Hariyali Amavasya 2026: आज हरियाली अमावस्या पर लगा दें ये एक पौधा, पितरों का मिलेगा खूब आशीर्वाद
Hariyali Amavasya 2026: सावन का महीना भगवान शिव की भक्ति के साथ-साथ प्रकृति से जुड़ाव के लिए भी खास माना जाता है। श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को हरियाली अमावस्या कहा जाता है। इस दिन पेड़-पौधे लगाने, उनकी देखभाल करने और जरूरतमंदों को दान देने की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, हरियाली अमावस्या पर पीपल का पौधा लगाना विशेष शुभ माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि पीपल की सेवा से पितरों की कृपा प्राप्त होती है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।
हरियाली अमावस्या पर पीपल लगाना क्यों माना जाता है शुभ?
हिंदू धार्मिक परंपराओं में पीपल के पेड़ को पवित्र माना गया है। इसका संबंध देवी-देवताओं के साथ पितरों से भी जोड़ा जाता है। अमावस्या की तिथि को पूर्वजों के स्मरण और उनके निमित्त किए जाने वाले कर्मों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
इसी वजह से हरियाली अमावस्या पर पीपल का पौधा लगाना और उसकी नियमित देखभाल करना पुण्यदायी माना जाता है। धार्मिक विश्वास है कि ऐसा करने से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है और घर-परिवार में सकारात्मकता बनी रहती है।
पीपल का पौधा लगाते समय रखें इन बातों का ध्यान
अगर आप हरियाली अमावस्या पर पीपल का पौधा लगाने की सोच रहे हैं तो जगह का चयन सोच-समझकर करें। पीपल का पेड़ समय के साथ काफी बड़ा और घना हो जाता है। इसलिए इसे घर की दीवार, मकान या किसी निर्माण के बिल्कुल पास नहीं लगाना चाहिए।
ऐसी जगह पौधा लगाएं जहां उसे भविष्य में पर्याप्त स्थान मिल सके। पौधा लगाने के बाद नियमित रूप से उसकी देखभाल और पानी देने की व्यवस्था भी सुनिश्चित करें।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, पौधा लगाते समय अपने पितरों का स्मरण कर उनकी आत्मा की शांति और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की जा सकती है।
अमावस्या पर पितरों का करें स्मरण
अमावस्या को पितरों के लिए महत्वपूर्ण तिथि माना जाता है। इस दिन लोग अपने पूर्वजों को याद करते हैं और अपनी परंपरा के अनुसार तर्पण, पूजा, दान और सेवा जैसे कार्य करते हैं।
पीपल की सेवा और उसके नीचे दीपक जलाने की परंपरा भी कई परिवारों में देखने को मिलती है। मान्यता है कि इससे पितरों की कृपा प्राप्त होती है।
पौधा लगाने के साथ करें दान-पुण्य
हरियाली अमावस्या पर केवल पौधा लगाना ही नहीं, बल्कि जरूरतमंदों की मदद करना भी शुभ माना जाता है। अपनी क्षमता के अनुसार किसी जरूरतमंद को भोजन, कपड़े या आवश्यक सामग्री दान कर सकते हैं।
पितरों के नाम पर जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन कराना भी कई धार्मिक परंपराओं में पुण्यकारी माना गया है। इस तरह हरियाली अमावस्या पर प्रकृति की सेवा के साथ किसी जरूरतमंद की मदद भी की जा सकती है।
नोट: पीपल लगाने और पितरों की कृपा से जुड़ी बातें धार्मिक मान्यताओं पर आधारित हैं। इन्हें आस्था और परंपरा के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
Sawan 2026: सावन में ही क्यों शुरू करें 16 सोमवार व्रत? जानिए शिव-पार्वती से जुड़ी ये पौराणिक मान्यताएं
Sawan 2026: सावन का महीना भगवान शिव की भक्ति के लिए बेहद खास माना जाता है। इस दौरान शिवालयों में भक्तों की भीड़ उमड़ती है और सोमवार के दिन भगवान भोलेनाथ की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। इसी वजह से कई श्रद्धालु 16 सोमवार व्रत का संकल्प भी सावन से ही शुरू करते हैं। धार्मिक मान्यताओं में सावन को इस व्रत के लिए विशेष और शुभ समय माना गया है। आखिर इसके पीछे क्या वजह है और सावन का 16 सोमवार व्रत से क्या संबंध है? आइए जानते हैं।
क्या है 16 सोमवार व्रत?
