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Prabhasakshi NewsRoom: Indian Missile Power में बड़ा इजाफा, China के अंदर 4000 KM तक घुसकर प्रहार कर सकती है Agni-4

ओडिशा के चांदीपुर से अग्नि-4 का सफल परीक्षण भारत की मिसाइल ताकत का बड़ा प्रदर्शन है। 4000 किलोमीटर तक मार करने वाली यह परमाणु सक्षम मिसाइल चीन के रणनीतिक ठिकानों को सीधी चुनौती देने की क्षमता रखती है। इस सफल परीक्षण के साथ ही सामरिक बल कमान ने साफ कर दिया है कि भारत अब अपनी सुरक्षा के लिए केवल चेतावनी नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर चीन को करारा जवाब देने की पूरी तैयारी रखता है।

हम आपको बता दें कि करीब 4000 किलोमीटर की मारक क्षमता वाली अग्नि-4 भारतीय मिसाइल श्रृंखला में बेहद अहम स्थान रखती है। यह 2000 किलोमीटर वर्ग की अग्नि-2/अग्नि-प्राइम और 5000 किलोमीटर से अधिक क्षमता वाली अग्नि-5 के बीच की रणनीतिक दूरी को भरती है। इसकी पहुंच चीन के लगभग पूरे मुख्य भूभाग के महत्वपूर्ण रणनीतिक क्षेत्रों तक बनती है, जबकि दक्षिण-पूर्व एशिया, पश्चिम एशिया और मध्य एशिया के कुछ हिस्से भी इसकी संभावित पहुंच में आते हैं।

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चीन के साथ तुलना करें तो तस्वीर और स्पष्ट होती है। बीजिंग के पास मिसाइलों का कहीं अधिक बड़ा और विविध भंडार है। चीन की DF-21 की मारक क्षमता करीब 2150 किलोमीटर, DF-26 की लगभग 3000-4000 किलोमीटर और DF-27 की अनुमानित क्षमता 5000-8000 किलोमीटर बताई जाती है। इसके अलावा DF-31 और DF-41 जैसी अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलें क्रमशः 7000 किलोमीटर से लेकर 15000 किलोमीटर तक की दूरी तय कर सकती हैं।

यानी सिर्फ रेंज के पैमाने पर भारत अभी चीन से पीछे है, लेकिन अग्नि-4 का महत्व केवल दूरी में नहीं है। इसका असली सामरिक मूल्य इसकी मोबिलिटी, सटीकता, कम पहचान-योग्यता और विश्वसनीयता में है। दो चरणों वाले ठोस ईंधन इंजन से संचालित यह मिसाइल करीब एक टन तक का परमाणु या पारंपरिक वारहेड ले जा सकती है। सड़क-चलित मोबाइल टैंडम लॉन्चर से प्रक्षेपण की क्षमता इसे स्थिर मिसाइल साइलो की तुलना में अधिक लचीला बनाती है और दुश्मन के लिए पहले से इसका पता लगाकर उसे नष्ट करना कठिन करती है।

यही इसकी सबसे बड़ी रणनीतिक ताकत है। देखा जाये तो किसी संघर्ष की स्थिति में स्थिर ठिकानों की निगरानी अपेक्षाकृत आसान होती है, लेकिन सड़क गतिशील मिसाइल प्रणाली को देश के अलग-अलग हिस्सों में स्थानांतरित किया जा सकता है। इससे सर्वाइवेबिलिटी और सेकंड-स्ट्राइक क्षमता मजबूत होती है और परमाणु प्रतिरोधक क्षमता का आधार ही यही है कि प्रतिद्वंद्वी भारत की जवाबी क्षमता को पूरी तरह खत्म करने को लेकर आश्वस्त न हो सके।

