29 अप्रैल 1988: वो ब्लॉकबस्टर फिल्म, जिससे हुआ 1 ऐसे सुपरस्टार का जन्म, डेब्यू से लेकर अब तक नहीं हुआ स्टारडम कम
38 साल पहले, 29 अप्रैल 1988 को जब एक मासूम चेहरे ने थिएटर में अपनी गर्लफ्रेंड के लिए 'पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा' गाया था, तो किसी ने सोचा भी नहीं था कि यह लड़का बॉलीवुड का 'मिस्टर परफेक्शनिस्ट' बनेगा. 'कयामत से कयामत तक' ने न सिर्फ आमिर खान को रातोंरात सुपरस्टार बना दिया, बल्कि एक्शन फिल्मों के शोर के बीच रोमांस को भी फिर से जिंदा कर दिया. अपने डेब्यू से लेकर 2026 तक आमिर खान का स्टारडम कभी फीका नहीं पड़ा. यह उस लॉन्च की कहानी है, जिसने बॉलीवुड में खान युग की नींव रखी और बॉक्स ऑफिस के डायनामिक्स को हमेशा के लिए बदल दिया.
विधवा से विवाह करने पर दंपत्ति को समाज ने ठुकराया, सागर में इंसानियत पर सवाल, कलेक्टर से न्याय की गुहार
समाज बदल रहा है, लोग आगे बढ़ रहे हैं। लेकिन सागर जिले की यह घटना बताती है कि कुछ जगहों पर आज भी पुरानी सोच जिंदा है। एक युवक ने विधवा महिला से शादी करके एक नई शुरुआत की, लेकिन यही कदम उसके लिए मुसीबत बन गया।
जिस शादी को लोग सराह सकते थे, उसी शादी के बाद दंपत्ति को गांव से अलग-थलग कर दिया गया। वजह सिर्फ इतनी थी कि उन्होंने गांव वालों को भोज नहीं कराया। अब यह मामला प्रशासन तक पहुंच चुका है और न्याय की उम्मीद वहीं से है।
विधवा विवाह के बाद सामाजिक बहिष्कार
मध्य प्रदेश के सागर जिले के चितौरा गांव से सामने आया यह मामला सिर्फ एक परिवार की परेशानी नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए आईना है। यहां एक युवक ने मुख्यमंत्री कल्याणी विवाह योजना के तहत एक विधवा महिला से शादी की।
शादी के बाद दोनों पति-पत्नी सामान्य जीवन जी रहे थे, लेकिन गांव के कुछ लोगों को यह स्वीकार नहीं हुआ। धीरे-धीरे दबाव बनाया गया कि समाज में रहने के लिए उन्हें पूरे गांव को भोज कराना होगा। जब दंपत्ति ने यह शर्त मानने से इनकार किया, तो उनके खिलाफ सामाजिक बहिष्कार का फैसला सुना दिया गया। इस सामाजिक बहिष्कार के बाद दंपत्ति को गांव में रहना मुश्किल हो गया। उनके साथ-साथ महिला की छोटी बच्ची भी इस फैसले का शिकार बन गई।
परंपरा या दबाव?
गांव के कुछ लोगों ने इस पूरे मामले को परंपरा का नाम दिया। उनका कहना था कि विधवा विवाह के बाद समाज में स्वीकार्यता पाने के लिए भोज कराना जरूरी है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या किसी परंपरा के नाम पर किसी को मजबूर करना सही है? क्या समाज में रहने के लिए ऐसे नियम जरूरी हैं?
पीड़ित युवक राजेंद्र पटेल का कहना है कि उन्होंने अपनी क्षमता के अनुसार शादी की और किसी को नुकसान नहीं पहुंचाया। फिर भी उनसे ऐसी शर्तें रखी गईं, जो उनके लिए संभव नहीं थीं। इस घटना ने यह साफ कर दिया कि कई जगहों पर आज भी सामाजिक दबाव इतना ज्यादा है कि लोग अपनी मर्जी से फैसले नहीं ले पाते।
मानसिक प्रताड़ना और अलग-थलग किया गया परिवार
पीड़ित दंपत्ति ने आरोप लगाया है कि उन्हें लगातार मानसिक रूप से परेशान किया जा रहा है। गांव के लोग उनसे दूरी बना रहे हैं और किसी भी सामाजिक कार्यक्रम में उन्हें बुलाया नहीं जाता।
सबसे ज्यादा असर उस मासूम बच्ची पर पड़ा है, जिसे दूसरे बच्चों के साथ खेलने तक नहीं दिया जा रहा। यह स्थिति न सिर्फ दुखद है, बल्कि समाज के संवेदनहीन रवैये को भी दिखाती है।
परिवार का कहना है कि उन्हें रोजमर्रा की जिंदगी में भी कई मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। कोई उनके घर नहीं आता और न ही उन्हें किसी काम में सहयोग मिलता है।
कलेक्टर से न्याय की गुहार
लगातार बढ़ती परेशानियों के बाद दंपत्ति ने सागर कलेक्टर कार्यालय पहुंचकर शिकायत दर्ज कराई है। उन्होंने प्रशासन से मांग की है कि दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए और उन्हें सुरक्षा दी जाए।
प्रशासन ने मामले को गंभीरता से लिया है और जांच शुरू कर दी है। अब देखना होगा कि प्रशासन इस मामले में क्या कदम उठाता है और पीड़ित परिवार को कब तक राहत मिलती है। यह मामला सिर्फ एक गांव का नहीं है, बल्कि उन सभी जगहों का है जहां आज भी समाज के नाम पर लोगों पर दबाव बनाया जाता है।
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