इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल में भारत का प्रदर्शन उम्मीद से कहीं बेहतर रहा। भारत ने 13 स्वर्ण, 17 रजत और 9 कांस्य सहित कुल 39 पदक जीते। वह पदक तालिका में चौथे नंबर पर रहा। पहली नजर में यह प्रदर्शन बर्मिंघम 2022 के 61 पदक से कमजोर दिख सकता है, लेकिन आंकड़े अलग कहानी बताते हैं। इस बार ग्लासगो में सिर्फ 10 खेल शामिल थे, जबकि बर्मिंघम में 19 खेल खेले गए थे। बैडमिंटन, कुश्ती, शूटिंग, हॉकी, टेबल टेनिस और क्रिकेट जैसे खेल ग्लासगो गेम्स का हिस्सा नहीं थे, जिनसे 2022 में भारत को 30 पदक मिले थे। इसके अलावा भारत ने 210 खिलाड़ियों की जगह सिर्फ 123 खिलाड़ियों का दल भेजा। इनमें से 38 खिलाड़ी पदक जीतकर लौटे, यानी सफलता की दर 31 प्रतिशत रही। बर्मिंघम में यह आंकड़ा 29 प्रतिशत था।
ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल शुरू होने से पहले भारतीय ओलंपिक संघ और विभिन्न खेल महासंघों की आंतरिक रिपोर्ट में भारत को 6 स्वर्ण समेत 31 पदक मिलने का अनुमान लगाया गया था। भारतीय खिलाड़ियों ने अनुमान से दोगुना से भी ज्यादा स्वर्ण जीते। कुल पदक में भी आगे निकल गए। ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल में भारत का सबसे सफल खेल बॉक्सिंग रहा। 14 मुक्केबाजों के दल में से 10 खिलाड़ी पदक जीतकर लौटे। इसमें 7 स्वर्ण और 3 रजत शामिल रहे। यानी 71 प्रतिशत मेडल कन्वर्जन रेट। बर्मिंघम 2022 में यह आंकड़ा 58 प्रतिशत था। पदक वितरण समारोह के दौरान सात बार भारत का राष्ट्रगान बजना न सिर्फ ग्लासगो में मौजूद भारतीय दर्शकों के लिए गर्व का पल था, बल्कि इस बात का सबूत भी था कि इस गैर-पारंपरिक खेल को गांवों और छोटे कस्बों तक ले जाने की पहल काफी हद तक सफल रही है। भारतीय बॉक्सरों के प्रदर्शन की जितनी भी प्रशंसा की जाए वो कम है।
जूडो में भारत ने पहली बार राष्ट्रमंडल खेल इतिहास में स्वर्ण जीता। अस्मिता डे और हर्ष सिंह ने स्वर्ण जीता। यामिनी मौर्य ने रजत और उन्नति शर्मा ने कांस्य जीतकर कुल चार पदक भारत की झोली में डाले। हालांकि 14 सदस्यीय भारतीय टीम के दो खिलाड़ी अरुण कुमार और तुलिका मान डोपिंग के कारण बाहर हो गए। इसी तरह, एथलीटों और पैरा-एथलीटों ने 16 पदक जीते। इनमें से कुछ ने तो नए राष्ट्रीय रिकॉर्ड भी बनाए।
वेटलिफ्टर्स ने आठ और पदक जीते। इन पदकों में ओलंपियन मीराबाई चानू का जीता हुआ एक स्वर्ण पदक भी शामिल था, जिससे उन्होंने स्वर्ण पदकों की हैट्रिक पूरी की; मणिपुर की इस एथलीट ने इससे पहले 2018 गोल्ड कोस्ट और 2022 बर्मिंघम राष्ट्रमंडल खेल में भी स्वर्ण पदक जीता था। असल में, मीराबाई चानू की शानदार कामयाबी के बावजूद, भारतीय वेटलिफ्टरों का प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा। इस निराशा की एक वजह यह है कि डोपिंग के आरोपों के कारण कम से कम दो भारतीय वेटलिफ्टरों की एंट्री वापस लेनी पड़ी। छह अन्य खिलाड़ी—कड़ी टक्कर न होने के बावजूद—लड़ने के जज़्बे की कमी या तकनीकी गलतियों की वजह से स्वर्ण पदक जीतने का मौका चूक गए।
