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अरागची ने ओमान के सुल्तान से की बात, होर्मुज तटवर्ती देशों में सहयोग पर फोकस

ईरान के विदेश मंत्री अरागची ने ओमान के सुल्तान से मुलाकात कर होर्मुज तटवर्ती देशों के बीच समुद्री सुरक्षा पर चर्चा की. अमेरिका-इजराइल संघर्ष के बीच सुरक्षित समुद्री आवागमन सुनिश्चित करना मुख्य लक्ष्य था. अरागची ने क्षेत्रीय सहयोग, द्विपक्षीय संबंधों और पड़ोसी देशों की प्राथमिकता पर जोर दिया.

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विनोद खन्ना की पुण्यतिथि, पिता ने पिस्तौल तानी:अमिताभ ने फेंका ग्लास, तो टांके आए: महेश भट्ट को धमकाया, आखिरी ख्वाहिश थी- पाकिस्तान जाना

लंबी कद-काठी, गोरी रंगत और गहरी आंखें। 18 साल की उम्र में कॉलेज के दिनों में कई लड़कियां विनोद खन्ना के लुक की तारीफ करती नहीं थकती थीं। सबका एक ही सुझाव था, ‘हीरो जैसे लगते हो, फिल्मों में जाओ’, लेकिन विनोद के पिता चाहते थे बेटा पढ़ाई पूरी कर खानदानी टेक्सटाइल बिजनेस संभाले। विनोद का बागी रवैया तभी शुरू हो गया था, जब उन्होंने पिता के कहने पर कॉमर्स के बजाय साइंस चुना। एक रोज उनकी कॉलेज पार्टी में कुछ फिल्मी हस्तियां पहुंचीं, जिनमें उस दौर के नामी हीरो सुनील दत्त और उनकी दोस्त अंजू महेंद्रू भी थीं। वो देखना चाहते थे कि टीनएजर्स किस तरह पार्टी करते थे। हर बार की तरह उस पार्टी में भी विनोद ने सबका ध्यान खींच लिया। सुनील दत्त की नजरें भी बार-बार विनोद पर पड़ीं। उस समय सुनील अपने भाई सोम दत्त को लॉन्च करने वाले थे। अगले दिन सुनील दत्त ने विनोद को दफ्तर में बुलाया और फिल्म ऑफर कर दी। कोई भी ये सुनकर बेहद खुश होता, लेकिन विनोद घबराए हुए थे। वो जानते थे पिता कभी राजी नहीं होंगे। उस शाम वो घर पहुंचे और हिम्मत जुटाकर पिता से कहा, ‘मुझे फिल्म में काम मिला है।’ पिता ने आव देखा न ताव सीधे बंदूक तान दी और कहा- ‘अगर फिल्मों में गए तो गोली मार दूंगा।’ मां ने किसी तरह पिता को खूब समझाया। आखिरकार पिता का दिल पिघला और उन्होंने शर्त रखी, ‘2 साल का वक्त दे रहा हूं, फिल्मों में कुछ हुआ तो ठीक वर्ना बिजनेस संभालना।’ इस तरह 1968 में विनोद खन्ना का फिल्मों से रिश्ता जुड़ा, जो उनके निधन तक कायम रहा। 27 अप्रैल 2017 में विनोद खन्ना का 70 साल की उम्र में निधन हुआ था। आज उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर जानिए उनके करियर, अमिताभ बच्चन से राइवलरी और स्टारडम छोड़ संन्यासी बनने से जुड़े चुनिंदा किस्से- किस्सा-1 जब अमिताभ ने फेंककर मारा ग्लास, लगाने पड़े टांके विनोद खन्ना की पहली फिल्म मन का मीत (1968) फ्लॉप रही, लेकिन विनोद खन्ना को इसकी बदौलत कई बड़ी फिल्मों में काम मिलने लगे। 1970 में विनोद राजेश खन्ना के साथ सच्चा झूठा, आन मिलो सजना में और मनोज कुमार के साथ पूरब पश्चिम में नजर आए। तीनों फिल्में सुपरहिट रहीं और विनोद खन्ना को स्टारडम हासिल हो गया। आगे बतौर लीड हीरो मेरे अपने, मेरा गांव मेरा देश, दो यार, हाथ की सफाई, इम्तिहान जैसी फिल्मों ने उन्हें इंडस्ट्री के टॉप एक्टर्स में शुमार किया। 