सुधार के नाम पर धर्म की आजादी नहीं छीन सकते:सबरीमाला केस में सुप्रीम कोर्ट बोला- जनता की मांग पर सुधार होंगे, जबरन थोपा तो दखल देंगे
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि सामाजिक सुधार के नाम पर धार्मिक स्वतंत्रता का हनन नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि संविधान निर्माताओं ने समाज की जरूरतों के अनुसार प्रावधान बनाए हैं, जिन्हें नौ जजों की बेंच बदला नहीं सकती। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ जजों की बेंच सबरीमाला मंदिर समेत धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रही है। सुनवाई सोमवार को 14वें दिन जारी रही। जस्टिस बी वी नागरत्ना ने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता को सामाजिक सुधार के नाम पर खत्म नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने संकेत दिया कि जनता की सहमति से सुधार की मांग उठे तो उस पर विचार हो सकता है। मामले की सुनवाई बुधवार को फिर होगी। 7 सवाल, जिन पर बहस हो रही… सुनवाई के दौरान केरल सरकार की ओर से वरिष्ठ वकील जयदीप गुप्ता ने कहा कि धर्म के जरूरी पहलुओं को सामाजिक सुधार के नाम पर हटाया नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म में पूजा का अधिकार महत्वपूर्ण है और यह पवित्र स्थानों पर होता है, इन्हें हटाना अधिकार का उल्लंघन होगा। इस पर जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि सामाजिक सुधार के नाम पर धार्मिक स्वतंत्रता का हनन नहीं किया जा सकता। धर्मों में सुधार की गुंजाइश रखी है कोर्ट में तर्क दिया गया कि राज्य सामाजिक कल्याण के लिए कानून बनाता है तो उसे धार्मिक प्रथाओं के आधार पर रद्द नहीं किया जाना चाहिए। महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति की ओर से वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े ने कहा कि तर्कवादी हर चीज को तर्क की कसौटी पर देखते हैं। उन्होंने कहा कि संविधान में वैज्ञानिक सोच और सुधार की भावना को बढ़ावा देने की बात अनुच्छेद 51A(h) में कही गई है। स्वामी अग्निवेश की ओर से वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि संविधान ने धर्मों में सुधार की गुंजाइश रखी है। उन्होंने अनुच्छेद 26 का जिक्र करते हुए कहा कि इसमें “मैनेज” शब्द का इस्तेमाल किया गया है, “कंट्रोल” नहीं। इससे साफ होता है कि धार्मिक संस्थाओं के अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन है। धर्म में सुधार से सभ्यता का संतुलन नहीं बिगड़ेगा जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि अल्पसंख्यकों के लिए अनुच्छेद 30 जैसे प्रावधान उनकी परिस्थितियों को देखते हुए बनाए गए थे। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या नौ जजों की बेंच इस व्यवस्था को बदल सकती है, जिसे संविधान निर्माताओं ने सोच-समझकर तय किया था। गुरुस्वामी ने जवाब में कहा कि संविधान निर्माताओं को भरोसा था कि धर्म में सुधार से सभ्यता का संतुलन नहीं बिगड़ेगा। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि अगर हर धार्मिक प्रथा को अदालत में चुनौती दी जाएगी, तो बड़ी संख्या में याचिकाएं आएंगी और धर्मों की संरचना प्रभावित हो सकती है। सबरीमाला मामले पर 7 अप्रैल से सुनवाई हुई सबरीमाला मंदिर मामले पर 7 अप्रैल से सुनवाई शुरू हुई थी। इस दौरान केंद्र सरकार ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री के विरोध में दलीलें रखीं। सरकार ने कहा था कि देश के कई देवी मंदिरों में पुरुषों की एंट्री भी बैन है। इसलिए धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए। पिछली 9 सुनवाई में क्या हुआ, पढ़िए… 7 अप्रैल : केंद्र की दलील- मंदिर में महिलाओं की एंट्री का फैसला गलत 8 अप्रैल- जो भक्त नहीं, वो धार्मिक परंपरा को चुनौती कैसे दे रहा 9 अप्रैल- सुप्रीम कोर्ट बोला- मंदिरों में एंट्री रोकने से समाज बंटेगा 15 अप्रैल- सबरीमाला मैनेजमेंट बोला- अयप्पा मंदिर रेस्टोरेंट नहीं, यहां ब्रह्मचारी देवता 17 अप्रैल- SC बोला- संविधान सबसे ऊपर, निजी