स्मृति शेष: 'जब शब्द तलवार बन जाएं', राष्ट्रकवि दिनकर की जीवंत ज्वाला
नई दिल्ली, 24 अप्रैल (आईएएनएस)। 'वर्षों तक वन में घूम-घूम, बाधा-विघ्नों को चूम-चूम, सह धूप-घाम, पानी-पत्थर, पांडव आए कुछ और निखर। सौभाग्य न सब दिन सोता है, देखें, आगे क्या होता है...।' यह रचना है राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की। हर साल की 24 अप्रैल की पहचान उस आवाज की स्मृति से है, जिसने शब्दों को शस्त्र बना दिया था। यह वह दिन है जब हिन्दी साहित्य के सूर्य, राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर', इस दुनिया से विदा हुए थे।
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