कच्चे मकानों की गौंखा-बड़ेर वाली यादें, कभी अलमारी का करते थे काम, लकड़ी के टोटा और बिलनी से बनते थे दरवाजे
Gaukha of Mud houses: भारत में प्रधानमंत्री आवास योजना के चलते पक्के मकानों का सपना साकार हुआ है. लेकिन पुराने कच्चे मकानों की परंपरा भी बेहद खास रही है. इन घरों में उपयोगी और सुंदर आकृतियां बनाई जाती थीं. कच्चे मकानों में गौंखा एक दीवारनुमा जगह होती थी. जहां घरेलू सामान रखा जाता था. मंदिरनुमा और त्रिकोणीय गौंखे खास डिजाइन के होते थे. जिनमें दीपक आदि सुरक्षित रखे जाते थे. टोटा लकड़ी से बना छज्जा होता था जो खपरैल छत को सहारा देता था. दरवाजों में कुंडी की जगह बिलनी लगाई जाती थी. वहीं, बड़ेर लकड़ी का मजबूत पट्टा होता था जो मिट्टी के खंभों पर रखकर छत को टिकाने में अहम भूमिका निभाता था. ये घर स्थानीय संसाधनों और पारंपरिक ज्ञान का बेहतरीन उदाहरण थे.
बृजभूषण की बात होगी तो आदित्य ठाकरे... क्यों और किसपर फायर हुए निशिकांत दुबे: VIDEO
NIshikant Dubey Viral Video: संसद के विशेष सत्र में महिला आरक्षण पर चल रही बहस के बीच लोकसभा में उस वक्त माहौल अचानक गरमा गया, जब शिवसेना (UBT) सांसद अरविंद गणपत सावंत ने अपने भाषण के दौरान कुलदीप सेंगर और बृजभूषण शरण सिंह का जिक्र कर दिया. उन्होंने महिला सुरक्षा के मुद्दे को उठाते हुए इन नामों का हवाला दिया, जिसके बाद सत्ता पक्ष के सांसदों ने जोरदार विरोध शुरू कर दिया. नारेबाजी के बीच सदन का माहौल कुछ देर के लिए तनावपूर्ण हो गया और स्पीकर को हस्तक्षेप करना पड़ा. इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन के बाद सावंत ने बोलना शुरू किया और कहा कि उन्हें प्रधानमंत्री के बाद बोलने का अवसर मिला है. लेकिन महिला आरक्षण पर बात करते-करते उनका भाषण अचानक राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप में बदल गया. इस दौरान उन्होंने तीखे शब्दों का इस्तेमाल किया, जिससे सदन में हंगामा बढ़ गया. स्पीकर ने तुरंत टोकते हुए कहा कि संसद में इस तरह सीधे आरोप लगाना उचित नहीं है और नियमों का पालन जरूरी है. इस पूरे घटनाक्रम के बीच बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे का बयान भी चर्चा में आ गया, जिसमें उन्होंने पलटवार करते हुए कहा कि अगर बृजभूषण की बात होगी तो आदित्य ठाकरे की भी होगी उसने हिरोइन मार दिया. इस बयान ने राजनीतिक तकरार को और तेज कर दिया. महिला आरक्षण जैसे अहम मुद्दे पर चर्चा के दौरान इस तरह के टकराव ने एक बार फिर दिखाया कि संसद में बहस कितनी जल्दी राजनीतिक मोड़ ले सकती है.
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