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ईरान के सर्वोच्च नेता के प्रतिनिधि इलाही का बड़ा बयान, युद्ध को बताया आशीर्वाद

नई दिल्ली, 2 मई (आईएएनएस)। भारत में ईरानी सर्वोच्च नेता के प्रतिनिधि अब्दुल माजिद हकीम इलाही ने मध्य पूर्व की राजनीति, अमेरिका की भूमिका और हालिया युद्ध को लेकर खुलकर अपनी बात रखी। उन्‍होंने इस युद्ध को एक तरह का आशीर्वाद बताया। ईरान और उसके पड़ोसी देशों के बीच रिश्ते अब और मजबूत होंगे।

एक विशेष बातचीत के दौरान इलाही ने कहा कि मुझे लगता है कि यह युद्ध भी एक आशीर्वाद था। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं, क्योंक‍ि अरब देश भी इससे खुश हैं। उन्‍हें हर साल अमेरिका से हथियार खरीदने के लिए मजबूर किया जाता था। हर साल उन्हें लगभग 500 बिलियन डॉलर खर्च करने पड़ते थे, सिर्फ हथियार खरीदने के लिए। फिर भी उन्हें इन हथियारों से कोई खास फायदा नहीं हुआ।

इलाही ने कहा क‍ि मैं कुछ अरब देशों के राजाओं के नाम नहीं लेना चाहता, लेकिन वे खुद कहते थे कि अमेरिका ने हमें ये सब हथ‍ियार भेजे। यहां तक कि उन्हें बहुत महंगे और खूबसूरत विमान भी अमेरिका को गिफ्ट के रूप में देने पड़े। आपने सुना होगा? खैर, ये उनका अपना मामला है।

उन्‍होंने ने कहा क‍ि आखिरकार अब उन्हें समझ आ गया कि अमेरिका उनकी रक्षा नहीं कर सकता, उनके लिए शांति नहीं ला सकता और न ही सुरक्षा दे सकता है। यह बात उन्हें समझ में आ गई। यहां तक कि एक पश्चिमी देश के विदेश मंत्री ने भी एक इंटरव्यू में कहा कि हम अमेरिका के साथ अपने रिश्तों की नीति बदलने वाले हैं।

अब उन्हें एहसास हुआ है कि हम सब इसी क्षेत्र, यानी मध्य पूर्व के लोग हैं और हमें साथ मिलकर रहना है। अगर कोई समस्या है तो हमें खुद ही मिलकर उसे सुलझाना होगी। इसी वजह से मुझे यकीन है कि ईरान और उसके पड़ोसी देशों के बीच रिश्ते पहले से ज्यादा बेहतर और मजबूत होंगे।

इलाही ने बताया क‍ि पहले अमेरिका हमेशा उन्हें यह कहता था कि अगर मैं न हूं, तो तुम एक हफ्ता भी नहीं टिक पाओगे। यह बात खुद अमेरिका के राष्ट्रपति ने कही थी। उनका लहजा काफी रूखा था और भी बहुत सी बातें थीं जो मैं यहां नहीं कहना चाहता।

इलाही ने कहा क‍ि मैं बस इतना कहना चाहता हूं कि ईरान का अपने पड़ोसियों से कोई झगड़ा नहीं है। इस युद्ध के दौरान भी ईरान ने कभी अपने पड़ोसी देशों पर हमला नहीं किया। उसने सिर्फ अपनी रक्षा की।

इलाही ने एक सवार के जवाब में कहा, मैं आपसे पूछ रहा हूं, हिज्‍बुल्लाह कब बना था? 1995 में या 1994 में? मुझे ठीक से नहीं पता। मान लीजिए कि यह ईरान के इस्लामिक रिपब्लिक बनने के बाद बना, जिसे लगभग 47 साल हो चुके हैं, है ना?

जरा उससे पहले के समय में वापस चलते हैं, जब ईरान का इस्लामिक रिपब्लिक बना ही नहीं था। क्या उस समय ईरान, लेबनान और इजरायल के बीच कोई संघर्ष नहीं था? था, बिल्कुल था।

इस्लामिक रिपब्लिक बनने से पहले, लेबनान का आधा हिस्सा इजरायल के कब्जे में था। इजरायल बेरूत, जो कि लेबनान की राजधानी है, वहां तक आ गया था।

तो यह संकट हिज्‍बुल्लाह की वजह से नहीं है। यह संकट इजरायल की वजह से है। इजरायल ने ही सबरा और शतीला में लोगों को मारा, तीन लेबनानी गांवों में। उन्होंने हजारों बेगुनाह लोगों का कत्ल किया। एरियल शेरोन के समय में यह हुआ। यह सब हिज्‍बुल्लाह के बनने से पहले हुआ था।

