इस्लामाबाद, 16 अप्रैल (आईएएनएस)। पाकिस्तान में बच्चों के खिलाफ बढ़ते उत्पीड़न के मामले न केवल हिंसा में चिंताजनक बढ़ोतरी को दर्शाते हैं, बल्कि कमजोर वर्गों की सुरक्षा करने वाले तंत्र की विफलता को भी उजागर करते हैं। एक रिपोर्ट में यह बात सामने आई है।
रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान में बच्चों के साथ दुर्व्यवहार और हत्या के मामले लगातार बढ़ रहे हैं, लेकिन ये घटनाएं कुछ समय के लिए सुर्खियों में रहने के बाद जल्द ही भुला दी जाती हैं।
बाल अधिकार संगठन साहिल के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2025 में बाल उत्पीड़न के 3,630 मामले दर्ज किए गए, जो पिछले वर्ष की तुलना में 8 प्रतिशत अधिक हैं।
हालांकि ये आंकड़े बेहद चिंताजनक हैं, लेकिन इन मामलों पर न तो व्यापक राष्ट्रीय बहस हो पाती है और न ही ठोस नीतिगत समीक्षा देखने को मिलती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि हर गंभीर घटना के बाद कुछ समय के लिए आक्रोश जरूर दिखता है, लेकिन जल्द ही मामला ठंडा पड़ जाता है।
यूरोपियन टाइम्स में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, “बाल उत्पीड़न के मामलों में बढ़ोतरी एक गहरे संकट की ओर इशारा करती है, जो अलग-अलग क्षेत्रों और वर्गों में फैला हुआ है। इसमें शारीरिक हिंसा, यौन शोषण और उपेक्षा जैसे कई अपराध शामिल हैं। हर मामला न सिर्फ एक व्यक्तिगत त्रासदी है, बल्कि सुरक्षा तंत्र की विफलता भी है।”
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि सोशल मीडिया पर ऐसे मामलों को लेकर कुछ समय के लिए व्यापक चर्चा होती है, लेकिन यह चर्चा स्थायी बदलाव या जवाबदेही में नहीं बदल पाती। हर घटना के साथ यही चक्र दोहराया जाता है—पहले आक्रोश, फिर दुख और अंत में चुप्पी।
रिपोर्ट के अनुसार, कई मामलों में आरोपी पीड़ित के परिचित होते हैं, जैसे पड़ोसी, जान-पहचान वाले या यहां तक कि परिवार के सदस्य। इससे मामलों की पहचान और कार्रवाई और जटिल हो जाती है, क्योंकि पीड़ितों के लिए शिकायत दर्ज कराना कठिन हो जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान में बाल उत्पीड़न के मामले वास्तविक आंकड़ों से भी ज्यादा हो सकते हैं, क्योंकि सामाजिक बदनामी और सांस्कृतिक दबाव के कारण कई घटनाएं सामने ही नहीं आ पातीं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि “परिवार अक्सर सामाजिक बदनामी के डर से ऐसे मामलों की रिपोर्ट नहीं करते, और कई बार पीड़ितों को भी डर या दबाव के चलते चुप रहने के लिए मजबूर किया जाता है। यह चुप्पी समस्या को और गंभीर बना देती है और इसके समाधान में बाधा बनती है।”
रिपोर्ट ने इस समस्या से निपटने के लिए समाज और संस्थागत स्तर पर ठोस कदम उठाने की जरूरत पर जोर दिया है।
--आईएएनएस
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भारतीय संगीत का आकाश आज कुछ अधिक मौन, कुछ अधिक रिक्त प्रतीत होता है। स्वर की वह चंचल चिड़िया, जन-जन को चमत्कृत करने वाली आवाज जिसने दशकों तक हर हृदय में मधुरता के बीज बोए, आज भले ही भौतिक रूप से हमारे बीच न हो, पर उसकी गूंज अनंत में विलीन होकर भी अमर बनी हुई है। आशा भोसले केवल एक गायिका नहीं थीं, वे भारतीय आत्मा की वह स्वर-लहरी थीं, जो हर संस्कृति, हर भावना और हर युग में अपनी उपस्थिति दर्ज कराती रही। वे एक बेमिसाल गायिका, अनगिनत लोगों की आशा एवं अभिलाषा की करिश्माई आवाज बनकर करीब 12000 गीतों का सृजन कर