16 सोमवार व्रत भगवान शिव को समर्पित एक विशेष धार्मिक व्रत माना जाता है। इसमें लगातार 16 सोमवार तक व्रत रखकर भगवान शिव की पूजा की जाती है। वैसे धार्मिक परंपराओं में इसकी शुरुआत साल के किसी भी महीने के शुक्ल पक्ष के पहले सोमवार से करने की मान्यता मिलती है, लेकिन सावन के सोमवार का विशेष महत्व होने के कारण अनेक भक्त इसी महीने से इसका संकल्प लेते हैं।
मान्यता है कि सोमवार भगवान शिव को प्रिय है और सावन में सोमवार की पूजा का महत्व और बढ़ जाता है। इसलिए सावन से 16 सोमवार व्रत शुरू करना भक्तों के लिए आस्था का विशेष अवसर माना जाता है।
माता पार्वती की तपस्या से जुड़ी है मान्यता
सावन में 16 सोमवार व्रत शुरू करने के पीछे माता पार्वती की तपस्या से जुड़ी कथा प्रमुख रूप से बताई जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी।
उनकी अटूट साधना और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया। इसी कारण सावन को शिव-पार्वती के प्रेम, भक्ति और समर्पण से जोड़कर देखा जाता है।
यही वजह है कि विवाह की इच्छा रखने वाले युवक-युवतियां सावन में शिव-पार्वती की पूजा करते हैं और मनचाहे जीवनसाथी की कामना से सोमवार व्रत का संकल्प लेते हैं।
सती से पार्वती बनने तक की कथा भी खास
एक अन्य पौराणिक मान्यता के अनुसार, माता पार्वती ने पूर्व जन्म में सती के रूप में भगवान शिव को पति के रूप में पाया था। पिता दक्ष के यज्ञ में हुए अपमान के बाद सती ने अपने प्राण त्याग दिए थे। बाद में उन्होंने पर्वतराज हिमालय के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया।
पार्वती ने फिर भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की। भगवान शिव उनकी साधना से प्रसन्न हुए और दोनों का पुनर्मिलन हुआ। इसी वजह से सावन को शिव-पार्वती के मिलन और दांपत्य सुख से भी जोड़कर देखा जाता है।
समुद्र मंथन से भी जुड़ा है सावन का महत्व
सावन के महत्व को समुद्र मंथन की कथा से भी जोड़ा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान सबसे पहले हलाहल विष निकला था। इसके प्रभाव से सृष्टि पर संकट खड़ा हो गया।
संसार की रक्षा के लिए भगवान शिव ने उस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया। विष के प्रभाव से उनका कंठ जलने लगा। मान्यता है कि देवताओं ने शिव को शीतलता देने के लिए उनके ऊपर जल अर्पित किया। इसी पौराणिक प्रसंग से सावन में भगवान शिव को जल और गंगाजल अर्पित करने की परंपरा को जोड़कर देखा जाता है।
सावन में शिव पूजा का क्यों बढ़ जाता है महत्व?
धार्मिक मान्यताओं में चातुर्मास को भी विशेष समय माना जाता है। मान्यता है कि इस दौरान भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं और भगवान शिव की आराधना का महत्व बढ़ जाता है।
सावन में देशभर के शिव मंदिरों में विशेष पूजा, अभिषेक और व्रत किए जाते हैं। भक्त बेलपत्र, जल, दूध और फूल आदि भगवान शिव को अर्पित कर अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति की प्रार्थना करते हैं।
नोट: ऊपर बताई गई बातें धार्मिक मान्यताओं और पौराणिक कथाओं पर आधारित हैं। इनके पीछे वैज्ञानिक प्रमाण का दावा नहीं किया गया है।
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