मध्य पूर्व आज बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन का ज्वलंत उदाहरण बन चुका है। जिस अमेरिका ने दशकों तक इस क्षेत्र को अपनी रणनीतिक मुट्ठी में रखा, वही आज यहां अपनी पकड़ खोता नजर आ रहा है। पहले गाजा में तबाही और अब ईरान युद्ध से उपजे हालात अरब देशों को गहरी चिंता में डाल गये हैं। गाजा में हमले और ईरान युद्ध से लाखों लोग बेघर हुए, हजारों जिंदगियां खत्म हुईं और पूरे क्षेत्र में तबाही का मंजर फैल गया। इस सबसे अरब दुनिया के लोगों के दिल और दिमाग में बड़ा बदलाव आया है। हम आपको बता दें कि अरब दुनिया में अब अमेरिका के लिए भरोसा लगभग खत्म हो चुका है। जनता उसे एक पक्षीय, अवसरवादी और नैतिक रूप से कमजोर शक्ति के रूप में देख रही है। इसके उलट चीन और रूस को अधिक संतुलित और भरोसेमंद विकल्प माना जाने लगा है। लोग अब यह मानने लगे हैं कि अमेरिका अंतरराष्ट्रीय कानून की बात केवल तब करता है जब उसे फायदा हो। अरब देश यह भी देख रहे हैं कि गाजा अब भी मलबे में दबा है और वहां पुनर्निर्माण की कोई ठोस पहल नजर नहीं आती।
इसके अलावा, इस युद्ध की सबसे भारी कीमत खाड़ी देशों को चुकानी पड़ रही है। पर्यटन, जो उनकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, वह बुरी तरह हिल गया है। अनुमान है कि पर्यटन राजस्व में 13 अरब से 32 अरब डॉलर तक की गिरावट आ सकती है। यह गिरावट तब हो रही है जब 2024 में इन देशों ने पयर्टन से 120 अरब डॉलर का राजस्व कमाया था। इतना ही नहीं, एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन के अनुसार अरब देशों को इस युद्ध से करीब 200 अरब डॉलर तक का कुल नुकसान हो सकता है। यानी यह सिर्फ आर्थिक झटका नहीं, बल्कि दीर्घकालिक संकट का संकेत है।
इसके अलावा, खाड़ी देशों ने दशकों तक अमेरिका को अपने यहां सैन्य अड्डे बनाने की अनुमति देकर यह भरोसा किया था कि इससे उनकी सुरक्षा मजबूत होगी और वह किसी भी बाहरी खतरे से सुरक्षित रहेंगे। लेकिन ईरान के साथ हालिया युद्ध ने इस धारणा को गहरे स्तर पर झकझोर दिया है। हकीकत यह सामने आई कि यही अमेरिकी अड्डे खाड़ी देशों के लिए सबसे बड़ा जोखिम बन गए। ईरान ने सीधे तौर पर उन ठिकानों और संपत्तियों को निशाना बनाया जहां अमेरिकी मौजूदगी थी और इसके चलते हमले खाड़ी देशों की जमीन पर हुए। नतीजा यह हुआ कि नुकसान केवल अमेरिका का नहीं, बल्कि खाड़ी देशों का भी हुआ और उनकी सुरक्षित निवेश गंतव्य तथा स्थिर क्षेत्र की छवि को गहरा आघात पहुंचा। इसलिए सबसे गंभीर सवाल यह उठता है कि जब संकट की घड़ी आई तो अमेरिका अपने ही सैन्य अड्डों के आसपास स्थित देशों को पूर्ण सुरक्षा नहीं दे सका। ऐसे में अब यह बहस तेज हो रही है कि क्या खाड़ी देश भविष्य में अमेरिका को अपने यहां सैन्य मौजूदगी जारी रखने देंगे या वह इस मॉडल पर पुनर्विचार करेंगे। यह घटनाक्रम पूरी दुनिया को यह संदेश भी देता है कि किसी बाहरी शक्ति को अपने भूभाग पर सैन्य अड्डे देने की कीमत कितनी भारी पड़ सकती है।
इसलिए मध्य पूर्व में आने वाले समय में रणनीतिक स्तर पर बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। अरब देश समझ रहे हैं कि अमेरिका की अगुवाई वाली व्यवस्था अब दरक रही है। अरब देश अब खुलकर या चुपचाप अपने विकल्प तलाश रहे हैं। चीन और रूस के साथ रिश्ते मजबूत हो रहे हैं। रक्षा सहयोग बढ़ रहा है, व्यापारिक साझेदारियां गहरी हो रही हैं और नए बहुपक्षीय मंचों की ओर झुकाव साफ दिख रहा है। साथ ही खाड़ी देशों ने युद्ध से पहले अमेरिका को चेताया था, लेकिन उनकी अनदेखी की गई। अब जब वह खुद नुकसान झेल रहे हैं, तो वह अपने निवेश और गठबंधनों पर दोबारा सोचने को मजबूर हैं।