अग्नि-4 की तकनीकी खूबियां इसे और धार देती हैं। इसमें कंपोजिट रॉकेट मोटर, रिंग लेजर जाइरोस्कोप आधारित इनर्शियल नेविगेशन, माइक्रो नेविगेशन सिस्टम, डिजिटल कंट्रोलर और शक्तिशाली ऑनबोर्ड कंप्यूटर जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है। आधुनिक और कॉम्पैक्ट एवियोनिक्स में रिडंडेंसी रखी गई है, जिससे किसी एक प्रणाली में गड़बड़ी होने पर भी विश्वसनीयता बनी रहे। इन तकनीकों ने बाद की अग्नि प्रणालियों के विकास की नींव भी मजबूत की है।

हम आपको बता दें कि इस मिसाइल की सबसे प्रभावशाली विशेषताओं में इसकी री-एंट्री तकनीक शामिल है। अत्यधिक तापमान झेलने वाली उन्नत हीट शील्ड बाहरी सतह पर 3,000 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान के बावजूद अंदर मौजूद इलेक्ट्रॉनिक्स और एवियोनिक्स को सुरक्षित रखती है। वहीं रिंग लेजर जाइरोस्कोप, फ्लेक्ससील थ्रस्ट-वेक्टरिंग और उन्नत गाइडेंस प्रणाली उड़ान के दौरान मिसाइल को सही मार्ग पर बनाए रखते हैं। उपलब्ध विवरण के अनुसार इसकी सटीकता 100 मीटर से कम CEP तक बताई गई है। 4,000 किलोमीटर की उड़ान में यह बेहद उच्च परिशुद्धता का संकेत है।

साथ ही अग्नि-4 का यह परीक्षण इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण है कि यह SFC का छठा और मिसाइल का दसवां परीक्षण था। SFC भारत की परमाणु कमान व्यवस्था का संचालनात्मक अंग है और राजनीतिक नेतृत्व की स्पष्ट अनुमति के बाद परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की जिम्मेदारी इसी के पास है। इसके मजबूत कमांड, कंट्रोल और संचार तंत्र भारत की परमाणु प्रतिरोधक क्षमता को संस्थागत आधार देते हैं।

देखा जाये तो चीन के विशाल मिसाइल भंडार के सामने भारत की चुनौती केवल अधिक लंबी दूरी की मिसाइल बनाना नहीं, बल्कि विश्वसनीय, गतिशील, सटीक और जीवित रहने में सक्षम परमाणु प्रतिरोधक क्षमता तैयार करना है। अग्नि-4 इसी रणनीति की अहम कड़ी है। यह चीन की मिसाइल बढ़त को खत्म नहीं करती, लेकिन भारत की ‘लेयरड डिटरेंस’ में एक महत्वपूर्ण खाली जगह जरूर भरती है।

दरअसल, अग्नि-4 का संदेश सीधा है कि भारत हथियारों की संख्या की दौड़ के बजाय ऐसी क्षमता विकसित कर रहा है, जो संकट की घड़ी में जवाब देने की उसकी क्षमता को विश्वसनीय बनाए। अग्नि-4 इसी आत्मनिर्भर तकनीकी शक्ति, रणनीतिक स्वायत्तता और विश्वसनीय न्यूनतम परमाणु प्रतिरोध की दिशा में भारत की बढ़ती ताकत का प्रतीक है।

