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झारखंड की आदिवासी पहचान को मिलेगी नई उड़ान, CM सोरेन ने सरना धर्म कोड के लिए राज्यपाल को लिखा पत्र
Jharkhand News: झारखंड की राजनीति और आदिवासी समाज के अधिकारों की रक्षा की दिशा में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने एक बड़ा कदम उठाया है. मुख्यमंत्री ने राज्य की विशिष्ट आदिवासी संस्कृति और उनकी धार्मिक पहचान को सुरक्षित रखने के लिए राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार को एक महत्वपूर्ण पत्र लिखा है. इस पत्र के माध्यम से उन्होंने आग्रह किया है कि केंद्र सरकार आगामी जनगणना के दूसरे चरण में आदिवासियों के लिए एक अलग 'सरना धर्म कोड' का प्रावधान करे. मुख्यमंत्री का मानना है कि यह केवल एक प्रशासनिक मांग नहीं है, बल्कि करोड़ों आदिवासियों की आस्था और उनके अस्तित्व से जुड़ा विषय है.
आदिवासी अस्मिता और सरना धर्म का महत्व
झारखंड एक ऐसा राज्य है जिसकी आत्मा यहां की आदिवासी परंपराओं में बसती है. मुख्यमंत्री सोरेन ने अपने पत्र में इस बात पर विशेष जोर दिया है कि झारखंड की पहचान यहां की विशिष्ट जीवनशैली और प्रकृति आधारित संस्कारों से है. आदिवासी समाज सदियों से जल, जंगल और जमीन की पूजा करता आ रहा है. उनकी यह धार्मिक पद्धति जिसे व्यापक रूप से सरना धर्म कहा जाता है, पूरी तरह से प्रकृति को समर्पित है. वर्तमान में जनगणना के प्रपत्रों में अनुसूचित जनजाति के लिए कॉलम तो उपलब्ध है, लेकिन उनकी धार्मिक विशिष्टता को दर्ज करने के लिए कोई अलग विकल्प नहीं है. इससे आदिवासी समाज प्रशासनिक वर्गीकरण के दौरान अपनी मूल धार्मिक पहचान को व्यक्त करने में असमर्थ रहता है और एक तरह से उनकी पहचान ओझल हो रही है.
विधानसभा का संकल्प और जनता की मांग
मुख्यमंत्री ने राज्यपाल को याद दिलाया कि सरना धर्म कोड की मांग कोई नई बात नहीं है. झारखंड विधानसभा द्वारा इस संबंध में पहले ही सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया जा चुका है और उसे केंद्र सरकार के पास भेजा गया है. राज्य के विभिन्न सामाजिक संगठन, बुद्धिजीवी और आदिवासी समुदाय लंबे समय से सड़कों से लेकर सदन तक इस मांग को बुलंद कर रहे हैं. हेमंत सोरेन का कहना है कि जनभावनाओं का सम्मान करना लोकतंत्र की पहली शर्त है. यदि जनगणना में आदिवासियों को अपनी अलग पहचान दर्ज करने का मौका नहीं मिलता है, तो भविष्य में बनने वाली सरकारी नीतियों और योजनाओं के लाभ उन तक सही तरीके से नहीं पहुंच पाएंगे. यह डेटा की कमी के कारण उनके विकास में एक बड़ी बाधा बन सकता है.
राज्यपाल की संवैधानिक भूमिका और आग्रह
हेमंत सोरेन ने अपने पत्र में राज्यपाल के संवैधानिक पद की गरिमा और उनके उत्तरदायित्वों का भी उल्लेख किया है. उन्होंने संविधान की धारा-244 और पांचवीं अनुसूची के तहत राज्यपाल को मिलने वाले विशेष अधिकारों का हवाला देते हुए कहा कि झारखंड जैसे आदिवासी बहुल राज्य के हितों की रक्षा करना उनका मुख्य दायित्व है. मुख्यमंत्री ने राज्यपाल से विनम्रतापूर्वक अनुरोध किया है कि वे राज्य की इस गंभीर समस्या और जनभावना को केंद्र सरकार, राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के समक्ष मजबूती से रखें. उन्होंने उम्मीद जताई है कि राज्यपाल की सकारात्मक पहल से आदिवासियों को उनका हक मिलेगा और राज्य में सामाजिक समरसता और अधिक मजबूत होगी.
भविष्य की चुनौतियों का समाधान
झारखंड सरकार का यह कदम राज्य की सांस्कृतिक विरासत को बचाने की एक बड़ी कोशिश के रूप में देखा जा रहा है. मुख्यमंत्री का मानना है कि सरना धर्म कोड मिलने से न केवल आदिवासियों की गणना सटीक होगी, बल्कि उनकी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मान्यता मिलेगी. सोरेन ने स्पष्ट किया है कि जब तक आदिवासियों को उनकी धार्मिक पहचान नहीं मिलती, तब तक उनके विकास की बात अधूरी है. राज्य सरकार चाहती है कि जनगणना में आदिवासियों को वह सम्मान मिले जिसके वे हकदार हैं. यह पहल आने वाले समय में झारखंड की राजनीति और सामाजिक ढांचे में एक नया बदलाव ला सकती है. मुख्यमंत्री ने अंत में यह भी कहा कि इस मांग पर केंद्र का सकारात्मक रुख झारखंड के विकास में मील का पत्थर साबित होगा.
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