लॉ कॉलेजों में बायोमेट्रिक अटेंडेंस पर सुप्रीम कोर्ट सख्त , छात्र क्लास में नहीं आएंगे तो पढ़ाई का स्तर गिरेगा
Supreme Court News: देश में कानून की पढ़ाई करने वाले छात्रों की उपस्थिति को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है. सुप्रीम कोर्ट में लॉ कॉलेजों में बायोमेट्रिक उपस्थिति व्यवस्था को लेकर सुनवाई हुई, जिसमें बार काउंसिल ऑफ इंडिया यानी BCI की बनाई गई व्यवस्था को चुनौती देने वाली याचिका पर चर्चा की गई. मामला केवल मशीन से हाजिरी लगाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस बात से जुड़ा है कि क्या आज के समय में लॉ की पढ़ाई करने वाले छात्र नियमित रूप से क्लास में जा रहे हैं या नहीं. अदालत ने सुनवाई के दौरान कई ऐसी बातें कहीं, जिससे साफ दिखा कि न्यायपालिका छात्रों की पढ़ाई और प्रशिक्षण को लेकर गंभीर है. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि कानून की पढ़ाई सिर्फ किताबें पढ़ लेने का विषय नहीं है, बल्कि इसमें लगातार क्लास, बहस, चर्चा और शिक्षकों के साथ संवाद भी बहुत जरूरी होता है.
जस्टिस विक्रम नाथ ने कही ये बात
सुनवाई के दौरान जस्टिस विक्रम नाथ ने साफ कहा कि बड़ी संख्या में छात्र क्लास में नहीं जा रहे हैं. अदालत ने इस पर चिंता जताते हुए कहा कि अगर छात्र नियमित रूप से कॉलेज नहीं आएंगे तो पढ़ाई का स्तर प्रभावित होगा. कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के एक पुराने फैसले का भी जिक्र किया, जिसमें कम उपस्थिति वाले छात्रों को राहत मिली थी. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे फैसलों से व्यवस्था में अव्यवस्था फैलती है और कॉलेजों में अनुशासन कमजोर होता है. अदालत का मानना है कि किसी भी पेशेवर कोर्स में नियमित उपस्थिति बेहद जरूरी होती है, खासकर कानून जैसे विषय में, जहां छात्रों को सिर्फ किताबों से नहीं बल्कि व्यावहारिक माहौल से भी सीखना पड़ता है. अदालत ने यह भी संकेत दिया कि केवल डिग्री हासिल कर लेना काफी नहीं है, बल्कि अच्छा वकील बनने के लिए गंभीर अध्ययन और नियमित प्रशिक्षण जरूरी है.
बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने रखी अपनी बात
बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने अदालत में अपनी बात रखते हुए कहा कि छात्रों को उपस्थिति व्यवस्था से आखिर आपत्ति क्यों होनी चाहिए. BCI का कहना था कि बायोमेट्रिक व्यवस्था पारदर्शिता बनाए रखने और फर्जी उपस्थिति रोकने के लिए लाई गई है. कई कॉलेजों में पहले यह शिकायतें सामने आती रही हैं कि छात्र बिना नियमित क्लास किए भी परीक्षा तक पहुंच जाते हैं. ऐसे में बायोमेट्रिक सिस्टम को एक ऐसे उपाय के रूप में देखा जा रहा है, जिससे वास्तविक उपस्थिति दर्ज हो सके. अदालत ने भी माना कि यदि कॉलेजों में अच्छी फैकल्टी और संसाधन मौजूद हैं, तो उनका लाभ तभी मिलेगा जब छात्र वास्तव में क्लास में बैठेंगे. केवल ऑनलाइन नोट्स या परीक्षा से पहले पढ़ाई करके कानून जैसे विषय को पूरी तरह समझ पाना आसान नहीं होता.
सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज़ का भी जिक्र किया और कहा कि वहां की स्थिति भी चिंता का विषय बनती जा रही है. अदालत का कहना था कि देश के प्रतिष्ठित लॉ संस्थानों में पढ़ाई का स्तर और अनुशासन दोनों मजबूत रहने चाहिए. पिछले कुछ वर्षों में देश में लॉ शिक्षा को लेकर काफी बदलाव हुए हैं.
नई यूनिवर्सिटीज़ खुली हैं, आधुनिक कोर्स शुरू हुए हैं और छात्रों के लिए अवसर भी बढ़े हैं. लेकिन इसके साथ यह सवाल भी उठने लगा है कि क्या छात्र उतनी गंभीरता से पढ़ाई कर रहे हैं जितनी इस पेशे की मांग है. कानून का क्षेत्र ऐसा है जहां आगे चलकर वही छात्र न्याय व्यवस्था, अदालतों और समाज के महत्वपूर्ण मामलों से जुड़ते हैं. इसलिए उनकी शिक्षा और प्रशिक्षण मजबूत होना बेहद जरूरी माना जाता है, अदालत की टिप्पणियों से यह भी साफ दिखा कि न्यायपालिका लॉ शिक्षा के स्तर को लेकर कोई ढिलाई नहीं चाहती.
13 मई को होगी अगली सुनवाई
इस पूरे मामले की अगली सुनवाई 13 मई को होगी और माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में इस विषय पर और विस्तार से बहस हो सकती है. फिलहाल इस सुनवाई ने देशभर के लॉ छात्रों और कॉलेजों का ध्यान अपनी तरफ खींच लिया है. कुछ लोग इसे अनुशासन और शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने वाला कदम मान रहे हैं, तो कुछ छात्रों का मानना है कि व्यवस्था लागू करते समय व्यावहारिक दिक्कतों को भी समझा जाना चाहिए.
हालांकि एक बात साफ है कि अदालत और बार काउंसिल दोनों चाहते हैं कि कानून की पढ़ाई केवल औपचारिकता बनकर न रह जाए. नियमित क्लास, शिक्षकों से संवाद और कॉलेज का माहौल किसी भी छात्र के व्यक्तित्व और पेशेवर समझ को मजबूत बनाने में बड़ी भूमिका निभाता है. आने वाले समय में सुप्रीम कोर्ट का फैसला यह तय कर सकता है कि देश के लॉ कॉलेजों में उपस्थिति को लेकर किस तरह की व्यवस्था लागू होगी और छात्रों को उसका पालन किस स्तर तक करना होगा.
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