ध्रुव तारा बनने की कथा: जब एक छोटे से बालक की अटूट जिद और भक्ति ने उसे अमर कर दिया
Dhruva story: सनातन संस्कृति और पौराणिक ग्रंथों- विशेषकर श्रीमद्भागवत महापुराण (चतुर्थ स्कंध) में कई ऐसी प्रेरणादायक कथाएं मिलती हैं जो यह सिखाती हैं कि यदि मनुष्य के भीतर दृढ़ संकल्प, अटूट विश्वास और सच्ची लगन हो, तो वह कठिन से कठिन लक्ष्य को भी प्राप्त कर सकता है। ऐसी ही एक अद्वितीय और प्रेरणा से भरी गाथा है- बालक ध्रुव के अमर होने की कथा।
सौतेली मां का अपमान और महल से निष्कासन
उत्तानपाद नामक एक प्रतापी राजा थे, जिनकी दो रानियां थीं- सुरसची (बड़ी रानी) और सुरुचि। राजा सुरुचि से बहुत अधिक प्रेम करते थे। सुरुचि से उत्तम नाम का एक पुत्र था, जबकि सुरसची से ध्रुव का जन्म हुआ था।
एक दिन, जब बालक ध्रुव (जो तब बहुत छोटे थे) अपने पिता राजा उत्तानपाद की गोद में बैठे हुए खेल रहे थे, तभी रानी सुरुचि वहाँ आ गई। सुरुचि को यह बिल्कुल पसंद नहीं आया कि राजा का प्यार ध्रुव को मिले। उसने ईर्ष्यावश क्रूरतापूर्वक ध्रुव को राजा की गोद से खींचकर नीचे गिरा दिया और अपमानित करते हुए बोली, "तू राजा की गोद में बैठने का अधिकारी नहीं है। यदि तू इस सिंहासन पर बैठना चाहता है, तो तुझे पहले मेरी कोख से दोबारा जन्म लेना होगा।"
बालक ध्रुव रोते हुए अपनी सगी मां सुरसची के पास गए और सारा हाल सुनाया। सुरसची ने दुखी मन से समझाया कि बेटा, भगवान की इच्छा के बिना कुछ नहीं होता। उस पाँच साल के बालक के कोमल मन पर यह बात इतनी गहरी लगी कि उसने निश्चय किया कि वह ऐसा सर्वोच्च स्थान प्राप्त करेगा जिस पर आज तक कोई नहीं बैठा हो।
नारद मुनि का मार्गदर्शन और मधुवन में कठोर तपस्या
महल छोड़कर जब बालक ध्रुव वन की ओर निकल पड़े, तो मार्ग में उन्हें देवर्षि नारद मिले। नारद मुनि ने उस छोटे से बच्चे की उम्र और उसकी जिद को देखकर उसे समझाने का प्रयास किया कि अभी तुम बालक हो, घर लौट जाओ।
किंतु ध्रुव का संकल्प देखकर नारद मुनि समझ गए कि यह साधारण बालक नहीं है। नारद जी ने उन्हें भगवान विष्णु की आराधना का मार्ग बताया और उन्हें 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' महामंत्र की दीक्षा दी।
ध्रुव ने यमुना किनारे 'मधुवन' में जाकर कठोर तपस्या शुरू की। पहले महीने में उन्होंने केवल फलाहार किया, दूसरे महीने में केवल जल और सूखे पत्ते लिए, और तीसरे महीने में तो उन्होंने साँस पर नियंत्रण रखते हुए केवल हवा के सहारे भगवान का ध्यान किया। उनकी इस अति कठिन तपस्या से तीनों लोकों में हाहाकार मच गया और प्रकृति का संतुलन डगमगाने लगा।
भगवान विष्णु का प्रकट होना और अमर वरदान
बालक ध्रुव की अटूट भक्ति और निष्ठा से प्रसन्न होकर अंततः भगवान विष्णु अपने दिव्य स्वरूप में गरुड़ पर सवार होकर प्रकट हुए। उन्होंने प्रेम से अपने शंख से ध्रुव के गाल को छुआ, जिससे ध्रुव को दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हुई और उनके मुँह से स्तुति फूट पड़ी।
भगवान विष्णु ने ध्रुव से वर मांगने को कहा। ध्रुव ने हाथ जोड़कर कहा, "हे प्रभु! मुझे अब संसार का कोई भी राज्य या वैभव नहीं चाहिए, मुझे तो आपके चरण कमलों की वह सर्वोच्च भक्ति चाहिए जो ब्रह्मांड में सबसे ऊपर हो।"
