भारत का लोकतंत्र केवल एक प्रशासनिक ढांचा नहीं, बल्कि समानता, न्याय और जनभागीदारी की सशक्त अभिव्यक्ति है। जब इस व्यवस्था में आधी आबादी—नारी शक्ति—को सार्थक और प्रभावी प्रतिनिधित्व मिलता है, तभी विकास संतुलित और समावेशी बनता है। “नारी शक्ति वंदन अधिनियम” इसी विचार का प्रतीक है, जो केवल संवैधानिक संशोधन नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और ऐतिहासिक संघर्ष की परिणति है। भारतीय इतिहास इस सत्य का साक्षी है कि महिलाओं ने सदैव नेतृत्व और सुशासन में अपनी क्षमता सिद्ध की है। अहिल्याबाई होलकर इसका उत्कृष्ट उदाहरण हैं, जिन्हें ‘प्रजा की माता’ और आदर्श शासिका के रूप में स्मरण किया जाता है। उनके शासन में न्याय, संवेदनशीलता और लोक कल्याण सर्वोपरि रहे।
स्वतंत्र भारत में 73वें संविधान संशोधन (1993) ने पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण सुनिश्चित कर लोकतंत्र को जमीनी स्तर पर सशक्त बनाया। आज लगभग 13 लाख निर्वाचित महिला प्रतिनिधि इस परिवर्तन की सशक्त मिसाल हैं। कई राज्यों ने इसे बढ़ाकर 50% तक कर दिया है, जिससे स्थानीय शासन में महिलाओं की निर्णायक भूमिका स्थापित हुई है। भले ही “सरपंच पति” जैसी प्रवृत्तियाँ सामने आईं, परंतु इसके पीछे एक गहरी क्रांति थी—ग्रामीण भारत में पहली पीढ़ी की महिला नेताओं का उदय। धीरे-धीरे महिलाएँ निष्क्रिय मतदाता से सक्रिय राजनीतिक शक्ति में परिवर्तित हो गईं। उत्तर प्रदेश सहित विभिन्न राज्यों में महिला प्रतिनिधियों ने शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता और पोषण जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दिया है।
सितंबर 2023 में भारतीय संसद ने इस ऐतिहासिक विधेयक को पारित कर लोकतांत्रिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ा। 106वें संविधान संशोधन के रूप में लाया गया यह अधिनियम लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण सुनिश्चित करता है, जिसमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग की महिलाओं को भी समुचित प्रतिनिधित्व दिया गया है। यह कदम केवल विधायी परिवर्तन नहीं, बल्कि लोकतंत्र को अधिक न्यायपूर्ण, समावेशी और प्रतिनिधिक बनाने का दूरदर्शी प्रयास है।
वर्तमान भारत में एक दिलचस्प किंतु चिंताजनक विरोधाभास उभरकर सामने आता है। महिलाएँ मतदान में पुरुषों के बराबर, बल्कि कई बार उनसे अधिक सक्रिय भागीदारी निभा रही हैं। 2024 के आम चुनावों में महिलाओं का मतदान प्रतिशत लगभग 65.8% रहा, जो पुरुषों से थोड़ा अधिक है। पिछले वर्षों में असम, तमिलनाडु और ओडिशा जैसे राज्यों में भी महिलाओं ने मतदान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है, जो उनकी जागरूकता और लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता को दर्शाता है। इसके बावजूद, संसद में उनका प्रतिनिधित्व अब भी लगभग 14–15% तक सीमित है। उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया में पुरुष वर्चस्व आज भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यह अंतर केवल संख्याओं का नहीं, बल्कि संरचनात्मक असमानताओं का परिणाम है। चुनावी राजनीति में वित्तीय संसाधनों तक महिलाओं की सीमित पहुँच, सामाजिक जिम्मेदारियों का असंतुलित बोझ और व्यक्तिगत सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियाँ उनके राजनीतिक सफर को कठिन बनाती हैं। यह स्पष्ट करता है कि केवल इच्छा और क्षमता पर्याप्त नहीं—सशक्त भागीदारी के लिए उन्हें ठोस संस्थागत और संरचनात्मक समर्थन की आवश्यकता है।
इसी निरंतर जागरूकता, संघर्ष और सहभागिता का परिणाम है—“नारी शक्ति वंदन अधिनियम”, जो भारत के लोकतांत्रिक विकास में एक नए युग का उद्घोष करता है। यह अधिनियम केवल एक नीति नहीं, बल्कि सशक्त भारत के संकल्प का सजीव प्रतीक है। यह महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने का माध्यम भर नहीं, बल्कि उस लोकतांत्रिक चेतना का विस्तार है जहाँ निर्णय प्रक्रिया में नारी की आवाज़ समान रूप से गूंजती है और उसे सम्मानपूर्वक स्थान मिलता है।
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने नारी सशक्तिकरण .. “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ”, “उज्ज्वला योजना”, “जन धन योजना”, “प्रधानमंत्री आवास योजना” और “सुकन्या समृद्धि योजना” जैसी पहलों ने देश की करोड़ों महिलाओं के जीवन में आत्मविश्वास, सुरक्षा और स्वाभिमान का संचार किया है। 10 करोड़ से अधिक महिलाओं को उज्ज्वला योजना का लाभ, 70% से अधिक घरों का स्वामित्व महिलाओं के नाम, और 3 करोड़ से अधिक सुकन्या समृद्धि खाते—ये आंकड़े नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर भारत की नई कहानी हैं, जहाँ नारी अब लाभार्थी नहीं, बल्कि परिवर्तन की वाहक बन चुकी है।.. इसी सशक्त यात्रा का अगला स्वाभाविक और निर्णायक कदम —“नारी शक्ति वंदन अधिनियम”, जो नारी नेतृत्व को नई ऊँचाइयों तक ले जाने का सशक्त माध्यम है। इसकी रोटेशन व्यवस्था सुनिश्चित करती है कि देश के विभिन्न क्षेत्रों की महिलाओं को नेतृत्व का अवसर मिले, जिससे लोकतंत्र अधिक व्यापक, समावेशी और गतिशील बने।
इस अधिनियम की सबसे बड़ी शक्ति इसके दूरगामी प्रभाव में निहित है। यह एक मजबूत “क्रिटिकल मास” तैयार करेगा, जो प्रतीकात्मक भागीदारी को वास्तविक शक्ति में बदल देगा। यह पंचायत से संसद तक एक सुदृढ़ नेतृत्व श्रृंखला का निर्माण करेगा और राजनीति की प्राथमिकताओं को नया स्वर देगा—जहाँ शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और सामाजिक सुरक्षा केंद्र में होंगे। साथ ही, यह अधिनियम राजनीति की संस्कृति को भी रूपांतरित करने की क्षमता रखता है—संवाद, संवेदनशीलता और समावेशन पर आधारित एक नई राजनीतिक धारा का निर्माण करते हुए यह केवल महिलाओं को स्थान नहीं देता, बल्कि लोकतंत्र को अधिक मानवीय, संतुलित और प्रभावी बनाता है।