1977 में विनोद खन्ना को मल्टीस्टारर फिल्म अमर अकबर एंथोनी में अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर के साथ कास्ट किया गया। ये उस दौर की अपनी तरह की इकलौती फिल्म थी, जिसमें अमिताभ-विनोद जैसे फिल्म इंडस्ट्री के दो ऐसे स्टार्स थे, जिनके बीच टॉप एक्टर की होड़ मची थी। दोनों में राइवलरी थी। ये फिल्म हिट रही, तो दोनों को फिर मुकद्दर का सिकंदर में साथ कास्ट किया गया। फिल्म के एक सीन के लिए अमिताभ बच्चन को बार में खड़े होकर विनोद पर कांच का ग्लास फेंकना था और विनोद को बचना था। जैसे ही एक्शन बोला गया, अमिताभ ने ग्लास फेंक दिया, लेकिन वो विनोद खन्ना के चेहरे पर लगा। खूब खून बहा और एक्टर का टांके लगवाने पड़े। अमिताभ बच्चन ही उन्हें अस्पताल लेकर गए और बाद में घर छोड़ा। घर छोड़ते हुए भी उन्होंने विनोद और पत्नी से माफी मांगी। लेकिन लोगों का मानना था कि इस हादसे से उनकी गहरी दोस्ती टूट गई और दोनों में कुछ समय के लिए बातचीत बंद हो गई। ओशो के भाई स्वामी शैलेंद्र सरस्वती ने गलाटा इंडिया को दिए इंटरव्यू में बताया था कि ओशो को लगता था कि विनोद खन्ना, अमिताभ बच्चन से चिढ़ते हैं। उन्होंने विनोद को अमिताभ के खिलाफ चुनाव में खड़े होने का भी सुझाव दिया था। किस्सा-2 परिवार में हो रहीं मौतों से डरे, दोस्त महेश भट्ट के कहने पर ओशो के आश्रम गए एक दौर में महेश भट्ट और विनोद खन्ना की दोस्ती चर्चा में थी। महेश भट्ट के स्ट्रगल के दिनों में विनोद खन्ना कई बार उनका खर्चा भी उठाते थे। 1971 में विनोद ने गीतांजलि से शादी की थी। 1975 में पत्नी ने बेटे अक्षय खन्ना को जन्म दिया। उसी समय 6 महीनों के अंतराल में ही एक-एक कर परिवार में 4 मौतें हो गईं। जिसमें उनकी मां कमला खन्ना और एक बहन भी शामिल थीं। ये देखउन्हें मौत का आभास होने लगा। वो डरने लगे कि कहीं उनकी भी मौत न हो जाए। इस समय उन्हें दोस्त महेश भट्ट ने ओशो के आश्रम जाने का सुझाव दिया। कुछ समय के लिए वो पुणे स्थित आश्रम जाकर रहे। 1977 में एक दिन विनोद खन्ना ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इंडस्ट्री छोड़ संन्यासी बनने की घोषणा की। इससे उन्हें फिल्ममेकर्स की आलोचना का सामना करना पड़ा, क्योंकि उनके पास कई फिल्में थीं। विनोद ने वादा किया कि वो सभी फिल्में पूरी करेंगे। फिल्में पूरी होते ही वो 1981 में यूएसए के ओरेगन स्थित ओशो के आश्रम रजनीशपुरम में जाकर रहने लगे। किस्सा-3 महेश भट्ट ने माला कमोड में फेंकी, तो दी धमकी विनोद खन्ना के साथ महेश भट्ट भी ओशो के आश्रम गए थे। वहां उन्हें माला पहनाई गई थी, जिसमें ओशो की तस्वीर थी। कुछ दिनों बाद जब महेश भट्ट लौटे, तो उन्होंने वो माला तोड़कर टॉयलेट में फेंक दी। जैसे ही ये बात विनोद को पता चली, वो बहुत गुस्सा हुए। उन्हें एक दिन महेश भट्ट को फिल्मिस्तान स्टूडियो बुलाया और कहा- भगवान तुमसे बहुत नाराज हैं। महेश ने पूछा क्यों?, तो जवाब मिला- क्योंकि तुमने माला तोड़ दी और कमोड में फेंक