हम आपको यह भी बता दें कि हाल के वर्षों में भारत ने ऐसी मिसाइल क्षमताओं पर तेजी से काम किया है जो चीन की सैन्य ताकत के सामने उसकी रणनीतिक लागत और जोखिम बढ़ा सकती हैं। इनमें सबसे अहम अग्नि-5 है, जिसे मई 2026 में MIRV तकनीक के साथ फिर सफलतापूर्वक उड़ाया गया। एक ही मिसाइल से अलग-अलग लक्ष्यों को निशाना बनाने की यह क्षमता भारत की परमाणु प्रतिरोधक शक्ति को नई धार देती है। इसके साथ अग्नि-4 4000 किमी वर्ग में चीन के भीतर गहरी पहुंच वाला विकल्प देती है, जबकि प्रलय जैसी क्वासी-बैलिस्टिक मिसाइलें क्षेत्रीय युद्धक्षेत्र में तेज और सटीक प्रहार की क्षमता बढ़ाती हैं। सुपरसोनिक ब्रह्मोस भारत की दूसरी बड़ी ताकत है, जो बेहद कम उड़ान ऊंचाई, तेज गति और सटीक प्रहार के कारण दुश्मन की रक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती पेश करती है। वहीं 2026 में सफल परीक्षण की गई रुद्रम-II हवा से जमीन पर मार करने वाली स्वदेशी मिसाइल है, जो दुश्मन के रडार और एयर-डिफेंस ठिकानों को निशाना बनाने की क्षमता को मजबूत करती है। यानी भारत अब केवल लंबी दूरी की परमाणु मिसाइलों पर निर्भर नहीं है, बल्कि रणनीतिक प्रतिरोध, सटीक प्रहार और दुश्मन की रक्षा प्रणाली को भेदने वाली अलग-अलग श्रेणियों की मिसाइलों का एक बहुस्तरीय जाल तैयार कर रहा है और चीन के लिए यही बदलती तस्वीर सबसे बड़ी चुनौती है।

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FCRA Bill 2026: विदेशी फंडिंग पर रोक नहीं लगाएगा नया FCRA बिल, एम्बेसडर विनय क्वात्रा ने दी सफाई

विदेशी चंदे और NGO की फंडिंग से जुड़े Foreign Contribution (Regulation) Amendment Bill, 2026 को लेकर देश में बहस तेज है। विपक्ष और कई संगठनों की ओर से बिल के प्रावधानों पर सवाल उठाए जा रहे हैं। खासकर विदेशी फंड से बने NGO के एसेट्स, धार्मिक संस्थाओं और छोटे सामाजिक संगठनों पर इसके संभावित असर को लेकर चिंता जताई जा रही है। इसी बीच अमेरिका में भारत के राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक लंबी पोस्ट सीरीज के जरिए बिल से जुड़े कुछ दावों को ‘मिथक’ बताते हुए सरकार का पक्ष सामने रखा है। क्वात्रा का कहना है कि प्रस्तावित बदलावों का मकसद विदेशी फंडिंग को बंद करना नहीं, बल्कि उसके इस्तेमाल में पारदर्शिता बढ़ाना, व्यवस्था को बेहतर बनाना और नियमों को ज्यादा स्पष्ट करना है। उन्होंने बिल को लेकर उठाए जा रहे पांच प्रमुख सवालों का जवाब देते हुए यह समझाने की कोशिश की कि FCRA का ढांचा भारत में नया नहीं है और विदेशी फंड पर निगरानी दुनिया के कई लोकतांत्रिक देशों में भी होती है।

बिल को लेकर उठने वाले प्रमुख सवालों में से एक यह है कि क्या भारत विदेशी फंड के जरिए होने वाले सिविल सोसायटी के काम को ही सीमित करना चाहता है। क्वात्रा के मुताबिक, ऐसा कहना सही नहीं होगा। उनका तर्क है कि विदेशी वित्तीय प्रवाह पर निगरानी रखना राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक हित से जुड़ा अधिकार है। भारत में विदेशी योगदान को नियंत्रित करने का कानून भी नया नहीं है। FCRA का पहला संस्करण 1976 में आया था, जिसे बाद में 2010 में नए ढांचे के साथ बदला गया। इसके बाद 2016, 2018 और 2020 में भी इसमें संशोधन किए गए।

उनके मुताबिक 2026 का प्रस्तावित बदलाव भी इसी प्रक्रिया की अगली कड़ी है, जिसका जोर पारदर्शिता, बेहतर प्रशासन और स्पष्ट नियमों पर है। सरकार की ओर से यह भी कहा जा रहा है कि FCRA कानून विदेशी चंदा लेने पर पूरी तरह रोक नहीं लगाता। स्वास्थ्य, शिक्षा, राहत कार्य, रिसर्च और मानवीय गतिविधियों जैसी कई गतिविधियों के लिए नियमों के तहत विदेशी योगदान लिया जा सकता है।

