केरल की जीत के बाद मुख्यमंत्री की जंग, सतीसन या राहुल गांधी के खास वेणुगोपाल, किसके सिर सजेगा ताज?
Keralam Politics: केरल विधानसभा चुनावों के नतीजों ने कांग्रेस के खेमे में नई ऊर्जा भर दी है. राज्य की 140 सीटों में से संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (UDF) ने 102 सीटों पर शानदार जीत दर्ज कर वामपंथी किले को ढहा दिया है. इस बड़ी जीत में अकेले कांग्रेस ने 63 सीटें हासिल की हैं. हालांकि, इस बड़ी चुनावी सफलता के बाद अब पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती मुख्यमंत्री का चुनाव करना है. रविवार रात तक कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी किसी अंतिम निर्णय पर नहीं पहुंच पाए थे. जैसे-जैसे सरकार बनाने की आखिरी तारीख 23 मई करीब आ रही है, तिरुवनंतपुरम से लेकर दिल्ली तक सियासी धड़कनें तेज हो गई हैं.
केसी वेणुगोपाल की मजबूत दावेदारी
इस पूरी खींचतान के केंद्र में 63 वर्षीय केसी वेणुगोपाल हैं. वेणुगोपाल पिछले कई सालों से दिल्ली में बैठकर अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के संगठन महासचिव के रूप में पार्टी का कामकाज संभाल रहे हैं. उन्हें राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे का सबसे भरोसेमंद साथी माना जाता है. लोकसभा में भी वह राहुल गांधी के ठीक बगल में बैठते हैं. वेणुगोपाल का केरल का राजनीतिक सफर भी काफी प्रभावशाली रहा है. वह अलाप्पुझा से तीन बार विधायक रह चुके हैं और ओमान चांडी की सरकार में पर्यटन मंत्री की जिम्मेदारी भी निभा चुके हैं. 2026 के इस चुनाव में वेणुगोपाल ने पर्दे के पीछे रहकर गठबंधन को मजबूत करने और विरोधियों को साथ लाने में बड़ी भूमिका निभाई है.
क्या 63 में से 50 विधायक वेणुगोपाल के पक्ष में ?
सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस के 63 विधायकों में से लगभग 50 विधायक वेणुगोपाल के पक्ष में हैं. हाल ही में एआईसीसी पर्यवेक्षक मुकुल वासनिक और अजय माकन ने विधायकों के साथ आमने-सामने बात की थी. एक दस्तावेज की तस्वीर भी सामने आई थी जिसमें विधायकों के समर्थन की बात कही गई थी, हालांकि आधिकारिक रूप से इसे अभी स्वीकार नहीं किया गया है. वेणुगोपाल ने खुद विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा है, इसलिए यदि वह मुख्यमंत्री बनते हैं, तो उन्हें 6 महीने के भीतर चुनाव जीतना होगा.
वीडी सतीसन और रमेश चेन्नीथला की चुनौती
वेणुगोपाल के सामने सबसे बड़ी चुनौती वीडी सतीसन पेश कर रहे हैं. सतीसन पिछले पांच सालों से विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका निभा रहे थे. उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान यह तक कह दिया था कि अगर यूडीएफ की सत्ता में वापसी नहीं हुई, तो वह राजनीति से सन्यास ले लेंगे. उनकी इस मेहनत का फल मिला और वह 20,600 से अधिक वोटों से चुनाव जीते. सतीसन को गठबंधन के प्रमुख साथी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) का भी समर्थन हासिल है. राज्य के कई हिस्सों में कांग्रेस कार्यकर्ता सतीसन के समर्थन में सड़कों पर उतरे हैं. सतीसन ने हालांकि कार्यकर्ताओं से शांति बनाए रखने की अपील की है, लेकिन उनकी लोकप्रियता आलाकमान के लिए अनदेखी करना मुश्किल हो रहा है.
तीसरे दावेदार कौन?
तीसरे दावेदार के रूप में रमेश चेन्नीथला का नाम है. 69 वर्षीय चेन्नीथला केरल की राजनीति के सबसे अनुभवी चेहरों में से एक हैं. वह राज्य के गृह मंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रह चुके हैं. उनके नेतृत्व में 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने राज्य की 20 में से 19 सीटें जीती थीं. हालांकि, 2021 की हार का साया अभी भी उनके राजनीतिक करियर पर बना हुआ है, जिसे उनके विरोध में एक तर्क के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है.
दिल्ली में मैराथन बैठकों का दौर
मुख्यमंत्री के नाम पर मुहर लगाने के लिए शनिवार को दिल्ली में मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास पर तीन घंटे से ज्यादा समय तक बैठक चली. इस बैठक में राहुल गांधी और तीनों प्रमुख दावेदार मौजूद थे. बैठक के बाद रमेश चेन्नीथला ने कहा कि हर किसी ने अपनी राय रखी है और राहुल गांधी ने सभी की बातों को धैर्य से सुना है. उन्होंने साफ किया कि अंतिम फैसला आलाकमान ही करेगा. पार्टी के अन्य नेताओं ने भी कहा है कि जो भी फैसला दिल्ली से होगा, उसे सभी को मानना होगा.
