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काम की खबर: अस्पतालों का कमरा 3-स्टार होटल से महंगा नहीं होना चाहिए, संसदीय समिति की बड़ी सिफारिश
देश के बड़े शहरों में निजी अस्पतालों में इलाज का खर्च कम करने की दिशा में संसदीय समिति ने अहम सिफारिश की है। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग से जुड़ी संसदीय स्थायी समिति ने कहा है कि अस्पतालों के बेसिक रूम का किराया आसपास के 3-स्टार होटल के औसत कमरे के किराए से ज्यादा नहीं होना चाहिए।
समिति की यह रिपोर्ट 7 अगस्त को राज्यसभा में पेश की गई और लोकसभा के पटल पर भी रखी गई। समिति ने अपनी रिपोर्ट 'अफोर्डेबिलिटी एंड एसेसिबिलिटी ऑफ हेल्थकेयर फेसिलिटीज इन पब्लिक एंड प्राइवेट सेक्टर' में खास तौर पर बड़े महानगरों के निजी अस्पतालों में कमरे के किराए को तर्कसंगत बनाने की जरूरत बताई है। समिति का मानना है कि कई निजी अस्पतालों में मरीज के इलाज के कुल बिल में कमरे का किराया बड़ा हिस्सा बन जाता है। इसलिए इसकी कीमत पर एक व्यावहारिक सीमा तय करने की जरूरत है।
अस्पताल के बेसिक रूम रेंट पर होगी सीमा
समिति ने सुझाव दिया है कि अस्पताल के कमरे का बेसिक किराया अस्पताल के आसपास या नजदीकी इलाके में मौजूद 3-स्टार होटलों के औसत कमरे के किराए से अधिक नहीं होना चाहिए। यह व्यवस्था बड़े महानगरों के सभी निजी अस्पतालों में अनिवार्य करने की सिफारिश की गई है। हालांकि, यह सीमा सिर्फ बेसिक रूम टैरिफ पर लागू होगी।
अस्पताल निवासी डॉक्टर, नर्सिंग, डिस्पोजेबल सामान, भोजन और लॉन्ड्री जैसे खर्च अलग से जोड़ सकेंगे। समिति का कहना है कि इन सेवाओं की लागत को अलग दिखाने से अस्पताल के कुल खर्च को अधिक पारदर्शी और तर्कसंगत बनाया जा सकेगा।
सरकारी और निजी अस्पताल के खर्च में बड़ा अंतर
समिति ने अस्पताल में भर्ती होने के खर्च में सरकारी और निजी क्षेत्र के बीच बड़े अंतर को भी रेखांकित किया। 80वें नेशनल सैंपल सर्वे के आंकड़ों के अनुसार, सरकारी अस्पताल में भर्ती होने का औसत खर्च करीब 6631 रुपये, जबकि निजी अस्पताल में यह करीब 50508 रुपये था। देशभर में अस्पताल में भर्ती होने का औसत खर्च करीब 37858 रुपये और मरीजों का औसत आउट ऑफ पॉकेट एक्सपेंडिचर करीब 34,064 रुपये रहा।
रिपोर्ट में मेडिकल महंगाई की दर 10-13 प्रतिशत सालाना रहने का भी उल्लेख किया गया है। इससे परिवारों के इलाज पर होने वाला खर्च और हेल्थ इंश्योरेंस की लागत दोनों बढ़ रहे हैं।
इलाज के पैकेज रेट सार्वजनिक करने की सिफारिश
समिति ने निजी और सरकारी दोनों अस्पतालों के लिए सामान्य सर्जरी और मेडिकल प्रक्रियाओं के तय पैकेज रेट बनाने और उन्हें सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करने की सिफारिश की है। इन पैकेज में डॉक्टर की फीस, जांच, जरूरी मेडिकल सामान और सामान्य पोस्ट-ऑपरेटिव देखभाल शामिल होनी चाहिए।
समिति का मानना है कि छिपे हुए शुल्क और अलग-अलग मरीजों से अलग बिलिंग खत्म होने से इलाज का खर्च नियंत्रित हो सकता है और मरीजों को पहले से पता रहेगा कि इलाज पर कितना खर्च आएगा।
हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये फिलहाल संसदीय स्थायी समिति की सिफारिशें हैं। अस्पतालों के लिए इन्हें अनिवार्य बनाने के लिए सरकार की मंजूरी और जरूरी नियामकीय कार्रवाई अभी बाकी है।
(प्रियंका कुमारी)
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