भारत ने सिंधु जल संधि पर रुख बदलकर पानी को रणनीतिक मुद्दा बनाया : रिपोर्ट
कोलंबो, 22 अप्रैल (आईएएनएस)। पाकिस्तान की सैन्य व्यवस्था ने आतंकवाद को एक ऐसे साधन के रूप में इस्तेमाल किया जिसका खर्च कम था और जिसके नतीजे ज्यादातर कूटनीतिक आलोचना, एफएटीएफ (फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स) की कभी-कभार की सख्ती या सीमित सैन्य जवाबी कार्रवाई तक ही रहते थे। दूसरी तरफ सिंधु जल संधि (आईडब्ल्यूटी) एक तरह से एकतरफा रणनीतिक सद्भाव की तरह चलती रही, ऐसा एक रिपोर्ट में बुधवार को बताया गया।
यूरोपावायर के लिए लिखते हुए, ग्रीक वकील, लेखक और पत्रकार दिमित्रा स्टाइकौ ने कहा कि पहलगाम आतंकी हमले के बाद संधि को रोककर, भारत ने उस अलगाव को असरदार तरीके से खत्म कर दिया, यह दिखाते हुए कि पानी और आतंकवाद अब अलग-अलग डोमेन नहीं रहे।
उन्होंने कहा कि अब स्थिति साफ है या तो प्रॉक्सी वॉरफेयर को छोड़कर हालात को स्थिर और भरोसेमंद बनाओ, या फिर इसे जारी रखो और मान लो कि एक अहम राष्ट्रीय जीवनरेखा (पानी) अब नई दिल्ली के राजनीतिक फैसलों पर निर्भर हो सकती है।
स्टाइकौ ने लिखा, “जम्मू-कश्मीर में हुए नरसंहार के एक साल बाद, पहलगाम हमले के जवाब में भारत की सबसे अहम प्रतिक्रिया सिर्फ ऑपरेशन सिंदूर नहीं है, बल्कि 23 अप्रैल को लिया गया वह फैसला है, जिसमें भारत ने सिंधु जल संधि (आईडब्ल्यूटी) को तब तक के लिए रोक दिया, जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद का भरोसेमंद और स्थायी रूप से अंत नहीं करता।
1960 की यह संधि तीन युद्धों, कारगिल संघर्ष, 2001 संसद हमला, 26/11, उरी, पुलवामा और बीच-बीच में हुई कई हिंसाओं के बावजूद औपचारिक रूप से बनी रही थी। लेकिन पहलगाम के बाद यह स्थिति बदल गई। यही असली बदलाव है। पहली बार 65 साल में भारत ने पानी को एक तय अधिकार से बदलकर एक शर्त पर निर्भर साधन बना दिया है।
विशेषज्ञ के अनुसार, परमाणु हथियारों की धमकियों का इस्तेमाल एक बार फिर रणनीतिक बदलाव की जगह लिया जा रहा है। उन्होंने बताया कि 10 अगस्त 2025 को पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर ने कहा था कि पाकिस्तान “दस मिसाइलों” से भारतीय बांधों को नष्ट कर सकता है और अगर अस्तित्व पर खतरा हुआ तो वह बड़ी प्रतिक्रिया देने के लिए तैयार है।
स्टाइकौ ने कहा, “भारत की प्रतिक्रिया ने बहस को नए तरीके से पेश किया। संदेश साफ था ‘खून और पानी साथ-साथ नहीं बह सकते’ और अब परमाणु धमकियों से भारतीय नीति तय नहीं होगी।”
उन्होंने आगे कहा कि कानूनी नजरिए से भारत का यह कदम अंतरराष्ट्रीय कानून के सिद्धांतों के अनुरूप माना जा सकता है, खासकर परिस्थितियों में मूलभूत बदलाव के सिद्धांत के तहत जो वियना संधि कानून में बताया गया है।
उन्होंने लिखा कि जलवायु परिवर्तन और तेजी से ग्लेशियरों के पिघलने से हाइड्रोलॉजिकल (जल संबंधी) स्थिति में बड़ा बदलाव आया है, और साथ ही भू-राजनीतिक हालात भी बदल गए हैं, जहां सीमा पार आतंकवाद का लगातार इस्तेमाल हो रहा है। ये सब उस मूल समझ को कमजोर करता है जिस पर 1960 की संधि बनी थी।
साथ ही, पाकिस्तान की ओर से संधि में बदलाव पर बातचीत से लगातार इनकार करना यह दिखाता है कि “अच्छे इरादे” का सिद्धांत, जिस पर संधियां टिकी होती हैं, कमजोर हुआ है।
भारत के रुख को एक संतुलित और सोच-समझकर लिया गया कदम बताते हुए उन्होंने कहा कि इन परिस्थितियों में संधि को पूरी तरह खत्म करने के बजाय उसे अस्थायी रूप से रोकना एक ऐसा कदम है जो उलटा भी किया जा सकता है और जो बातचीत की संभावना भी बनाए रखता है। साथ ही दोनों पक्षों के अधिकार और जिम्मेदारियों के बीच संतुलन भी लाता है। भारत का यह रुख अंतरराष्ट्रीय दायित्वों के उल्लंघन के बजाय एक सोची-समझी और संतुलित संप्रभु कार्रवाई को दर्शाता है।