शशि थरूर का भी नाम रहा चर्चा में
इस रेस में तिरुवनंतपुरम के सांसद शशि थरूर का नाम भी चर्चा में आया था, लेकिन उन्होंने खुद ही इन अटकलों पर विराम लगा दिया. थरूर ने कहा कि मुख्यमंत्री को निर्वाचित विधायकों के बीच से ही चुना जाना चाहिए. यह बयान एक तरह से उन दावों की ओर इशारा था जो विधायकों के बीच से ही नेतृत्व की वकालत कर रहे हैं. अब देखना यह होगा कि कांग्रेस नेतृत्व संगठन को संभालने वाले वेणुगोपाल पर भरोसा जताता है या फिर जनता के बीच लोकप्रिय सतीसन को कमान सौंपता है. फैसला जो भी हो, केरल में कांग्रेस के लिए यह नई सरकार एक बड़ी परीक्षा साबित होने वाली है.
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पाकिस्तान में तेजी से बढ़ती आबादी से बुनियादी सेवाओं पर दबाव बढ़ा : रिपोर्ट
इस्लामाबाद, 10 मई (आईएएनएस)। पाकिस्तान की आबादी लगातार तेजी से बढ़ रही है, जिससे वहां की कई व्यवस्थाएं इसे संभाल नहीं पा रही हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, इससे देश अपनी जनसंख्या की सीमा के करीब पहुंचता जा रहा है।
मालदीव इनसाइट की एक रिपोर्ट के अनुसार, देश के स्वास्थ्य नेतृत्व ने चेतावनी दी है कि पाकिस्तान जल्द ही दुनिया का चौथा सबसे अधिक आबादी वाला देश बन सकता है। इस बात ने एक बार फिर उस बड़ी चुनौती की तरफ ध्यान खींचा है, जिस पर अक्सर उतनी गंभीरता से बात नहीं होती, जितनी होनी चाहिए।
पाकिस्तान की आबादी हर साल लगभग 6.2 मिलियन लोगों से बढ़ रही है और कुल आबादी 255 मिलियन से ज्यादा हो चुकी है। इस वजह से यह दुनिया के सबसे ज्यादा आबादी वाले देशों में शामिल हो गया है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि यह बढ़ोतरी धीरे-धीरे नहीं बल्कि तेज गति से हो रही है और यह सिलसिला पिछले कई वर्षों से जारी है, हालांकि इस पर ध्यान देने की कोशिशें कभी-कभी ही की गई हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, समस्या सिर्फ ज्यादा लोगों के लिए जगह बनाने की नहीं है, बल्कि उन बुनियादी व्यवस्थाओं को बनाए रखने की भी है, जो एक ठीक तरह से चलने वाले समाज के लिए जरूरी हैं, जैसे स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा, घर और रोजगार।
रिपोर्ट में बताया गया कि पाकिस्तान के अस्पताल पहले से ही सीमित संसाधनों के साथ पूरी क्षमता पर काम कर रहे हैं। मरीजों की संख्या बढ़ने से इलाज की मांग और उपलब्ध सुविधाओं के बीच अंतर बढ़ रहा है, जिससे इलाज की पहुंच और उसकी गुणवत्ता दोनों प्रभावित हो रही है।
शिक्षा क्षेत्र में भी यही हाल है। ग्रामीण और शहरी दोनों इलाकों के स्कूल बढ़ते छात्रों को संभालने में मुश्किल महसूस कर रहे हैं।
भीड़भाड़ वाली कक्षाएं और सीमित सुविधाएं आम बात हो गई हैं। साथ ही, लाखों बच्चे अभी भी स्कूलों से बाहर हैं, जिससे साफ दिखता है कि जनसंख्या बढ़ने और शिक्षा व्यवस्था की क्षमता के बीच तालमेल नहीं है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि ये समस्याएं नई नहीं हैं, लेकिन जैसे-जैसे आबादी बढ़ रही है, इनकी गंभीरता और बढ़ती जा रही है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि पानी की कमी एक बड़ा मुद्दा बनकर सामने आ रही है, खासकर उन शहरों में जो बिना सही योजना और बुनियादी ढांचे के तेजी से फैल रहे हैं। कई जगहों पर झुग्गी-झोपड़ियां बन रही हैं, जहां साफ पानी और स्वच्छता जैसी बुनियादी सुविधाएं भी नहीं हैं।
मौजूदा हालात देखते हुए यह साफ है कि रोजगार के अवसर जनसंख्या की वृद्धि के हिसाब से नहीं बढ़े हैं, जिससे युवाओं में बेरोजगारी और कम रोजगार बढ़ रहा है।
पाकिस्तान के कई हिस्सों में परिवार नियोजन सेवाओं तक पहुंच भी सीमित है। साथ ही, सामाजिक और सांस्कृतिक कारणों की वजह से लोगों के प्रजनन से जुड़े फैसलों पर भी असर पड़ता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि सीमित पहुंच, सांस्कृतिक परंपराएं और कमजोर प्राथमिक स्वास्थ्य व्यवस्था मिलकर ऐसी स्थिति बना रही हैं, जिससे जनसंख्या तेजी से बढ़ती जा रही है।
चुनौती का पैमाना अब और साफ दिखने लगा है क्योंकि अनुमान बताते हैं कि आबादी आगे भी बढ़ती रहेगी। यह सिर्फ एक डेमोग्राफिक मुद्दा नहीं है, बल्कि देश के भविष्य की दिशा तय करने वाला एक अहम कारक बन चुका है।
--आईएएनएस
एवाई/एबीएम
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