एथलेटिक्स ने भारत को 10 पदक दिलाए, लेकिन एक भी स्वर्ण नहीं आया। नीरज चोपड़ा रजत जीत सके। उनके साथ डेब्यू कर रहे यशवीर सिंह ने कांस्य जीता। गुलवीर सिंह ने 10 हजार मीटर में सिल्वर और 5 हजार मीटर रेस में कांस्य जीतकर इतिहास रचा। गुलवीर एक ही कॉमनवेल्थ गेम्स में एथलेटिक्स में दो पदक जीतने वाले वह भारत के पहले खिलाड़ी भी बनें। तेजस्विन शंकर ने डेकाथलन में भारत का पहला राष्ट्रमंडल पदक दिलाया। सरवेश कुशारे, श्रीशंकर, प्रवीण चित्रावेल और सीमा कालीरामना भी पदक जीतने में सफल रहे। हालांकि स्प्रिंट और रिले टीम से बड़ी उम्मीदें थीं, वह खाली हाथ रही।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि मोदी सरकार के 12 वर्षों के शासन में देश में खेलों का संस्थागत विकास तेजी से हुआ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई बार यह दोहराया है कि खेल देश में एकता बढ़ाने, युवाओं को प्रेरित करने और भारत को एक आत्मविश्वासी और उभरती हुई वैश्विक ताकत के रूप में स्थापित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। उनकी यह सोच कार्यों में भी दिखाई देती है, जैसे कि ‘खेलो इंडिया’और ‘टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम यानी टॉप्स’ जैसे प्रमुख कार्यक्रमों के माध्यम से। इन पहलों ने देश में खेलों की पूरी व्यवस्था को नया रूप दिया है और भारत को खेलकूद के प्रति समर्पित एक राष्ट्र बना दिया है। इन योजनाओं के कारण भारतीय खिलाड़ियों को बेहतर वित्तीय सहायता, आधुनिक प्रशिक्षण और अंतरराष्ट्रीय स्तर का एक्सपोजर मिला है, जिसके परिणामस्वरूप ओलंपिक, पैरालंपिक, कॉमनवेल्थ और एशियाई खेलों में भारत का प्रदर्शन लगातार सुधरा है।
नई प्रतिभाओं को पदक जीतने वाले खिलाड़ी में बदलने में 'खेलो इंडिया' कार्यक्रम की अहम भूमिका रही है। इस कार्यक्रम के तहत अब तक 2781 से अधिक खिलाड़ियों को प्रशिक्षण, उपकरण, चिकित्सा देखभाल और वित्तीय सहायता दी गई है। सरकार ने खेलो इंडिया योजना पर 36,441 करोड़ रुपये का भारी निवेश मंजूर किया है। वर्ष 2026-31 के लिए संशोधित खेलो इंडिया योजना को मंजूरी दी है। राष्ट्रीय खेल महासंघों को मजबूत बनाने के लिए बड़े पैमाने पर वित्तीय सहायता दी जा रही है।
देश के दूर-दराज और ग्रामीण इलाकों से भी उभरती प्रतिभाओं को खोजा जा रहा है। स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षण और मार्गदर्शन की सुविधाएं देने के लिए देशभर में 1041 खेलो इंडिया केंद्र स्थापित किए गए हैं। इसके साथ ही, 32 खेलो इंडिया सेंटर ऑफ एक्सीलेंस और 301 खेल अकादमियों को मान्यता दी गई है, जिससे खेलों का पूरा इकोसिस्टम और मजबूत हुआ है। खेलो इंडिया सीओई में खिलाड़ियों को विशेषज्ञ कोचिंग, पोषण और उच्चस्तरीय प्रशिक्षण की सुविधा दी जा रही है।
