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पाकिस्तान में रातभर छापेमारी, तीन बलोच युवकों के जबरन गायब होने का आरोप

क्वेटा, 16 अप्रैल (आईएएनएस)। पाकिस्तान में रातभर चली छापेमारी के दौरान तीन बलोच युवकों के जबरन गायब किए जाने की खबर सामने आई है, जिससे एक बार फिर ‘एनफोर्स्ड डिसअपियरेंस’ को लेकर चिंता बढ़ गई है।

स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जुबैर बलोच नामक एक छात्र को बुधवार तड़के डेरा गाजी खान इलाके में स्थित उसके घर से उठा लिया गया। द बलोचिस्तान पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, उसे अज्ञात स्थान पर ले जाया गया है।

बलोच स्टूडेंट काउंसिल, पंजाब ने ‘एक्स’ पर पोस्ट कर बताया कि जुबैर बलोच, गुलाम फरीद के बेटे हैं, जो बहावलपुर बलोच स्टूडेंट्स काउंसिल के पूर्व अध्यक्ष रह चुके हैं। वह इस्लामिया यूनिवर्सिटी बहावलपुर से एमफिल ग्रेजुएट हैं। परिजनों का कहना है कि रात करीब 1:30 बजे उन्हें घर से ले जाया गया और तब से उनका कोई पता नहीं है।

परिवार ने उनकी तत्काल रिहाई या उनके ठिकाने की जानकारी देने की मांग की है और अधिकारियों व मानवाधिकार संगठनों से हस्तक्षेप की अपील की है।

एक अन्य घटना में बलूचिस्तान के ग्वादर जिले के जीवानि इलाके में भी रात के समय छापेमारी कर दो युवकों को उनके घरों से उठा लिया गया। इनकी पहचान कोसर बाजार निवासी रियाज सैयद और सोलान बाजार निवासी जहांजेब के रूप में हुई है। दोनों को एक अज्ञात स्थान पर ले जाया गया है और तब से परिवार उनसे संपर्क नहीं कर पा रहा है।

ये घटनाएं ऐसे समय में सामने आई हैं, जब बलूचिस्तान में जबरन गायब किए जाने और कथित फर्जी मुठभेड़ों के मामलों में बढ़ोतरी देखी जा रही है।

इस बीच, बलूचिस्तान प्रांत की राजधानी क्वेटा में जबरन गायब लोगों के खिलाफ जारी विरोध प्रदर्शन का कैंप गुरुवार को 6136वें दिन में प्रवेश कर गया। वॉइस फॉर बलोच मिसिंग पर्सन्स द्वारा क्वेटा प्रेस क्लब के बाहर यह धरना आयोजित किया जा रहा है, जहां विभिन्न वर्गों के लोग पहुंचकर पीड़ित परिवारों के समर्थन में आवाज उठा रहे हैं।

संगठन ने मांग की है कि सभी लापता लोगों को बरामद किया जाए और जबरन गायब किए जाने की घटनाओं को तुरंत रोका जाए।

इससे पहले, बलोच यकजहती कमेटी की वरिष्ठ नेता सबीहा बलोच ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के 61वें सत्र में बलूचिस्तान में मानवाधिकार स्थिति पर गंभीर चिंता जताई थी। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र से इस मुद्दे की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराने की मांग की थी।

उन्होंने कहा कि बलूचिस्तान में लोग संदिग्ध परिस्थितियों में गायब हो रहे हैं, वहीं फर्जी मुठभेड़ों और क्षत-विक्षत शवों के मिलने की घटनाएं भी सामने आ रही हैं, जो एक सुनियोजित पैटर्न का हिस्सा प्रतीत होती हैं।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पत्रकारों, छात्रों, वकीलों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को अपने विचार व्यक्त करने पर आतंकवाद विरोधी कानूनों के तहत परेशान किया जाता है और गिरफ्तार किया जाता है।

--आईएएनएस

डीएससी

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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महिला आरक्षण विधेयक: भारत की लोकतांत्रिक यात्रा में एक शांत क्रांति

