नेपाल दौरे पर अमेरिकी दूत सर्जियो गोर, आर्थिक सहयोग और निवेश बढ़ाने पर जोर
काठमांडू, 1 मई (आईएएनएस)। अमेरिका के दक्षिण और मध्य एशिया के विशेष दूत सर्जियो गोर ने शुक्रवार को अपनी राजनीतिक मुलाकातों की शुरुआत नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल और वित्त मंत्री स्वर्णिम वागले से मुलाकात करके की।
गोर, जो भारत में अमेरिका के राजदूत भी हैं, गुरुवार शाम काठमांडू पहुंचे और शुक्रवार को नेपाल सरकार के मंत्रियों से मिले। 27 मार्च को प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह के नेतृत्व में नई सरकार बनने के बाद नेपाल आने वाले वे अमेरिका के सबसे वरिष्ठ अधिकारी हैं।
इन बैठकों में दोनों पक्षों ने कहा कि उन्होंने दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग बढ़ाने के साथ-साथ आपसी संबंधों से जुड़े कई मुद्दों पर बात की।
वित्त मंत्री वागले से मुलाकात के बाद गोर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, “हमारी बातचीत में कई अहम मुद्दे शामिल रहे। खास तौर पर बिजनेस माहौल बेहतर बनाने, टेक्नोलॉजी के जरिए रोजगार बढ़ाने और आर्थिक सहयोग के नए मौके तलाशने पर जोर रहा, जिससे दोनों देशों को फायदा होगा।”
हाल के समय में अमेरिका ने नेपाल के टेक्नोलॉजी सेक्टर में निवेश में ज्यादा दिलचस्पी दिखाई है। एलन मस्क की कंपनी स्टारलिंक नेपाल में अपनी सेवाएं शुरू करने को लेकर अधिकारियों से बातचीत कर रही है।
वहीं, अमेरिकी मीडिया कंपनी नेटफ्लिक्स भी नेपाल के बाजार में आने की तैयारी कर रही है। नेपाल भी सॉफ्टवेयर एक्सपोर्ट के लिए अमेरिका की ओर देख रहा है, क्योंकि हाल के वर्षों में आईटी सेवाएं उसके प्रमुख निर्यात सेक्टर में रही हैं।
नेपाल के वित्त मंत्रालय ने बताया कि दोनों देशों के बीच आर्थिक साझेदारी और अमेरिकी सहायता पर भी चर्चा हुई। पहले अमेरिका नेपाल का सबसे बड़ा द्विपक्षीय दाता था, लेकिन वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने उसे पीछे छोड़ दिया।
हालांकि, अमेरिका ने मिलेनियम चैलेंज कॉरपोरेशन (एमसीसी) के तहत अपनी मदद जारी रखी है। नेपाल में एमसीसी को लेकर विवाद भी रहा है, क्योंकि कुछ लोगों का मानना है कि इससे देश की संप्रभुता प्रभावित हो सकती है।
अमेरिका ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि इस योजना का मकसद सिर्फ नेपाल में बिजली ट्रांसमिशन लाइन और सड़कों का विकास करना है, जिसके लिए 550 मिलियन डॉलर की सहायता दी जा रही है।
नेपाल और भारत के बीच बन रही बुटवल-गोरखपुर ट्रांसमिशन लाइन का नेपाल वाला हिस्सा भी एमसीसी के तहत ही बन रहा है।
विदेश मंत्री खनाल और गोर की मुलाकात में एमसीसी पर भी बात हुई। अमेरिकी दूतावास के अनुसार, दोनों के बीच सहयोग बढ़ाने, व्यापार बढ़ाने और एमसीसी से जुड़े कामों को आगे बढ़ाने पर सकारात्मक चर्चा हुई।
नेपाल के विदेश मंत्रालय के मुताबिक, दोनों देशों ने निवेश और व्यापार को बढ़ाने पर भी जोर दिया।
राजनीतिक नेताओं से मिलने के अलावा गोर नेपाल के बिजनेस समुदाय के लोगों से भी मिलने वाले हैं। अभी तक यह साफ नहीं है कि वे प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह से मिलेंगे या नहीं, क्योंकि शाह विदेशी नेताओं से मिलने में सख्त प्रोटोकॉल फॉलो कर रहे हैं।
--आईएएनएस
