 21 मई को फलता विधानसभा क्षेत्र में होने जा रहे पुनर्मतदान से महज 48 घंटे पहले तृणमूल कांग्रेसके आधिकारिक उम्मीदवार जहांगीर खान ने चुनावी मैदान से अपने कदम पीछे खींच लिए हैं।
मंगलवार को उन्होंने अचानक अपना नाम वापस लेते हुए सबको हैरान कर दिया। जहांगीर खान ने इसके पीछे निजी कारणों का हवाला दिया है, लेकिन मतदान से ऐन पहले सत्ताधारी पार्टी के उम्मीदवार का इस तरह मैदान छोड़ना मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए एक बहुत बड़ा झटका माना जा रहा है।
फलता के सभी 285 पोलिंग बूथों पर चुनाव आयोग ने दिया था दोबारा वोटिंग का आदेश
आपको बता दें कि फलता विधानसभा सीट पर इससे पहले दूसरे चरण के तहत 29 अप्रैल को मतदान संपन्न हुआ था। लेकिन वोटिंग के दौरान बड़े पैमाने पर चुनावी धांधली, हिंसा और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बाधित करने की गंभीर शिकायतें सामने आई थीं।
विपक्ष के भारी विरोध और जमीनी रिपोर्ट के आधार पर भारत निर्वाचन आयोग ने सख्त एक्शन लेते हुए फलता क्षेत्र के सभी 285 पोलिंग बूथों पर हुए चुनाव को पूरी तरह से रद्द घोषित कर दिया था। आयोग ने निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए यहाँ 21 मई को दोबारा से मतदान कराने का आधिकारिक आदेश जारी किया था, जिसके लिए सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए जा रहे थे।
कलकत्ता हाई कोर्ट से राहत मिलने के अगले ही दिन लिया हैरान करने वाला फैसला
चुनावी प्रक्रिया के बीच जहांगीर खान के खिलाफ स्थानीय थानों में एक के बाद एक कई एफआईआर दर्ज की जा रही थीं। इन आपराधिक मामलों से खुद को बचाने और गिरफ्तारी पर रोक लगाने के लिए जहांगीर ने कलकत्ता हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
सोमवार 18 मई को ही अदालत ने उन्हें बड़ी राहत देते हुए पुलिस को निर्देश दिया था कि आगामी 24 मई तक उनके खिलाफ कोई भी दंडात्मक या दमनकारी कार्रवाई न की जाए। कोर्ट से इतनी बड़ी राहत मिलने के ठीक अगले ही दिन यानी मंगलवार को जहांगीर खान ने अचानक अपनी उम्मीदवारी वापस लेकर राजनीतिक विश्लेषकों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है।
'अजय पाल शर्मा सिंघम हैं तो मैं पुष्पा हूं'- सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ था बयान
हाल ही में हुए मतदान के दौरान जहांगीर खान अपने एक विवादित और फिल्मी बयान को लेकर पूरे देश की मीडिया में सुर्खियों में छाए हुए थे। दरअसल, चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश कैडर के चर्चित और तेजतर्रार आईपीएस अधिकारी अजय पाल शर्मा को फलता विधानसभा क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था की निगरानी के लिए विशेष पुलिस ऑब्जर्वर के रूप में तैनात किया था।
उनकी तैनाती से बौखलाए जहांगीर खान ने एक जनसभा में खुले मंच से उन्हें चुनौती दे डाली थी। जहांगीर ने कहा था, "यह बंगाल है, अगर वह सिंघम हैं, तो मैं ‘पुष्पा’ हूं और पुष्पा कभी झुकेगा नहीं।"
'डॉग बाइट्स की अनदेखी नहीं कर सकते': सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, स्कूल-अस्पताल जैसे पब्लिक प्लेस से हटाए जाएंगे आवारा कुत्ते
नई दिल्ली: देश में आवारा कुत्तों (Stray Dogs) के बढ़ते आतंक और डॉग बाइट के मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा और कड़ा फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने सार्वजनिक संस्थानों और सार्वजनिक स्थानों से आवारा कुत्तों को हटाने के निर्देशों को वापस लेने की मांग करने वाली याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है। अदालत ने साफ कहा कि वह डॉग बाइट्स (कुत्तों के काटने) की घटनाओं को नजरअंदाज नहीं कर सकती।
डॉग लवर्स की याचिकाएं खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने डॉग लवर्स (कुत्ता प्रेमियों) की उन याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिनमें स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड जैसे सार्वजनिक स्थानों से आवारा कुत्तों को हटाने के आदेश में बदलाव की मांग की गई थी। इसके साथ ही कोर्ट ने एनिमल वेलफेयर बोर्ड के एसओपी (SOPs) को चुनौती देने वाले सभी आवेदनों को भी खारिज कर दिया।
सार्वजनिक जगहों पर दोबारा नहीं छोड़े जा सकेंगे आवारा कुत्ते
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब सार्वजनिक स्थानों से आवारा कुत्तों को हटाने का आदेश पूरी तरह प्रभावी रहेगा। अदालत ने अपने पिछले साल के 25 नवंबर के आदेश में संशोधन करने से साफ इनकार कर दिया है, जिसमें स्कूल, अस्पताल और रेलवे स्टेशनों जैसे संस्थागत क्षेत्रों से सभी आवारा कुत्तों को हटाने का निर्देश दिया गया था। साथ ही, इन कुत्तों को हटाकर दोबारा उन्हीं क्षेत्रों में न छोड़ने का निर्देश भी लागू रहेगा।
एनिमल बर्थ कंट्रोल फ्रेमवर्क पर सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी
मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने देश में चल रहे 'एनिमल बर्थ कंट्रोल' (Animal Birth Control) कार्यक्रम को लेकर भी चिंता जताई। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि देश के अलग-अलग हिस्सों में इस फ्रेमवर्क का क्रियान्वयन काफी हद तक बिखरा हुआ, कम बजट वाला और असमान है, जिसके कारण जमीनी स्तर पर सही नतीजे नहीं मिल पा रहे हैं।
राज्यों को दी नसीहत: अगर नियमों का पालन होता तो ऐसे हालात न बनते
सर्वोच्च अदालत ने कड़े शब्दों में कहा कि यदि देश के सभी राज्यों ने समय रहते 'एनिमल बर्थ कंट्रोल रूल्स' (नियमों) का ठीक से पालन किया होता, तो आज समाज में ऐसी गंभीर स्थिति पैदा ही नहीं होती। कोर्ट के इस रुख से साफ है कि अब सार्वजनिक जगहों पर लोगों की सुरक्षा को लेकर कोई ढिलाई नहीं बरती जाएगी।
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