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दूसरा बड़ा सवाल NGO और चैरिटेबल संस्थाओं को लेकर है। आलोचकों की चिंता है कि नए प्रावधानों से विदेशी फंड पर निर्भर संस्थाओं के लिए काम करना और मुश्किल हो सकता है। क्वात्रा ने इस दावे के जवाब में कहा कि भारत में विदेशी योगदान का प्रवाह घटने के बजाय बढ़ा है। उनके मुताबिक, 2010-11 में करीब 1.2 अरब डॉलर का विदेशी योगदान दर्ज किया गया था, जो बाद के वर्षों में बढ़कर करीब 2.67 अरब डॉलर तक पहुंचा। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि भारत में NGO की संख्या लाखों में है, जबकि FCRA के तहत पंजीकृत संस्थाओं की संख्या इसका एक छोटा हिस्सा है। यानी देश में काम कर रहे अधिकांश सिविल सोसायटी संगठन FCRA के दायरे में ही नहीं आते।

सरकार की तरफ से समझाया जा रहा है कि FCRA का मूल ढांचा तीन बुनियादी बातों पर टिका है—रजिस्ट्रेशन कराना, निर्धारित प्रक्रिया के तहत विदेशी पैसा प्राप्त करना और उस पैसे के इस्तेमाल का हिसाब देना। दूसरे शब्दों में, सरकार का तर्क है कि कानून का उद्देश्य सामाजिक संस्थाओं के काम को रोकना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि विदेश से आने वाला पैसा किस उद्देश्य से आया और कहां खर्च हुआ, इसकी जानकारी साफ रहे।

FCRA बिल पर सबसे ज्यादा चर्चा शायद NGO और अन्य संस्थाओं की संपत्ति को लेकर हो रही है। प्रस्तावित कानून में एक ‘Designated Authority’ की व्यवस्था की गई है। अगर किसी संस्था का FCRA पंजीकरण रद्द हो जाता है, संस्था खुद अपना पंजीकरण सरेंडर कर देती है या उसका पंजीकरण खत्म हो जाता है, तो विदेशी योगदान और उससे बनाई गई संपत्तियों की देखरेख की व्यवस्था इस प्राधिकरण के जरिए की जाएगी। PRS के मुताबिक, यही 2026 बिल का एक प्रमुख नया ढांचा है। सरकार का कहना है कि विदेशी फंड से जुड़ी संपत्तियों के अस्थायी रूप से किसी सरकारी प्राधिकरण के अधीन जाने की अवधारणा पूरी तरह नई नहीं है। नया बिल मुख्य रूप से इस प्रक्रिया को व्यवस्थित करने के लिए एक स्पष्ट तंत्र तैयार करता है।

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प्रस्तावित व्यवस्था में अगर संस्था तय अवधि के भीतर अपना FCRA पंजीकरण दोबारा हासिल या बहाल कर लेती है, तो उसकी संपत्ति और इस्तेमाल न हुआ विदेशी फंड वापस किए जाने का प्रावधान है। वहीं, अगर निर्धारित समय में पंजीकरण बहाल नहीं होता, तो संपत्तियों के स्थायी रूप से प्राधिकरण के अधीन जाने की स्थिति बन सकती है। यही प्रावधान विपक्ष और कई संगठनों की चिंता का बड़ा कारण है। आलोचकों का सवाल है कि अगर किसी NGO का रजिस्ट्रेशन खत्म या नवीनीकृत नहीं होता, तो क्या विदेशी फंड से बनी उसकी संपत्तियों पर भी उसका नियंत्रण चला जाएगा। सरकार दूसरी तरफ इसे लंबे समय से मौजूद व्यवस्था में प्रशासनिक स्पष्टता लाने वाला कदम बता रही है।