देखा जाये तो अमेरिका की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी इजराइल के प्रति अंध समर्थन बन चुकी है। अरब जनता इसे अन्याय और दोहरे मापदंड के रूप में देखती है। लोगों का मानना है कि अमेरिका ने न तो मानवाधिकारों की रक्षा की और न ही अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन किया। यही कारण है कि अब चीन को ज्यादा जिम्मेदार और संतुलित शक्ति माना जा रहा है। यह अमेरिका के प्रभाव के खत्म होने का संकेत है।
साथ ही इस पूरे संकट ने वैश्विक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं को भी पक्षपाती माना जा रहा है। लोगों का भरोसा नियम आधारित व्यवस्था से उठ रहा है। यह संकेत है कि दुनिया अब एक नई, बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है जहां पश्चिम का प्रभुत्व कमजोर होगा।
वैसे, अमेरिका के पास अभी भी मौका है, लेकिन समय तेजी से निकल रहा है। अगर वह ईरान युद्ध को जल्द खत्म करता है और फिलिस्तीन मुद्दे पर न्यायपूर्ण रुख अपनाता है, तो कुछ हद तक अपनी साख बचा सकता है। लेकिन अगर वही नीतियां जारी रहीं, तो मध्य पूर्व में उसका प्रभाव इतिहास बन सकता है।
बहरहाल, अमेरिका की गिरती साख, खाड़ी देशों का आर्थिक संकट और बदलता जनमत यह साफ संकेत दे रहे हैं कि शक्ति संतुलन तेजी से बदल रहा है। अगर अब भी अमेरिका ने दिशा नहीं बदली, तो मध्य पूर्व में उसकी जगह कोई और लेने के लिए पूरी तरह तैयार है।
-नीरज कुमार दुबे
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ईरान की सरहदें अब केवल नक्शे पर खिंची रेखाएं नहीं रहीं, बल्कि वह इंसानी दर्द, डर और बिखरती उम्मीदों की सबसे मार्मित कहानी बन चुकी हैं। अप्रैल की शुरुआत तक हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि हर सीमा चौकी पर मार्मिक कहानियां दिखाई दे रही हैं। युद्ध, आर्थिक तबाही और संचार ठप होने की स्थिति ने पूरे ईरान को भीतर से झकझोर दिया है जिससे बड़ी संख्या में लोग पलायन कर रहे हैं।
तुर्की की कपिकोय सीमा पर खड़े लोगों ने पलायन का कारण पूछे जाने पर बताया कि हर रात बम गिरते हैं और हर सुबह खुद को जिंदा पाकर हम खुश होते हैं लेकिन ऐसा कब तक चलेगा। उन्होंने बताया कि राजधानी तेहरान से लेकर औद्योगिक इलाकों तक धमाकों की आवाज अब लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुकी है।
इंटरनेट बंद है, कारोबार ठप है और भविष्य पूरी तरह अनिश्चित है। ऐसे में लोग केवल जान बचाने के लिए नहीं, बल्कि दुनिया से जुड़ने के लिए भी देश छोड़ रहे हैं। यह पलायन अब रोटी या नौकरी का नहीं, बल्कि अस्तित्व और संवाद का संकट बन गया है। कुछ लोग तो सिर्फ इंटरनेट इस्तेमाल करने के लिए पहाड़ों के रास्ते तुर्की की सीमा पार कर रहे हैं।