--आईएएनएस
एवाई/एबीएम
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लंबे समय तक नहीं टिक पाएगी ईरान की व्यवस्था: पूर्व अमेरिकी एनएसए (आईएएनएस एक्सक्लूसिव)
वॉशिंगटन, 22 अप्रैल (आईएएनएस)। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सीजफायर को बढ़ाने का ऐलान किया। इस बीच पूर्व अमेरिकी नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर एचआर मैकमास्टर ने न्यूज एजेंसी आईएएनएस के साथ खास बातचीत की। उन्होंने कहा कि जिस तरह का हालात हैं ईरान की व्यवस्था लंबे समय तक नहीं टिक पाएगी।
सवाल: आपको क्या लगता है कि यह अमेरिका और ईरान की लड़ाई अब आगे किस तरफ जाएगी?
जवाब: मुझे नहीं लगता कि इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान खुद को संभाल पाएगा। मुझे लगता है कि यह व्यवस्था लंबे समय तक टिक नहीं पाएगी। इसकी एक वजह यह है कि इसकी सैन्य क्षमता को नुकसान पहुंचा है और अपनी सीमाओं के बाहर प्रभाव दिखाने की ताकत भी कमजोर हुई है। भ्रष्टाचार के जरिए, जनता की भलाई से ज्यादा परमाणु और मिसाइल कार्यक्रमों को प्राथमिकता देकर, इन योजनाओं पर भारी धन खर्च करके और सरकार या उससे जुड़े समूहों द्वारा धन को बाहर भेजने जैसी गतिविधियों के कारण इसने अपने ही लोगों को नुकसान पहुंचाया है। उदाहरण के लिए नए सुप्रीम लीडर के पास ऑफशोर अकाउंट्स में करोड़ों डॉलर हैं तो मुझे लगता है कि सरकार का भ्रष्टाचार और खासकर मैं कहूंगा कि हाल ही में हमने उनके साथ जो क्रूरता देखी है न सिर्फ राजनीतिक कैदियों को फांसी देने में जो वे करते रहते हैं, बल्कि जनवरी में 48 घंटे में 40,000 लोगों की हत्या हुई। भू-राजनीतिक दांव भले ही बहुत बड़े हों, लेकिन सबसे ज्यादा असर ईरान के आम लोगों पर पड़ता है। इसलिए ध्यान उनकी स्थिति पर होना चाहिए। साथ ही धार्मिक तानाशाही के दमनकारी साधनों चाहे वे आर्थिक हों या सैन्य, को कमजोर करने के लिए ठोस और लगातार कदम उठाते रहना जरूरी है।
सवाल: यूएस-चीन और यूएस-पाकिस्तान संबंधों में सुधार को देखते हुए आपको क्या लगता है कि इसका भारत-अमेरिका संबंधों पर क्या असर पड़ेगा?
जवाब: अमेरिका-भारत संबंधों की दिशा काफी सकारात्मक मानी जाती है। भू-राजनीतिक नजरिए से देखें तो यूरेशियन क्षेत्र में चीन और रूस दो बड़ी ताकतें हैं और यही वजह है कि भारत कई मामलों में रूस के साथ संतुलन बनाए रखता है, क्योंकि ये दोनों शक्तियां उसके आसपास के क्षेत्र में मौजूद हैं। इसके साथ ही, चीन और रूस का प्रभाव उन देशों तक भी फैला हुआ है जहां केंद्रीकृत या सख्त शासन व्यवस्था है, जैसे उत्तर कोरिया और ईरान और पहले वेनेजुएला में भी ऐसा प्रभाव देखा गया था। इस परिप्रेक्ष्य में इसे खुले और लोकतांत्रिक समाजों, जैसे भारत और अमेरिका, जो दुनिया की दो बड़ी लोकतांत्रिक ताकतें हैं और उनके मुक्त बाजार आधारित आर्थिक मॉडल के बीच एक तरह की प्रतिस्पर्धा के रूप में देखा जाता है। भारत और अमेरिका नेचुरल पार्टनर हैं। मुझे इस संबंध पर बहुत भरोसा है क्योंकि अमेरिका में हमें बहुत टैलेंटेड और वाइब्रेंट भारतीय समुदाय से फायदा हुआ है। अमेरिका में हमारे कुछ सबसे क्रिएटिव उद्यमी भारतीय अमेरिकी नागरिक हैं। इसलिए मुझे लगता है कि उस पीढ़ी और नई पीढ़ियों के बीच, हमारे सबसे मजबूत सांस्कृतिक संबंध और असल में पारिवारिक संबंध भी हैं जो हमारे संबंध की बुनियाद हैं।
सवाल: भारत और अमेरिका अपने रक्षा सहयोग को कैसे बेहतर बना सकते हैं?