विश्व रिकार्ड बनाया। हृदयाघात के कारण उनका जाना केवल एक कलाकार का जाना नहीं, बल्कि भारतीय संवेदना के एक पूरे युग का अवसान है, परंतु यह अवसान भी किसी अंत का नहीं, बल्कि उस अमरत्व का संकेत है जहाँ कलाकार अपने शरीर से परे होकर अपनी कृति में जीवित रहता है। “अभी न जाओ छोड़ कर” जैसे गीत आज करोड़ों हृदयों की सच्ची पुकार बन गए हैं। जिनकी आवाज ने विरह को भी मधुर बना दिया, आज उन्हीं के बिछोह में संसार भाव-विह्वल है। आशा जी की आवाज में एक अद्भुत जीवंतता थी, वह कभी किशोरी की चंचलता बन जाती तो कभी विरहिणी की करुण पुकार। उनके गीतों में जीवन की सम्पूर्णता समाहित थी-हंसी, आंसू, प्रेम, पीड़ा, श्रृंगार और भक्ति का ऐसा समन्वय जो दुर्लभ है। यही कारण है कि उनकी गूंज केवल भारत तक सीमित नहीं रही, बल्कि विश्व के अनेक देशों में लोग उनके गीतों को गुनगुनाते रहे। यदि भारतीय संगीत को एक महासागर माना जाए तो आशा भोसले उसमें बहती वह नदी थीं, जिसने हर शैली को अपने भीतर समेट लिया। क्लासिकल से लेकर पॉप, जैज से लेकर गजल और कव्वाली तक, उन्होंने हर विधा में अपनी विशिष्ट छाप छोड़ी। यह मानना कठिन है कि एक ही स्वर इतनी विविधताओं को इतनी सहजता से व्यक्त कर सकता है, पर आशाजी ने इसे संभव कर दिखाया। वे केवल गाती नहीं थीं, वे हर गीत को जीती थीं और यही कारण है कि उनके गीत केवल ध्वनि नहीं बल्कि अनुभूति बन जाते थे।
8 सितंबर 1933 को जन्मी आशाजी ने संगीत को साधना के रूप में जिया। लता मंगेशकर जैसी विराट प्रतिभा की छाया में अपनी अलग पहचान बनाना सरल नहीं था। अनेक प्रतिभाएँ उस छाया में दबकर गुमनामी में खो गईं, पर आशाजी ने संघर्ष को अपनी शक्ति बनाया। पिता दीनानाथ मंगेशकर से मिली संगीत की विरासत को उन्होंने अपने परिश्रम और साहस से विस्तार दिया। निजी जीवन के उतार-चढ़ाव, सामाजिक दबाव और प्रतिस्पर्धा के बीच भी उन्होंने अपने स्वर की लौ को कभी मंद नहीं होने दिया। ओ.पी. नैयर जैसे संगीतकारों के साथ उनका जुड़ाव उनके करियर का निर्णायक मोड़ बना और उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उनकी उपलब्धियाँ केवल लोकप्रियता तक सीमित नहीं रहीं। ग्रेमी अवार्ड से सम्मानित होना, पद्म विभूषण प्राप्त करना और गिनीज वर्ल्ड रिकार्ड में सर्वाधिक गीत गाने का रिकॉर्ड दर्ज कराना, यह सब उनकी दीर्घ साधना और असाधारण प्रतिभा के प्रमाण हैं। परंतु इन सबसे बढ़कर उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि वह प्रेम है, जो उन्हें श्रोताओं से मिला और जो आज भी उनके गीतों के माध्यम से जीवित है।
आशा जी के गीतों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे समय की सीमाओं को लांघ जाते हैं। “पिया तू अब तो आजा”, “दम मारो दम”, “चुरा लिया है तुमने”, “दिल चीज क्या है” जैसे अनगिनत गीत आज भी उतने ही ताजगी भरे लगते हैं जितने अपने समय में थे। उनके गीतों में केवल संगीत नहीं, बल्कि एक जीवंत आत्मा थी, जो हर शब्द को अर्थपूर्ण बना देती थी और उसे कालजयी बना देती थी। संगीत उनके लिए केवल कला नहीं, जीवन का श्वास था। जैसे बिना सांस के जीवन असंभव है, वैसे ही बिना संगीत के जीवन नीरस और अर्थहीन हो जाता है। उन्होंने अपने गीतों के माध्यम से यह सिद्ध किया कि संगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आत्मा का पोषण है। उनके हर गीत में कहीं न कहीं ईश्वर की स्तुति, जीवन की सार्थकता और भावनाओं की पवित्रता का स्पर्श मिलता है।