फिर लोग क्यों कहते हैं कि हिज्‍बुल्लाह ही समस्या है? क्या आप एक भी ऐसा हमला बता सकते हैं जो हिज्‍बुल्लाह ने शुरू किया हो? कभी नहीं। हिज्‍बुल्लाह के पूरे समय में वह हमेशा अपनी रक्षा ही करता रहा है।

हिज्‍बुल्लाह बना ही क्यों? इसलिए कि वह इजरायल को अपने देश से बाहर निकालना चाहता था और उन्होंने ऐसा कर भी दिखाया।

ये लोग ईरानी नहीं हैं, ये लेबनानी हैं। ये अपने देश से प्यार करते हैं। इनमें कुछ शिया हैं, कुछ सुन्नी हैं और कुछ ईसाई भी हैं। ये सब मिलकर अपने देश की रक्षा के लिए खड़े हुए हैं।

आज भी लेबनान का कुछ हिस्सा 50 साल से ज्‍यादा समय से इजरायल के कब्जे में है।

मुझे समझ नहीं आता कि ऐसी सोच क्यों है कि इजरायल जो भी करे, उसे करने का हक है। लेकिन अगर कोई और अपने बचाव के लिए खड़ा होता है, तो उसे गलत कहा जाता है।

असल संकट हिज्‍बुल्लाह की वजह से नहीं है। संकट इजरायल की वजह से है।

--आईएएनएस

एवाई/पीएम

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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UNSC की अध्यक्षता मिलते ही China का बड़ा कदम, Lebanon से UNIFIL मिशन वापसी पर पुनर्विचार की मांग

संयुक्त राष्ट्र में पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के स्थायी प्रतिनिधि फू कोंग ने शनिवार को कहा कि मई महीने के लिए सुरक्षा परिषद की घूर्णनशील अध्यक्षता ग्रहण करना उनके लिए बहुत सम्मान की बात है। अल जज़ीरा की रिपोर्ट के अनुसार, फू ने कहा कि चीन जिन मुद्दों पर विचार कर रहा है, उनमें से एक दक्षिणी लेबनान में संयुक्त राष्ट्र के शांतिरक्षा मिशन का भविष्य है। पिछले साल अगस्त में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा पारित एक प्रस्ताव का जिक्र करते हुए फू ने कहा हमारा मानना ​​है कि हमें यूएनआईएफआईएल को वापस बुलाने के फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए। अल जज़ीरा के अनुसार, 1978 में इज़राइल के आक्रमण के बाद से संयुक्त राष्ट्र के शांतिरक्षक दक्षिणी लेबनान में तैनात हैं, लेकिन पिछले साल परिषद के 15 सदस्यों ने 2026 के अंत से मिशन को समाप्त करने के लिए मतदान किया था।

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फू ने कहा मुझे लगता है कि सुरक्षा परिषद के अधिकांश सदस्यों का यही मत है कि अभी यूएनआईएफआईएल को देश के उस हिस्से से वापस बुलाने का समय नहीं है। अल जज़ीरा के अनुसार, चीन जून में संयुक्त राष्ट्र सचिवालय से आने वाली रिपोर्ट का इंतज़ार कर रहा है, उसके बाद ही हम अपना रुख स्पष्ट करेंगे। एक्स पर एक पोस्ट में फू ने कहा मई माह के लिए सुरक्षा परिषद की घूर्णनशील अध्यक्षता ग्रहण करना चीन के लिए बहुत सम्मान की बात है। हम पिछले माह अध्यक्ष के रूप में बहरीन द्वारा किए गए कार्यों की सराहना करते हैं। अब जब कमान हमारे हाथों में है, तो हम परिषद के कार्यों में निष्पक्षता और पारदर्शिता बनाए रखेंगे, और दृढ़ जिम्मेदारी की भावना और रचनात्मक दृष्टिकोण के साथ अपने कर्तव्यों का निर्वहन करेंगे, परिषद की एकजुटता और सहयोग को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध रहेंगे, ताकि यह अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की रक्षा में सकारात्मक भूमिका निभा सके।

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1978 के आक्रमण के बाद इजरायली सैनिकों की वापसी की निगरानी के लिए गठित यूनिफिल (UNIFIL) के अधिकार क्षेत्र को 2006 में इजरायल और लेबनानी समूह हिजबुल्लाह के बीच हुए युद्ध के बाद विस्तारित किया गया और अल जज़ीरा के अनुसार, इसे विरोधी पक्षों के बीच एक विसैन्यीकृत बफर क्षेत्र के लिए जिम्मेदार बनाया गया था।

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