मोदी सरकार की इन पहलों का जमीन पर जबरदस्त असर भी दिख रहा है। 2022 एशियाई खेलों में भारत के 42 पदकों में से 124 पदक विजेता 'खेलो इंडिया' से प्रशिक्षित खिलाड़ी थे। वहीं पेरिस 2024 ओलंपिक में खेलो इंडिया के 28 खिलाड़ियों ने देश का प्रतिनिधित्व किया था। 'खेलो इंडिया' के खिलाड़ियों ने अब तक करीब 6000 राष्ट्रीय रिकॉर्ड और 1400 अंतरराष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाए हैं, जो भारत के जमीनी स्तर के खेलकूद के कार्यक्रमों की प्रगति को दर्शाता है।
कोच और खेल विशेषज्ञ मानते हैं कि कॉन्टिनेंटल या ग्लोबल इवेंट्स में प्रतियोगिता का स्तर कहीं ज्यादा होता है। ऐसे में किसी एथलीट या खिलाड़ी की काबिलियत और कड़ी मेहनत की असली परीक्षा एशियन गेम्स या ओलंपिक्स में होती है। हालांकि कॉमनवेल्थ गेम्स में जीते गए मेडल का महत्व कम नहीं आंका जाना चाहिए। इस बार युवा खिलाड़ियों ने दिखाया है कि भारत का खेल भविष्य पहले से कहीं ज्यादा उज्ज्वल दिख रहा है, कई खेलों में नई पीढ़ी के टैलेंटेड एथलीट सुर्खियां बटोर रहे हैं। राष्ट्रमंडल खेल जैसी प्रतियोगिता में किए गए प्रदर्शन को आम तौर पर भविष्य में सुधार के पैमाने और अपनी खूबियों व कमियों के आकलन के तौर पर देखा जाता है।
राष्ट्रमंडल खेल के बाद अब भारतीय खिलाड़ियों की नजर एशियन गेम्स में दमदार प्रदर्शन करने पर है। 20 वें एशियाई खेल का आगाज 19 सितंबर से जापान के नागोया में होग। भारत इस बार हांग्जो 2022 के अपने ऐतिहासिक 107 पदकों के रिकॉर्ड को तोड़ने के इरादे से मैदान में उतरेगा। इसीलिए भारतीय खिलाड़ियों को राष्ट्रमंडल खेल में अपने प्रदर्शन पर गर्व करते हुए एशियन गेम्स में पेश आने वाली चुनौतियों के हिसाब से बिना एक भी पल गवाएं तैयारियां शुरू कर देनी चाहिए। क्योंकि जब विदेशी धरती पर तिरंगा लहराता है और जन-गण-मन गूंजता है, तो वह पल केवल एक खिलाड़ी की जीत नहीं, बल्कि पूरे देश का गौरव बन जाता है।
- डॉ. आशीष वशिष्ठ
(स्वतंत्र पत्रकार)
लखनऊ, उत्तर प्रदेश (भारत)
Continue reading on the app
मानव इतिहास में ‘6 अगस्त 1945’ की मनहूस तारीख को शायद ही कोई भूल पाए। 'हिरोशिमा दिवस' के रूप में मनाई जाती है ये तारीख। इस तारीख में सिर्फ तबाही लिखी थी। तारीख में ऐसा मुकर्रर वक्त था जिसने मात्र 16 मिनट के भीतर 1,30,000 लोगों की सांसें एक साथ रोकी थी। हताहतों का आकंड़ा फिलहाल सरकारी है, पर वास्तिवक संख्या इससे कहीं अधिक बताई जाती है। हिरोशिमा पर किए परमाणु हमले में मरने वालों में बूढ़े, बच्चे, नौजवान, औरतें भी थीं। सुबह करीब 8ः15 बजे अमेरिका ने हिरोशिमा पर अपने ‘बी-29 ‘एनाला गे’ विमान द्वारा आसमान से परिमाणु बमों की बारिश करके पूरा शहर जिंदा जला दिया था। घटना के वक्त ज्यादातर लोग सोए हुए थे, परमाणु बम ने उन्हें सोता ही मार दिया। हिरोशिमा में जब परमाणु बम फोड़ा गया, तो जापानियों को लगा कि सूरज फटा है। जबकि, वह सूरज नहीं, बल्कि तथाकथित विकसित, सभ्य और मुट्ठी भर लोगों का निर्णय तथा एक महाशक्ति द्वारा निर्मित कृत्रिम सूरज था जिसकी आग में लाखों निर्दोष लोग भाप बनकर चंद मिनटों में उड़ गए। घटना का सामूहिक हत्यारा अमेरिका था।
