Opinion : अंतिम दर्शन का वक्त नहीं, 5100 रुपये ले लो.. कलयुगी बेटियों के इस फैसले ने छेड़ी संस्कार और फर्ज पर बहस
Moral Duty Of Children : माता-पिता की जरूरत हमेशा पैसे की नहीं होती. कई बार उन्हें सिर्फ किसी अपने की आवाज सुननी होती है. कोई पूछ ले कि तबीयत कैसी है. कोई कुछ देर उनके पास बैठ जाए. और जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर शायद यह जरूरत और भी ज्यादा बढ़ जाती है. ऐसे में सवाल सिर्फ तीन बेटियों का नहीं है. सवाल हम सबका है.
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