महिला आरक्षण विधेयक—औपचारिक रूप से नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023—को अक्सर संख्याओं, कोटा और राजनीतिक गणित के संदर्भ में चर्चा किया जाता है। लेकिन सुर्खियों और विधायी शब्दजाल से परे इसमें एक से अधिक परिवर्तनकारी पहलू निहित है: यह एक शांत तरीके से इस बात को पुनर्परिभाषित कर रहा है कि भारतीय लोकतंत्र कैसा दिख सकता है, जब वह अपनी आधी आबादी के लिए केवल लाभार्थी के रूप में नहीं, बल्कि निर्णयकर्ता के रूप में स्थान बनाता है।

सकारात्मक दृष्टिकोण से देखें तो यह विधेयक केवल आरक्षण का प्रावधान नहीं है—यह संस्थागत विश्वास का प्रतीक है। यह उस धारणा से बदलाव को दर्शाता है कि महिलाओं को अस्थायी सहारे की आवश्यकता है, और इस स्वीकार्यता की ओर बढ़ता है कि वे शासन व्यवस्था की मूल आधारशिला हैं।

इसे भी पढ़ें: Women's Reservation पर PM Modi का बड़ा कदम, बोले- 16 April से इतिहास रचने को तैयार संसद

लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करके, भारत केवल ऐतिहासिक बहिष्कार को सुधार नहीं रहा है, बल्कि नेतृत्व की परिभाषा को भी विस्तृत कर रहा है।

आलोचक अक्सर यह तर्क देते हैं कि आरक्षण स्वतः सशक्तिकरण में परिवर्तित नहीं हो सकता। यह चिंता उचित है, परंतु अधूरी है। लोकतंत्र में हर संरचनात्मक बदलाव—चाहे वह सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार हो या सत्ता का विकेंद्रीकरण—वास्तविकता बनने से पहले विश्वास की एक छलांग की मांग करता है। महिला आरक्षण विधेयक भी इसी लोकतांत्रिक विस्तार की परंपरा का हिस्सा है। यह एक “पाइपलाइन प्रभाव” उत्पन्न करता है। आज विधानसभाओं में अधिक महिलाएं होंगी, तो कल नेतृत्व के हर स्तर—पंचायत से संसद तक—में उनकी भागीदारी बढ़ेगी।

इसके साथ ही एक सूक्ष्म सांस्कृतिक परिवर्तन भी चल रहा है।

प्रतिनिधित्व केवल प्रतीकात्मक नहीं होता। यह शिक्षाप्रद भी होता है। जब युवा लड़कियां महिलाओं को बजट पर चर्चा करते, कानून बनाते और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को निर्धारित करते हुए देखती हैं, तो महत्वाकांक्षा असाधारण नहीं रहती, बल्कि सामान्य बन जाती है। राजनीति, जिसे लंबे समय तक पुरुषों के प्रभुत्व वाले क्षेत्र के रूप में देखा गया, अब एक साझा नागरिक मंच के रूप में उभरने लगती है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह सुधार शासन की अवधारणा को भी पुनर्परिभाषित करता है। भारत में स्थानीय निकायों के अनुभव से यह स्पष्ट हुआ है कि महिला नेतृत्व अक्सर स्वास्थ्य, शिक्षा, जल और सुरक्षा जैसे मुद्दों को प्राथमिकता देता है—जो सामाजिक संरचना को सुदृढ़ करते हैं। इस उपस्थिति का राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार नीतियों को मानव-केंद्रित विकास की ओर अग्रसर कर सकता है।

अतः महिला आरक्षण विधेयक केवल संसद में सीटों तक सीमित नहीं है। यह लोकतंत्र की नैतिक कल्पना का विस्तार है—जहां समावेशन कोई अपवाद नहीं, बल्कि मूल सिद्धांत है।

- न्योमा गुप्ता
प्रवक्ता
दिल्ली भाजपा

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