यदि यह प्रक्रिया सफलतापूर्वक आगे बढ़ती है, तो भारत एक ऐतिहासिक और प्रेरणादायक उपलब्धि हासिल करेगा—जहाँ सामाजिक वास्तविकता और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के बीच सच्चा सामंजस्य स्थापित होगा। भारतीय महिलाओं ने मतदाता के रूप में अपनी जागरूकता, परिपक्वता और निर्णायक शक्ति पहले ही सिद्ध कर दी है; अब समय है कि राजनीतिक संरचना भी उसी शक्ति और परिपक्वता को प्रतिबिंबित करे। जब महिलाएँ नीति-निर्माण, प्रशासन और सामाजिक परिवर्तन में सक्रिय भूमिका निभाती हैं, तो उनके निर्णयों में पारदर्शिता, संवेदनशीलता, समावेशिता और सामाजिक न्याय का स्वाभाविक समावेश होता है। वे केवल वर्तमान की चुनौतियों का समाधान नहीं करतीं, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए स्थायी और संतुलित विकास का मार्ग भी प्रशस्त करती हैं।
नारी दृष्टि में “गवर्नेंस” केवल नियमों और कानूनों के पालन तक सीमित नहीं होता, बल्कि यह संवेदना, करुणा और सामाजिक उत्तरदायित्व से परिपूर्ण एक जीवंत प्रक्रिया है। यह दृष्टिकोण नेतृत्व को मानवीय बनाता है और निर्णयों को अधिक व्यापक, न्यायसंगत और प्रभावी दिशा देता है। यही संतुलन—व्यक्तिगत और सामूहिक हितों के बीच—एक सशक्त और टिकाऊ लोकतंत्र की पहचान है। स्थानीय स्तर से लेकर राष्ट्रीय मंच तक, जब नारी शक्ति नेतृत्व का हिस्सा बनती है, तब सुशासन केवल एक लक्ष्य नहीं, बल्कि एक साकार होती हुई वास्तविकता बन जाता है।
डॉ शिवानी कटारा
(लेखिका लोक स्वास्थ्य एवं सामाजिक विषयों की अध्येता हैं)
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छह महीने पहले शर्म अल शेख के मंच पर खड़ी इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को शायद अंदाजा भी नहीं था कि जिस राजनीतिक रिश्ते को वह अपनी सबसे बड़ी ताकत समझ रही हैं, वही उनके लिए सबसे बड़ा बोझ बन जाएगा। उस मंच पर डोनाल्ड ट्रंप ने उनकी तारीफों के पुल बांधे, उन्हें सुंदर बताया, लेकिन वही ट्रंप आज उनके साहस पर सवाल उठा रहे हैं। यह कहानी सिर्फ दो नेताओं के टकराव की नहीं है, बल्कि यह बदलती वैश्विक राजनीति, युद्ध की भयावहता और जनता की बेचैनी की कहानी है।
हम आपको बता दें कि ट्रंप और मेलोनी का रिश्ता शुरुआत से ही विचारधारा पर टिका था। दोनों राष्ट्रवादी राजनीति के चेहरे रहे, दोनों ने सख्त प्रवासन नीतियों का समर्थन किया और दोनों खुद को मजबूत नेता के रूप में पेश करते रहे। मेलोनी ने तो ट्रंप के करीब आने के लिए हर संभव प्रयास किया। वह उनके फ्लोरिडा स्थित आवास तक गईं और यूरोप की इकलौती नेता बनीं जो उनके शपथ ग्रहण समारोह में शामिल हुईं। लेकिन राजनीति में रिश्ते उतनी ही तेजी से टूटते हैं जितनी तेजी से बनते हैं।
ईरान युद्ध ने इस रिश्ते की असलियत सामने ला दी। ट्रंप चाहते थे कि इटली अमेरिका और इजराइल के साथ युद्ध में खुले तौर पर शामिल हो, लेकिन मेलोनी ने साफ इंकार कर दिया। यही वह मोड़ था जहां से ट्रंप का रवैया बदल गया। उन्होंने मेलोनी को कायर तक कह दिया और आरोप लगाया कि वह ईरान के परमाणु खतरे को गंभीरता से नहीं ले रहीं। यह हमला सिर्फ राजनीतिक नहीं था, बल्कि व्यक्तिगत भी था।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। जब ट्रंप ने पोप लियो पर हमला किया और उन्हें कमजोर बताया, तब मेलोनी ने इसे अस्वीकार्य कहा। यह बयान भले ही दबाव में दिया गया हो, लेकिन इसका असर गहरा था। इटली एक ऐसा देश है जहां पोप का सम्मान बेहद गहरा है और जनता युद्ध के खिलाफ खड़ी रहती है। ऐसे में मेलोनी ने पहली बार खुलकर ट्रंप के खिलाफ आवाज उठाई।