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डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
यूरोपीय संसद ने चीन के ‘एथनिक यूनिटी लॉ’ की निंदा की, तिब्बती पहचान के लिए बताया खतरा
ब्रुसेल्स, 1 मई (आईएएनएस)। यूरोपीय संसद ने चीन के एथनिक यूनिटी लॉ की कड़ी निंदा की है। उसने चेतावनी दी है कि यह कानून, जो एक जुलाई से लागू होने वाला है, तिब्बती लोगों की सांस्कृतिक, धार्मिक और भाषाई पहचान को खत्म करने की एक व्यवस्थित कोशिश दिखाता है। इसमें राज्य की विचारधारा को थोपने और सभी सार्वजनिक जगहों पर स्थानीय भाषाओं की जगह मंडेरिन को प्राथमिकता देने की बात कही गई है।
इस कानून के खिलाफ यूरोपीय संसद में एक प्रस्ताव पास किया गया, जिसमें 439 सांसदों ने समर्थन में वोट दिया, 52 ने विरोध किया और 71 ने मतदान से दूरी बनाई।
यूरोपीय सांसदों ने कहा कि दलाई लामा के उत्तराधिकारी का चयन पूरी तरह धार्मिक मामला है और इसे सिर्फ तिब्बती बौद्ध परंपराओं के अनुसार ही तय किया जाना चाहिए। इसमें किसी भी सरकार का दखल नहीं होना चाहिए।
सेंट्रल तिब्बतन एडमिनिस्ट्रेशन (सीटीए) ने प्रस्ताव में कई बड़े राजनीतिक कैदियों को तुरंत और बिना शर्त रिहा करने की मांग की, जिनमें 11वें पंचेन लामा गेधुन चोएक्यी न्यिमा, चोत्रुल दोरजे रिनपोछे और पाल्डेन येशी शामिल हैं। इन सभी के बारे में लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय चिंता बनी हुई है।
सीटीए ने कहा कि यूरोपीय संसद तिब्बती समुदायों को चीन के प्रभाव से बचाने के लिए कदम उठा रही है। सांसदों ने यह भी कहा कि चीन के इस कानून का असर सिर्फ चीन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दूसरे देशों में रह रहे तिब्बतियों को भी प्रभावित कर सकता है। इसी वजह से यूरोपीय संघ के देशों से अपील की गई है कि वे चीन के साथ अपने प्रत्यर्पण (एक्स्ट्राडिशन) समझौतों को रोक दें, ताकि विदेशों में रह रहे तिब्बतियों पर दबाव और दमन रोका जा सके।
प्रस्ताव में कहा गया कि यूरोपीय संघ को मानवाधिकार उल्लंघन करने वाले अधिकारियों के खिलाफ “ईयू ग्लोबल ह्यूमन राइट्स सैंक्शंस रेजीम” लागू करना चाहिए। बहस के दौरान, यूरोपीय आयोग की मानवतावादी सहायता और संकट प्रबंधन आयुक्त हादजा लाहबीब ने तिब्बत में मानवाधिकार स्थिति पर चिंता जताई।
उन्होंने कहा कि धर्म और आस्था की स्वतंत्रता, संस्कृति और पहचान की सुरक्षा और धार्मिक समुदायों को अपने मामलों को खुद संभालने का अधिकार होना चाहिए। धार्मिक नेताओं के चयन में सरकार का दखल नहीं होना चाहिए और दलाई लामा जैसे मामलों में धार्मिक परंपराओं का सम्मान जरूरी है।
उन्होंने बताया कि यूरोपीय संघ लगातार 11वें पंचेन लामा के बारे में सही जानकारी और उनकी स्थिति व सेहत के बारे में जवाब मांगता रहेगा। इस प्रस्ताव का स्वागत करते हुए ब्रुसेल्स में दलाई लामा के कार्यालय (तिब्बत कार्यालय) की प्रतिनिधि रिगजिन जेनखांग ने यूरोपीय संसद का धन्यवाद किया। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय ध्यान लगातार बना रहना बहुत जरूरी है, ताकि चीन को जवाबदेह ठहराया जा सके और तिब्बती संस्कृति व धार्मिक विरासत को बचाने के प्रयासों को समर्थन मिल सके।
--आईएएनएस
एवाई/एबीएम
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