आज जब हम उन्हें स्मरण करते हैं, तो यह अनुभव होता है कि उनका जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं, बल्कि एक युग का समापन है। मो. रफी, मुकेश और किशोर कुमार के बाद आशा भोसले का जाना भारतीय संगीत की उस स्वर्णिम परंपरा के एक और दीप का बुझना है, जिसने इस देश की आत्मा को सुरों में पिरोया था। फिर भी यह भी उतना ही सत्य है कि ऐसे कलाकार कभी समाप्त नहीं होते, वे अपनी कृतियों में जीवित रहते हैं, अपने स्वरों में सांस लेते हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों के हृदय में गूंजते रहते हैं। मोहन भागवत द्वारा व्यक्त श्रद्धांजलि इस सत्य को और गहराई देती है कि आशा भोसले केवल एक गायिका नहीं थीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना की प्रतीक थीं। उनका योगदान केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने अपने गीतों के माध्यम से भारतीयता, संवेदनशीलता और जीवन के उत्सव को अभिव्यक्त किया। उनका जाना निस्संदेह एक अपूरणीय क्षति है, पर उनकी आवाज, उनकी लय, उनकी जीवंतता और उनकी आत्मा इस देश की माटी में सदैव गूंजती रहेगी। यही उनकी सच्ची अमरता है और यही हमारे लिए उनकी सबसे बड़ी विरासत है।
आशा भोसले का व्यक्तिगत जीवन जितना संघर्षमय रहा, उतना ही अदम्य साहस, जीवटता और आत्मविश्वास से भरा हुआ भी था। एक संगीत-साधक परिवार में जन्म लेकर उन्होंने बचपन से ही कठिन परिस्थितियों का सामना किया, परंतु हर चुनौती को उन्होंने अपनी शक्ति में रूपांतरित किया। लता मंगेशकर जैसी विराट विभूति की छाया में रहते हुए भी अपनी स्वतंत्र पहचान बनाना उनके असाधारण व्यक्तित्व का प्रमाण है। निजी जीवन के उतार-चढ़ाव, सामाजिक आलोचनाओं और पारिवारिक जटिलताओं के बीच उन्होंने कभी अपने आत्मबल को क्षीण नहीं होने दिया। उनकी जिंदादिली, बेबाकी, हाजिरजवाबी और जीवन के प्रति उत्सवधर्मी दृष्टिकोण उन्हें केवल एक कलाकार नहीं, बल्कि एक जीवंत प्रेरणा बनाते हैं। वे हर परिस्थिति में मुस्कराते हुए आगे बढ़ने की उस दुर्लभ कला की प्रतीक थीं, जो साधारण मनुष्यों को असाधारण बना देती है। आशाजी की प्रतिभा को तीन मुख्य संगीतकारों ने निखारा एवं संवारा, जिनमें ओ.पी.नैय्यर, रवि और आर.डी. बर्मन मुख्य है। उनका एक गीत मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है, बहुत ही लोकप्रिय है, इसके लिये उन्हें नेशनल अवार्ड मिला था।
आशा भोसले की आवाज में केवल स्वर नहीं, बल्कि एक दिव्य स्पंदन, एक अदृश्य करिश्मा और साधना की सिद्धि निहित थी। वह स्वर कभी शृंगार की मधुरता बनकर मन को मोह लेता, तो कभी विरह की वेदना बनकर आत्मा को छू जाता। उन्होंने अपने गायन के माध्यम से भारतीय संगीत को केवल सरस और मनोरंजक ही नहीं, बल्कि अर्थपूर्ण, भावपूर्ण, आध्यात्मिक और प्रेरणादायी बनाया। उनके गीतों में जीवन का दर्शन, संवेदना की गहराई और आत्मिक स्पर्श एक साथ विद्यमान रहता था। उन्होंने हर शब्द में प्राण फूँककर उसे कालजयी बना दिया, जिससे संगीत केवल सुनने का विषय नहीं, बल्कि जीने का अनुभव बन गया। वास्तव में, आशा भोंसले वह अनंत स्वर-धारा थीं, जिन्होंने भारतीय संगीत को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाकर उसे वैश्विक चेतना में प्रतिष्ठित किया और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का अक्षय स्रोत बना दिया।
- ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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