दी। महेश ने फिर कहा- मुझे वो कुत्ते के पट्टे की तरह लगती थी। विनोद ने ये सुनकर कहा- उन्होंने (कथित तौर पर ओशो ने) कहा है कि महेश से कहो कि वो खुद मुझे वो माला लाकर दे। आगे विनोद ने खुसफुसाते हुए कहा- उन्होंने कहा कि अगर ऐसा नहीं किया, तो वो तुम्हें बर्बाद कर देंगे। ये किस्सा खुद महेश भट्ट ने अरबाज खान के चैट शो द इन्विन्सिबल विद अरबाज खान में सुनाया था। किस्सा- 4 ओशो के आश्रम में टॉयलेट साफ किए, तंग कमरे में गुजारे कई दिन विनोद खन्ना आश्रम में ही बने सादे लाल जोड़े पहनते थे, आम लोगों की तरह आश्रम में टॉयलेट साफ करते थे। वहां रहते हुए विनोद खन्ना ने अपना नाम स्वामी विनोद भारती कर लिया था। 1994 में ओशो टाइम्स को दिए इंटरव्यू में विनोद खन्ना ने कहा था- मेरे अंदर से मौत का डर हटाने के लिए मुझे एक ऐसे कमरे में रखा गया, जहां दो मौतें हुई थीं। वो कमरा इतना छोटा था, जहां पैर भी फैलाए नहीं जा सकते थे। लेकिन वहां शांति थी। ओशो के घर में जाने की इजाजत किसी को नहीं थी, लेकिन विनोद को वहां माली बना दिया गया, जिससे उन्हें वहीं सोने की भी जगह मिल गई। विनोद और ओशो के कंधों का साइज लगभग एक जैसा था, ऐसे में जब भी ओशो के डिजाइनर उनके नए कपड़े लाते, तो उसका ट्रायल विनोद पर ही किया जाता था। ओशो को ओरेगन से निकाले जाने से ठीक पहले एक कजिन विनोद को 1984 में भारत लाए। जिसके कुछ समय बाद ही ओशो की सेक्रेटरी की गिरफ्तारी हुई और ओरेगन का रजनीशपुरम खत्म हो गया। किस्सा-5 ओशो ने दी आश्रम चलाने की जिम्मेदारी, तो कर दिया इनकार जब ओशो को विवाद के चलते ओरेगन से भारत लाया गया, तो विनोद खन्ना उनसे मिलने पुणे स्थित आश्रम नहीं गए। कुछ समय बाद ओशो का दिल्ली जाना हुआ, तो विनोद उनसे मिलने पहुंचे। ओशो के कहने पर विनोद खुद ड्राइव कर उन्हें मनाली ले गए, जहां वो कुछ दिन ठहरे। लौटते हुए ओशो ने विनोद खन्ना से कहा- मैं चाहता हूं कि तुम पुणे के आश्रम के इनचार्ज बनो। विनोद ने जवाब में साफ इनकार कर दिया। उस दिन के बाद विनोद कभी ओशो से नहीं मिले। 5 सालों तक फिल्मों से दूर रहने के बाद विनोद खन्ना ने फिल्म इंसाफ (1987) से हिंदी सिनेमा में कमबैक किया। आगे उनकी फिल्म दयावान भी रिलीज हुई, लेकिन हिट हुई फिल्म सूर्या (1989)। आगे ऋषि कपूर और श्रीदेवी के साथ आई उनकी फिल्म चांदनी ब्लॉकबस्टर रही। बढ़ती उम्र के साथ विनोद खन्ना साइड रोल में नजर आने लगे। आखिरी सालों में उन्होंने वॉन्टेड, दबंग, दबंग 2 और दिलवाले में काम किया है। किस्सा- 6 हाउसपार्टी में मिलीं फ्यूचर वाइफ, डेट पर जाने से किया इनकार विनोद खन्ना की शादी 1971 में भारत के पहले क्रिकेट कमेंटेंटर एएफएस तालेयरखान की बेटी गीतांजलि तालेयर से हुई थी, जिससे उन्हें दो बेटे अक्षय खन्ना और राहुल खन्ना हुए। 