हम आपको बता दें कि ईरान से निकलने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जबकि देश के भीतर भी लाखों लोग विस्थापित हो चुके हैं। तुर्की सबसे बड़ा रास्ता बनकर उभरा है, क्योंकि वहां वीजा मुक्त प्रवेश की सुविधा है। इसके अलावा अफगानिस्तान और पाकिस्तान की ओर भी लोगों का रुख बढ़ा है। लेकिन इन रास्तों पर अब पहले जैसा खुलापन नहीं है। तुर्की ने अपनी सीमा को लगभग किले में बदल दिया है। सैंकड़ों किलोमीटर लंबी दीवार, रडार, थर्मल कैमरे और ड्रोन निगरानी, सब कुछ तैनात है। इसके साथ ही सीमा के भीतर बफर जोन और टेंट शहर बनाने की तैयारी की गई है ताकि शरण लेने वालों को शहरों तक पहुंचने से पहले ही रोक दिया जाए। यहां एक अजीब विडंबना दिखाई देती है। एक तरफ इंसान मदद के लिए दरवाजे खटखटा रहा है, दूसरी तरफ वही दरवाजे सुरक्षा के नाम पर बंद किए जा रहे हैं।
अफगानिस्तान सीमा पर हालात और भी ज्यादा तनावपूर्ण हैं। तालिबान और ईरानी सुरक्षा बलों के बीच झड़पें हो चुकी हैं। हजारों अफगान जो कभी ईरान में रह रहे थे, अब वापस लौट रहे हैं, जबकि कुछ ईरानी उसी दिशा में शरण लेने की कोशिश कर रहे हैं। यह उल्टा बहाव बताता है कि हालात कितने जटिल हो चुके हैं।
पाकिस्तान ने भी अपनी सीमा पर सख्ती बढ़ा दी है। हर आने जाने वाले की कड़ी जांच हो रही है। वहीं अजरबैजान ने अपनी जमीन पूरी तरह बंद कर दी है। वहां प्रवेश अब केवल विशेष अनुमति से ही संभव है।
इन सबके बीच आर्मेनिया की नोरदुज सीमा एक उम्मीद की तरह सामने आई है। यह फिलहाल उन लोगों के लिए सबसे सुरक्षित रास्ता है जो किसी भी तरह इस संकट से बाहर निकलना चाहते हैं। लेकिन यह रास्ता भी कब तक खुला रहेगा, यह कोई नहीं जानता।
युद्ध का सबसे गहरा असर ईरान की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। कारोबार बंद हो रहे हैं, मुद्रा लगातार गिर रही है और लोगों की बचत खत्म होती जा रही है। एक कारोबारी को अपना पूरा व्यापार बंद करना पड़ा और अपने कर्मचारियों को यह कहकर घर भेजना पड़ा कि अब आगे क्या होगा, कोई नहीं जानता।
सबसे डरावनी बात यह है कि लोग अब इस डर के साथ जीना सीख रहे हैं। शुरुआत में जो धमाके दिल दहला देते थे, अब वे सामान्य लगने लगे हैं। लेकिन इस सामान्यता के पीछे छिपा है गहरा मानसिक आघात। एक महिला बताती है कि उसकी मां की मौत किसी हमले से नहीं, बल्कि लगातार तनाव के कारण हुई। देखा जाये तो युद्ध केवल शरीर को नहीं, बल्कि मन को भी तोड़ देता है।
हालांकि हर ईरानी इस पलायन का हिस्सा नहीं है। कुछ लोग अब भी अपने देश के साथ खड़े हैं। वह मानते हैं कि मुश्किल समय है, लेकिन देश छोड़ना समाधान नहीं है। यह सोच दिखाती है कि ईरान के भीतर भी एक गहरी मानसिक और भावनात्मक लड़ाई चल रही है।
दिलचस्प बात यह भी है कि जहां एक तरफ लोग देश छोड़ रहे हैं, वहीं कई लोग वापस भी लौट रहे हैं। कुछ अपने परिवार के पास रहने के लिए, तो कुछ मजबूरी में। यह स्थिति बताती है कि यह संकट केवल भागने या बचने का नहीं, बल्कि रिश्तों और जिम्मेदारियों के बीच फंसी जिंदगी का भी है।
देखा जाये तो आज ईरान की सीमाएं दुनिया के सबसे बड़े मानवीय संकट का केंद्र बन चुकी हैं। एक तरफ युद्ध और आर्थिक तबाही से जूझती जनता, दूसरी तरफ पड़ोसी देशों की सख्त सुरक्षा नीतियां, इन दोनों के बीच इंसान पिस रहा है। यह केवल सीमाओं का संकट नहीं, बल्कि अस्तित्व की लड़ाई है। अगर हालात जल्द नहीं बदले, तो इसका असर केवल ईरान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे क्षेत्र और दुनिया को अपनी चपेट में ले लेगा।
-नीरज कुमार दुबे
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