बिल पर यह आरोप भी लगाए जा रहे हैं कि इससे धार्मिक संस्थाओं, पूजा स्थलों, अस्पतालों और स्कूलों जैसी संपत्तियों पर असर पड़ सकता है। क्वात्रा ने इस आशंका को खारिज करते हुए कहा कि FCRA किसी खास धर्म या समुदाय को निशाना बनाने वाला कानून नहीं है। उनके मुताबिक, कानून सभी संगठनों पर समान रूप से लागू होता है, चाहे वे किसी भी धर्म, समुदाय या विचारधारा से जुड़े हों। सरकार की ओर से यह भी कहा गया है कि धार्मिक कल्याण से जुड़ी गतिविधियां—जैसे पूजा स्थलों का रखरखाव, धार्मिक शिक्षा और अन्य सामाजिक-धार्मिक कार्य—नियमों के तहत विदेशी फंडिंग के लिए पात्र बने रह सकते हैं। प्रस्तावित व्यवस्था में पूजा स्थल से जुड़ी संपत्ति के लिए धार्मिक चरित्र बनाए रखने की बात भी कही गई है। PRS के मुताबिक, अगर किसी ऐसी संस्था का पंजीकरण खत्म होता है जिसकी संपत्ति किसी पूजा स्थल से जुड़ी है, तो प्राधिकरण को उसकी धार्मिक प्रकृति को बनाए रखने का ध्यान रखना होगा।

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क्वात्रा ने उस दावे को भी खारिज किया जिसमें कहा जा रहा है कि प्रस्तावित बदलाव किसी खास धर्म या अल्पसंख्यक समुदाय को प्रभावित करने के लिए लाए जा रहे हैं। उनका कहना है कि FCRA का नियम संगठन की धार्मिक पहचान के आधार पर अलग-अलग नहीं होता। यानी हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, सिख या किसी अन्य समुदाय से जुड़े संगठन—सभी पर कानून का ढांचा समान रूप से लागू होता है। यही वजह है कि सरकार का कहना है कि धार्मिक या सामुदायिक पहचान को आधार बनाकर बिल को देखने के बजाय विदेशी योगदान की निगरानी और उसके इस्तेमाल की पारदर्शिता के नजरिए से इसे समझना चाहिए।

बिल के समर्थन में एक और तर्क यह दिया जा रहा है कि विदेशी फंडिंग की निगरानी सिर्फ भारत की नीति नहीं है। क्वात्रा ने अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के उदाहरण देते हुए कहा कि इन जगहों पर भी विदेशी प्रभाव और विदेशी वित्तीय प्रवाह से जुड़े नियम मौजूद हैं या उन्हें मजबूत किया जा रहा है। उन्होंने अमेरिका के Foreign Agents Registration Act (FARA) और FATCA का उदाहरण दिया। ऑस्ट्रेलिया में 2018, कनाडा में 2024 और ब्रिटेन में 2025 में संबंधित व्यवस्थाएं लागू होने का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि विदेशी फंड और विदेशी प्रभाव को लेकर नियमन दुनिया भर में चर्चा का विषय है।

आखिर FCRA बिल है क्या?

Foreign Contribution (Regulation) Amendment Bill, 2026 को केंद्र सरकार ने 25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किया था। यह मौजूदा FCRA, 2010 में बदलाव का प्रस्ताव रखता है। बिल का मुख्य फोकस उन परिस्थितियों में विदेशी योगदान और उससे बनी संपत्तियों के प्रबंधन पर है, जब किसी संस्था का FCRA पंजीकरण रद्द हो जाए, सरेंडर कर दिया जाए या उसका नवीनीकरण न हो। बिल में ‘Designated Authority’ की व्यवस्था के अलावा संपत्तियों के प्रबंधन, पंजीकरण बहाल होने की स्थिति में उनकी वापसी, अपील की व्यवस्था और कुछ दंड प्रावधानों में बदलाव जैसे प्रस्ताव भी शामिल हैं। PRS के अनुसार, बिल में FCRA उल्लंघन के लिए अधिकतम जेल की सजा को पांच साल से घटाकर एक साल करने का भी प्रस्ताव है। फिलहाल यह विधेयक संसद के विचाराधीन है। दूसरी तरफ, सरकार ने 2026 के संशोधित FCRA नियम 22 जून को अधिसूचित किए थे, जो लागू हैं।

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