धार्मिक मान्यताओं से उठकर फैसला जरूरी 21 अप्रैल- सुप्रीम कोर्ट ने पूछा-छूने से देवता अपवित्र कैसे होते हैं 22 अप्रैल- सुप्रीम कोर्ट बोला- हिंदू एकजुट रहें, संप्रदायों में बंटे नहीं 23 अप्रैल- इस्लाम में महिलाओं के मस्जिद आने पर रोक नहीं 28 अप्रैल- धार्मिक प्रथाओं के नाम पर सड़कें ब्लॉक नहीं कर सकते 29 अप्रैल- सुप्रीम कोर्ट बोला- धर्म के विनाश का हिस्सा नहीं बनेंगे 5 मई- सबरीमाला केस में वकीलों ने याचिका लगाई; जज ने कहा- अपने लोगों के लिए काम करें 6 मई- सबरीमाला केस, सुप्रीम कोर्ट बोला बार-बार रुख नहीं बदल सकते 7 मई- सबरीमाला केस, सुप्रीम कोर्ट बोला-हर धार्मिक प्रथा को चुनौती गलत ------------------------------------------------------------------- ये खबर भी पढ़ें: सबरीमाला केस, सुप्रीम कोर्ट बोला-हर धार्मिक प्रथा को चुनौती गलत:इससे धर्म और समाज दोनों टूट जाएंगे, अदालतों में सैकड़ों केस आएंगे सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि अगर लोग धार्मिक प्रथाओं और धर्म के मामलों को अदालत में चुनौती देने लगेंगे, तो इससे धर्म और समाज पर असर पड़ सकता है। कोर्ट ने कहा कि इससे सैकड़ों याचिकाएं आएंगी और हर रिवाज पर सवाल उठने लगेंगे। पढ़ें पूरी खबर…
कलकत्ता हाईकोर्ट की बेंच आरजी-कर केस की सुनवाई से हटी:कहा- समय नहीं दे पा रहे, पीड़ित परिवार बोला- CBI ने नई जांच नहीं की
कलकत्ता हाईकोर्ट में आरजी कर रेप-मर्डर केस की सुनवाई कर रही बेंच ने खुद को मामले से अलग कर लिया। जस्टिस राजा शेखर मंथा और जस्टिस राय चट्टोपाध्याय ने मंगलवार को सुनवाई के दौरान कहा कि दूसरे मामलों की वजह से हम इस केस को समय नहीं दे पा रहे हैं। सुनवाई के दौरान, CBI ने अपनी जांच रिपोर्ट भी पेश की। इस पर पीड़ित के परिवार ने कहा कि एजेंसी द्वारा कोई नई जांच नहीं की गई है। दरअसल, कोर्ट ने मई में CBI को नए सिरे से मामले की जांच करने को कहा था। हाईकोर्ट ने कहा कि यह महत्वपूर्ण मामला है। पूरी दुनिया इसे देख रही है। इसलिए इस मामले को पर्याप्त समय मिलना जरूरी है। हमने केस से खुद को अलग करने के फैसले के बारे में चीफ जस्टिस को बता दिया है। वे अब इस पर फैसला लेंगे। अगर जरूरत पड़ी तो इसके लिए एक कमीशन भी बनाया जाएगा। कोलकाता स्थित आरजी कर मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में पिछले साल 8-9 अगस्त की रात एक ट्रेनी डॉक्टर का रेप-मर्डर हुआ था। 9 अगस्त की सुबह डॉक्टर की लाश सेमिनार हॉल में मिली थी। पीड़ित की मां बोली- हम सीएम सुवेंदु से मिलेंगे सुनवाई के बाद पीड़ित की मां रत्ना देबनाथ ने कहा- ‘मैंने चीफ जस्टिस से मुलाकात की है। मैं अब इस मामले में मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी से भी बात करूंगी।’ इस मामले में पीड़ित की मां रत्ना देबनाथ पश्चिम बंगाल की पानीहाटी से विधायक हैं। उन्होंने TMC के तीर्थंकर घोष को 28,826 वोटों से हराया था। संजय रॉय डॉक्टर से रेप-मर्डर का दोषी इस मामले में अगस्त की सुबह डॉक्टर की लाश सेमिनार हॉल में मिली थी। CCTV फुटेज के आधार पर पुलिस ने संजय रॉय नाम के सिविक वॉलंटियर को अरेस्ट किया था। कोर्ट ने 18 जनवरी, 2025 को संजय को दोषी ठहराया था। 20 जनवरी, 2025 को उसे उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। CBI और पीड़ित परिवार ने मौत की सजा मांगी थी। इस घटना को लेकर कोलकाता समेत देशभर में आक्रोश फैला था। बंगाल में 2 महीने से भी ज्यादा समय तक मेडिकल सेवाएं ठप रही थीं। ------------------------------------------- ये खबर भी पढ़ें… केंद्रीय मंत्री बंदी संजय के बेटे पर POCSO केस:नाबालिग से सेक्सुअल हैरेसमेंट का आरोप; अग्रिम जमानत याचिका लगाई, कहा- हनी ट्रैप की कोशिश हुई भाजपा सरकार में केंद्रीय मंत्री बंदी संजय कुमार के बेटे साई भागीरथ पर 17 साल की एक लड़की के सेक्सुअल हैरेसमेंट का आरोप लगा है। नाबालिग की मां ने 8 मई को तेलंगाना के हैदराबाद में POCSO एक्ट के तहत उनके खिलाफ केस दर्ज कराया था। पूरी खबर पढ़ें…
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