भगवान विष्णु ने प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद दिया और कहा कि तुम्हारी यह तपस्या अमर रहेगी। प्रलय के समय भी जिस स्थान का नाश नहीं होता, तुम्हें आकाश में सप्तर्षियों से भी ऊपर 'ध्रुव तारा' (Pole Star) के रूप में ऐसा अटल स्थान मिलेगा, जिसके चारों ओर सारे ग्रह और नक्षत्र परिक्रमा करेंगे।
डिस्क्लेमर (Disclaimer): इस लेख में प्रस्तुत कथाएं सनातन धर्म के पौराणिक ग्रंथों और पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित हैं। इनका उद्देश्य पाठकों तक भारतीय संस्कृति, इतिहास और लोक-साहित्य के महत्वपूर्ण प्रसंगों की जानकारी पहुंचाना मात्र है।
Shravan Krishna Chaturdashi 2026: श्रावण कृष्ण चतुर्दशी कब है? जानें तिथि, पूजा का शुभ मुहूर्त
श्रावण मास भगवान शिव की आराधना के लिए सबसे पवित्र महीनों में माना जाता है। इस माह की कृष्ण पक्ष चतुर्दशी का विशेष धार्मिक महत्व है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और विधि-विधान से भगवान शिव की पूजा, जलाभिषेक और रुद्राभिषेक करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं तथा सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है। आइए जानते हैं श्रावण कृष्ण चतुर्दशी की तिथि, पूजा का शुभ समय, महत्व और पूजा विधि।
श्रावण कृष्ण चतुर्दशी का धार्मिक महत्व
सनातन धर्म में श्रावण मास की प्रत्येक तिथि विशेष मानी जाती है, लेकिन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी भगवान शिव को समर्पित मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन शिवलिंग का जलाभिषेक, पंचामृत अभिषेक और महामृत्युंजय मंत्र का जाप अत्यंत शुभ माना जाता है। भक्त इस दिन व्रत रखकर शिव परिवार की पूजा करते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि तथा आरोग्य की कामना करते हैं।
पूजा कैसे करें?
सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद शिवलिंग पर गंगाजल, शुद्ध जल, दूध, दही, शहद, घी और शक्कर से अभिषेक करें। भगवान शिव को बेलपत्र, धतूरा, आक के फूल, सफेद चंदन और भस्म अर्पित करें। पूजा के दौरान 'ॐ नमः शिवाय' और महामृत्युंजय मंत्र का श्रद्धापूर्वक जाप करें। अंत में शिव आरती कर प्रसाद वितरित करें।
इस दिन क्या करें?
- भगवान शिव का रुद्राभिषेक करें।
- जरूरतमंद लोगों को अन्न, वस्त्र या दक्षिणा का दान दें।
- शिव चालीसा और शिव पुराण का पाठ करें।
- पूरे दिन सात्विक भोजन और संयम का पालन करें।
- किन बातों का रखें ध्यान?
- तामसिक भोजन, शराब और मांसाहार से दूर रहें।
- किसी का अपमान या कटु वचन न बोलें।
- क्रोध और विवाद से बचें।
- पूजा में टूटा हुआ बेलपत्र या बासी फूल अर्पित न करें।
क्या मिलता है इस व्रत का फल?
धार्मिक मान्यता है कि श्रावण कृष्ण चतुर्दशी पर श्रद्धापूर्वक भगवान शिव की पूजा करने से मानसिक शांति, रोगों से राहत, परिवार में सुख-समृद्धि और कार्यों में सफलता का आशीर्वाद मिलता है। शिव कृपा से जीवन की कई बाधाएं दूर होने की भी मान्यता है।
नोट: तिथि और पूजा का शुभ मुहूर्त आपके शहर के पंचांग के अनुसार थोड़ा अलग हो सकता है। पूजा से पहले स्थानीय पंचांग या योग्य ज्योतिषाचार्य से समय की पुष्टि कर लें।
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