जवाब: एक छोटी रुकावट है और वह छोटी रुकावट है भारतीय सेना का रूसी सेना के साथ संबंध और इसलिए सुरक्षा की चिंताओं की वजह से सबसे काबिल अमेरिकी हथियार, सबसे काबिल अमेरिकी गोला-बारूद बेचने में बहुत हिचकिचाहट है, क्योंकि कॉम्प्रोमाइज का खतरा है। हमें किसी तरह इससे उबरना होगा। ऐसा करने का एक तरीका यह होगा कि भारत धीरे-धीरे रूसी हथियारों और गोला-बारूद पर अपनी निर्भरता कम करे। बेशक वे उपस्थित नहीं हैं क्योंकि उनके पास यूक्रेनी लोगों के खिलाफ अपने हमले को बनाए रखने की औद्योगिक क्षमता नहीं है लेकिन यह भी काम नहीं करता। उनके एयर डिफेंस सिस्टम को हराना आसान है। और इसलिए मुझे लगता है कि भारत के लिए यह जरूरी है कि वह धीरे-धीरे या जितनी जल्दी हो सके, रूसी वेपन सिस्टम पर निर्भरता कम करे। आप ऐसा किसी तीसरे देश के वेपन सिस्टम से कर सकते हैं, जैसे यूरोपीय सिस्टम खरीदकर वगैरह। लेकिन हां, मुझे लगता है कि अमेरिकी उपकरण ही, भारत को जिन चीजों की चिंता है, उन्हें हराने में सबसे ज्यादा काबिल है, वो हैं चीनी वेपन सिस्टम। चीनी रडार सिस्टम, चीनी फाइटर एयरक्राफ्ट और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक वॉरफेयर जैसी दूसरी तकनीक वगैरह जो चीन पाकिस्तान को दे रहा है।
सवाल: राष्ट्रपति ट्रंप की विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा पर आपके क्या विचार हैं, क्योंकि आपने उनके साथ पहले भी काम किया है?
जवाब: मुझे भरोसा है कि समय के साथ हमारे संबंध और मजबूत होंगे, अलायंस और पार्टनरशिप और मजबूत होंगी। जिस बात से मैं निराश हुआ, वह थी ज्यादातर बयानबाजी, कभी-कभी गैर-गंभीर तो कभी-कभी दिखावटी और आपत्तिजनक पब्लिक डिप्लोमेसी और कम्युनिकेशन, मेरे हिसाब से यह खुद को हराने वाला है। इसलिए लंबे समय में मुझे लगता है कि हमारे पास मजबूत अलायंस हो सकते थे क्योंकि राष्ट्रपति ट्रंप, उदाहरण के लिए यूरोपीय देशों को अपने डिफेंस में ज्यादा निवेश करने के लिए मनाने में सफल रहे हैं। अब हमें जो करना है, वह है भरोसे की उस कमी को पूरा करना जो हमारे यूरोपीय दोस्तों, हमारे भारतीय दोस्तों को कुछ ऐसी भाषा की वजह से बुरा लगा है।
बेशक, लोगों को यह याद दिलाना जरूरी है कि अमेरिका कोई राजशाही नहीं है। हमने 250 साल पहले अपनी लड़ाई लड़ी थी, इस क्रान्तिकारी विचार के आधार पर कि संप्रभु लोगों के पास है, राजा के पास नहीं, पार्लियामेंट के पास भी नहीं। इसलिए जैसा कि आपके सुनने वाले और देखने वाले जानते होंगे, हम एक फेडरल सिस्टम हैं और यूएस कांग्रेस में, पूरे अमेरिका में भारत के लिए बहुत ज्यादा लगाव है
--आईएएनएस
केके/वीसी
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