1985 में दोनों का तलाक हो गया। आश्रम से लौटने के बाद विनोद ने 43वें बर्थडे की पार्टी रखी। उस पार्टी में उनके कुछ दोस्त कविता दफ्तरी को ले आए। वो अनइनवाइटेड, दोस्तों के कहने पर पार्टी में आई थीं। वो बस इतना जानती थीं कि विनोद एक एक्टर हैं। पार्टी में उनकी विनोद से बात नहीं हुई। जाते हुए कविता ने देखा कि विनोद की सीढ़ियां गुलदस्तों से भरी हैं। विनोद बाहर तक छोड़ने आए तो कविता ने कहा- आप इन गुलदस्तों का क्या करेंगे। विनोद ने कहा- मैं इन्हें रखूंगा। कविता ने फिर कहा- इन्हें किसी हॉस्पिटल भेज दीजिए। वर्ना ये मर जाएंगे। जवाब मिला- मेरे फूल कभी नहीं मरते। अगले दिन विनोद ने कविता का नंबर ढूंढा और कॉल कर डिनर पर चलने को पूछा। कविता ने ये कहते हुए इनकार कर दिया कि वो दोस्त बन सकती हैं, लेकिन डेट पर नहीं जाना चाहतीं। इनकार के बाद विनोद खन्ना उन्हें मनाना के लिए दिन में 5 बार कॉल करते थे और जवाब हर बार इनकार होता था। हालांकि वो कॉमन दोस्तों की पार्टी अटेंड करते थे। विनोद खन्ना ने हार नहीं मानी और रोजाना कॉल करने लगे। एक दिन कविता ने कहा- आप जॉगिंग में साथ चल सकते हैं। अगले दिन वो साथ गए, अगले दिन भी यही हुआ और दोनों रोज साथ जॉगिंग पर जाने लगे। साथ बिताने वाले समय ने दोनों को नजदीक ला दिया। विनोद दूसरी शादी नहीं करना चाहते थे। वहीं दूसरी तरफ कविता के परिवार ने भी उन्हें तलाकशुदा विनोद से दूर रहने का सुझाव दिया था, लेकिन फिर 1990 में दोनों की शादी हुई। कविता तब 28 की और विनोद 44 के थे। इस शादी से उन्हें 2 बच्चे हैं। किस्सा- 7 रोजाना पीते थे 40-50 सिगरेट, 2001 में हुआ लंग कैंसर, आश्रम गए तो हो गए कैंसर फ्री विनोद खन्ना की पत्नी कविता ने यूट्यूब चैनल पर बताया है कि 2001 में एक्टर को लंग कैंसर डिटेक्ट हुआ था। तब वो आध्यात्मिक गुरू रविशंकर को फॉलो करते थे। डॉक्टर्स ने उन्हें तुरंत सर्जरी करवाने की सलाह दी थी, लेकिन रविंशंकर के कहने पर वो ऋषिकेश के आश्रम चले गए और वहां ध्यान और योग करने लगे। कुछ महीनों बाद उन्हें कंधे में तेज दर्द उठा। जब टेस्ट करवाया, तो दर्द की वजह साफ नहीं हुई, लेकिन तब वो कैंसर फ्री हो चुके थे। ये डॉक्टर्स के लिए भी चमत्कार जैसा था। कैंसर डिटेक्ट होने से पहले विनोद खन्ना रोजाना 40-50 सिगरेट पीते थे, लेकिन बाद में उन्होंने स्मोकिंग छोड़ दी। 2010 में एक्टर को ब्लेडर कैंसर हुआ। विनोद और पत्नी ने ये बात राज रखी, जिससे उनकी बेटी पर इसका बुरा असर न पड़े। साल 2018 में विनोद खन्ना का 70 साल की उम्र में निधन हुआ। मौत से पहले वो बेहद कमजोर हो चुके थे। किस्सा-8 आखिरी ख्वाहिश थी पाकिस्तान जाना विनोद खन्ना का जन्म 6 अक्टूबर 1946 को अखण्ड भारत के पेशावर में हुआ था। हालांकि आजादी के बाद बंटवारे में परिवार भारत के बॉम्बे आकर बस गया। साल 2014 में पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वाह में सांस्कृतिक धरोहर परिषद के महासचिव शकील वहीदुल्ला भारत दौरे पर थे। उन्होंने विनोद खन्ना से भी मुलाकात की थी। तब ऑटोग्राफ देते हुए विनोद खन्ना ने पेशावर के लोगों को शुभकामनाएं दीं और कहा कि ये उनकी आखिरी इच्छा है कि वो मौत से पहले एक बार पेशावर जाकर अपनी पुश्तैनी हवेली देंखें। अफसोस की उनकी ये ख्वाहिश पूरी नहीं हो सकी।

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