अगस्त माह की जब 6 तारीख आती है या फिर परमाणु हथियारों की बढ़ती तादात पर वैश्विक मंचों पर विमर्श होता है, तो जापान की दिल दहला देने वाली यह घटना आंखों के सामने अनायास उमड़ पड़ती हैं। घटना को श्रृधालजि के तौर पर ही सालाना 6 अगस्त को ‘हिरोशिमा दिवस’ के रूप में विश्व मनाता है। यह दिन उन मुल्कों को संकल्पित होने को आहवान भी करवाता है, जो परमाणु बम फोड़ने की अनाअवश्यक धमकी दिया करते हैं। साथ ही अहिंसा, त्रासदी, को छोड़कर भाईचारा अपनाने और शांति के पथ पर चलने को जागरूश्क भी करता है। 1945 में अमेरिका द्वारा जापान के दो शहरों पर गिराए गए अलग-अलग तारीखों पर परमाणु बम की यह कहानी काले अध्याय के रूप में तबतक दर्ज रहेगी, जबतक दुनिया इस धरती पर वास करेगी। 6 अगस्त को गिराए पहले बम का नाम ‘एनाला गे’ था। वहीं, 9 अगस्त वाले बम का नाम ‘लिटिल बॉय’ यानी यूरेनियम-आधारित परमाणु बम था।
जापान का जब तक अस्तित्व रहेगा, उनके लोग अमेरिका को माफ नहीं करेंगे। जापान के अलावा पूरे विश्व में इस मानव त्रासदी की निंदा प्रत्येक 6 अगस्त को की जाती है। नागासाकी पर गिराए बम से भी लाखों की संख्या में बेकसूर नागरिक मरे थे। हिरोशिमा दिवस वैश्विक स्तरीय पर परमाणु हथियारों के विरुद्ध एकजुट होने एवं समूचे संसार में अमन-शांति की वकालत के लिए भी याद किया जाता है। साथ ही भविष्य में ऐसे विनाशकारी युद्धों को रोकने के लिए परमाणु हथियारों को नष्ट करने की पुरजोर अपील भी करता है। हिरोशिमा पर गिराए गए परमाणु बम को अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति फ्रैंकलिन ‘डेलानो रूजवेल्ट’ के सन्दर्भ में ‘लिटिल ब्वाय’ और नागासाकी के बम को विन्सटन चर्चिल के सन्दर्भ में ‘फैट मैन’ भी कहा जाता है। फ्रैंकलिन डेलानो रूजवेल्ट अमेरिका के 32वें राष्ट्रपति हुआ करते थे। वह द्वितीय विश्वयुद्ध और वैश्विक आर्थिक मंदी के दौरान बीसवीं सदी के सबसे क्रूर व्यक्तियों में गिने जाते रहे। यह त्रासदी उनकी ही देन थी।
पाकिस्तान, अमरिका जैसे मुल्क आज भी परमाणु बमों को फोड़ने की धमकी देते हैं। इसलिए हिरोशिमा दिवस उनके लिए चेतावनी के अलावा सीख जैसा भी है। हिरोशिमा की घटना को आज 81 वर्ष हो गए, लेकिन दुर्भाग्य संसार आज भी युद्ध-हिंसा में संलग्न है। यूं कहें कि परमाणु हथियारों के ढेर पर बैठा है। हाल में, अमेरिका द्वारा ईराक पर परमाणु हमले की धमकी देना, दुनिया भर में बढ़ती हिंसा की घटनाएं और हथियारों को इकट्ठा करने की होड़ के बीच हमारे सामने यह प्रश्न खड़ा होता है कि हम हिरोशिमा और नागासाकी की घटनाओं से क्या कुछ सबक सीख पाए या नहीं? 81 साल पहले 2,50,000 हजार लोगों को मारकर भी अमेरिका को शांति नहीं मिली? अमेरिका की दादागिरी को जवाब देने का वक्त आ चुका है इसके लिए वैश्विक स्तर पर सभी मुल्कों को एकजुट होना होगा। साथ ही परमाणु हथियारों के निर्माणों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाए जाने की दिशा में सभी देशों को सामूहिक पहल करने की जरूरत है।
- डॉ. रमेश ठाकुर
सदस्य, राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान (NIPCCD), भारत सरकार!
Continue reading on the app