विश्लेषकों का मानना है कि यह टकराव मेलोनी के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। हाल ही में हुए जनमत संग्रह में उनकी सरकार को करारी हार मिली थी। जनता में असंतोष बढ़ रहा था और ईरान युद्ध की वजह से बढ़ती महंगाई ने उनकी मुश्किलें और बढ़ा दी थीं। ऐसे समय में ट्रंप से दूरी बनाना उनके लिए राजनीतिक रूप से फायदेमंद साबित हो सकता है। इसीलिए मेलोनी ने धीरे धीरे अपनी रणनीति बदलनी शुरू कर दी है। उन्होंने ईरान युद्ध में भागीदारी से इंकार किया, सिसिली के सैन्य अड्डे के इस्तेमाल की अनुमति नहीं दी और इजराइल के साथ रक्षा समझौते को भी रोक दिया। यह सब संकेत हैं कि वह अब खुद को एक संतुलित और स्वतंत्र नेता के रूप में पेश करना चाहती हैं।
लेकिन यह बदलाव आसान नहीं है। मेलोनी अभी भी एक पतली रस्सी पर चल रही हैं। एक तरफ उन्हें अमेरिका के साथ अपने पुराने रिश्ते को पूरी तरह तोड़ना नहीं है, दूसरी तरफ उन्हें घरेलू राजनीति में अपनी छवि सुधारनी है। यही वजह है कि उनके बयान कई बार संतुलित और अस्पष्ट नजर आते हैं।
इस पूरे घटनाक्रम में एक और दिलचस्प पहलू है हंगरी के नेता विक्टर ओर्बान की हार। ओर्बान ट्रंप के करीबी सहयोगी माने जाते थे। उनकी हार ने मेलोनी को यह संकेत दिया कि ट्रंप के साथ खड़े रहना अब राजनीतिक रूप से जोखिम भरा हो सकता है। देखा जाये तो इटली की जनता की प्राथमिकताएं साफ हैं। उन्हें अंतरराष्ट्रीय राजनीति से ज्यादा अपने घरेलू मुद्दों की चिंता है। बढ़ती गैस की कीमतें, महंगाई और आर्थिक दबाव उनके लिए असली मुद्दे हैं। ऐसे में अगर मेलोनी सिर्फ वैश्विक मंच पर बयान देती रहें और घरेलू समस्याओं का समाधान न कर पाएं, तो उनका राजनीतिक भविष्य खतरे में पड़ सकता है।
हालांकि अभी भी उनकी पार्टी और उनका नेतृत्व चुनावी सर्वेक्षणों में आगे है, लेकिन यह बढ़त स्थायी नहीं है। इटली में विपक्ष भले ही बिखरा हुआ हो, लेकिन अगर उसने एक मजबूत विकल्प पेश कर दिया तो समीकरण बदल सकते हैं।
देखा जाये तो यह साफ है कि मेलोनी एक बड़े राजनीतिक मोड़ पर खड़ी हैं। ट्रंप से दूरी बनाना उनके लिए एक रणनीतिक कदम है, लेकिन असली चुनौती घरेलू मोर्चे पर है। अगर वह जनता की आर्थिक परेशानियों को दूर नहीं कर पाईं, तो कोई भी चाल उनकी राजनीति को बचा नहीं पाएगी। बहरहाल, यह पूरा घटनाक्रम एक कड़वा सच उजागर करता है। वैश्विक राजनीति में दोस्ती स्थायी नहीं होती, हित स्थायी होते हैं। और जब हित टकराते हैं, तो सबसे मजबूत रिश्ते भी टूट जाते हैं। मेलोनी और ट्रंप की कहानी इसका ताजा उदाहरण है।
-नीरज कुमार दुबे
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