दिब्येंदु बोले- रेस्पेक्ट मांगी नहीं जाती, काम से मिलती है:कई बार रिजेक्शन झेले, स्ट्रगल में दोस्तों के घरों में गुजरे कठिन दिन
‘मामला लीगल है’ के दूसरे सीजन के साथ दिब्येंदु भट्टाचार्य फिर चर्चा में आए। दैनिक भास्कर से बातचीत के दौरान उन्होंने करियर, स्ट्रगल और नए प्रोजेक्ट्स पर बातचीत की। उन्होंने बताया कि इस सीजन में कहानी पहले से ज्यादा गहरी हो जाती है। इसमें इंटरनेशनल रिलेशन, फिलॉसफी और कैपिटल पनिशमेंट जैसे गंभीर मुद्दे शामिल हैं। शो सिर्फ एंटरटेनमेंट नहीं, सोचने पर मजबूर करने वाला अनुभव बनता है। उन्होंने ‘अनदेखी 4’, ‘अल्फा’ और ‘गुलाबी’ पर अपडेट दिए। अमिताभ बच्चन, आमिर खान और हुमा कुरैशी के साथ काम के अनुभव साझा किए। मुंबई के शुरुआती संघर्ष और घर बनाने की जद्दोजहद भी याद की। सवाल: ‘मामला लीगल है’ के दूसरे सीजन में क्या खास है, और दर्शकों को क्या नया देखने को मिलेगा? जवाब: ज्यादा बताऊंगा तो स्पॉइलर हो जाएगा, लेकिन पहले सीजन में एक मजबूत दुनिया बनाई गई थी। दूसरे सीजन में वही दुनिया और गहरी हो जाती है। इस बार इंटरनेशनल रिलेशनशिप, फिलॉसफी और मेरे किरदार के जरिए अहम मैसेज देने की कोशिश की गई है। कैपिटल पनिशमेंट जैसे मुद्दों पर भी बात होती है। कॉमिक एलिमेंट के साथ यह सीजन डीप है और दर्शकों को एंटरटेनमेंट के साथ बहुत कुछ सिखाता है। सवाल: फिल्म ‘अल्फा’ और आलिया भट्ट के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा? जवाब: फिल्म के बारे में अभी ज्यादा नहीं कह सकता, क्योंकि एनडीए में है। यह एक बड़ी फिल्म है। आलिया भट्ट बहुत अच्छी एक्ट्रेस और शानदार इंसान हैं। उनसे मुलाकात वेब सीरीज ‘पोचर’ के दौरान हुई थी, जहां वो एग्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर थीं। सवाल: वेब सीरीज ‘अनदेखी 4’ में क्या नया देखने को मिलेगा? जवाब: ‘अनदेखी’ की दुनिया वही है, लेकिन कहानी में नए ट्विस्ट आते हैं। यह बिंज-वॉच शो है। एक बार देखना शुरू करेंगे तो खत्म करके ही उठेंगे। जैसे जिंदगी बदलती है, वैसे ही ‘अनदेखी’ की दुनिया भी बदलती रहती है। सवाल: फिल्म ‘गुलाबी’ में हुमा कुरैशी के साथ आपकी केमिस्ट्री कैसी रही? जवाब: हुमा कुरैशी शानदार एक्ट्रेस और बहुत अच्छी इंसान हैं। उनके साथ काम करना आसान और मजेदार होता है। हम सेट पर खूब एंजॉय करते हैं। साथ में खाना-पीना चलता रहता है। सवाल: आप खाने-पीने के कितने शौकीन हैं? जवाब: मैं खाने का बहुत शौकीन हूं। जहां जाता हूं, वहां का लोकल खाना ट्राय करता हूं। आउटडोर शूट में समय मिले तो खुद भी कुछ बना लेता हूं। सवाल: आपने कई दिग्गजों के साथ काम किया है। कुछ अनुभव बताइए? जवाब: मेरी पहली फिल्म ‘मॉनसून वेडिंग’ थी, जिसमें नसीरुद्दीन शाह थे। उन्होंने मुझे नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में पढ़ाया भी था। फिल्म में हमारे साथ कोई सीन नहीं था, जो मेरे लिए अफसोस की बात रही। करियर के शुरुआती दिनों में अमिताभ बच्चन और आमिर खान जैसे बड़े स्टार्स के साथ काम करने का मौका मिला। सवाल: अमिताभ बच्चन के साथ आपका अनुभव कैसा रहा? जवाब: मेरी पहली कमर्शियल फिल्म ‘ऐतबार’ थी, जिसमें मुझे अमिताभ बच्चन के साथ काम करने का मौका मिला। जब मैं नया-नया मुंबई आया था, तब उन्हें सेट पर देखना ही बड़ी बात थी। वो तीन-चार कुर्सियां लगाकर बैठते थे और किताब पढ़ते रहते थे। उनका डिसिप्लिन और ऑरा कमाल का है। एक एक्शन सीन में मैंने ज्यादा एग्रेसिव होकर परफॉर्म किया, तो उन्होंने हंसते हुए कहा- “आराम से, आराम से… मैं एक बूढ़ा आदमी हूं।.” यह उनका ह्यूमर और सादगी दिखाता है। उनकी फिटनेस देखकर मैं हैरान रह गया। एक किक सीन में उनका पैर मेरे कंधे से ऊपर पहुंच गया था। उनसे मैंने सीखा कि रेस्पेक्ट मांगी नहीं जाती, अपने काम से कमाई जाती है। सवाल: आमिर खान के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा? जवाब: आमिर खान के साथ फिल्म ‘मंगल पांडे’ में काम किया। वह बेहद डेडिकेटेड एक्टर हैं और स्क्रिप्ट पर गहराई से काम करते हैं। उनका सोचने का तरीका इंटरनेशनल है। वह को-एक्टर्स की मदद करते हैं। खुद क्यू देते हैं ताकि सीन बेहतर बन सके। उनका मानना है कि एक्टिंग पूरी तरह टीमवर्क है। सवाल: आपके करियर की शुरुआत और स्ट्रगल कैसा रहा? जवाब: मैं 1994–97 तक NSD में था और 2000 तक रेपर्टरी में काम किया। वहां की पॉलिटिक्स से परेशान होकर छोड़ दिया। पहले कोलकाता गया, लेकिन वहां काम नहीं मिला। फिर दिल्ली में ‘मॉनसून वेडिंग’ की कास्टिंग के दौरान मौका मिला। पहले किसी और को कास्ट किया गया था, लेकिन बाद में ऑडिशन के जरिए मुझे रोल मिला, यहीं से सफर शुरू हुआ। सवाल: आप ‘मॉनसून वेडिंग’ के बाद मुंबई आए। यहां आने पर पुराने दोस्तों का कितना सहारा मिला? जवाब: मुझे दोस्तों का बहुत सपोर्ट मिला। मेरा एक बैचमेट राजीव कुमार है, जो टीवी इंडस्ट्री में बड़ा नाम है। वह हमारे बैच का पहला इंसान था जिसने लोखंडवाला की कृष्णा कावेरी सोसाइटी में घर खरीदा था। मैंने उससे कहा था कि मैं तीन साल बाद आऊंगा और उसी के पास रहूंगा। लेकिन जब मैं मुंबई पहुंचा, उसे पता नहीं था कि मैं आ रहा हूं, क्योंकि उस समय फोन-पेजर का दौर था। कॉल करना भी सोच-समझकर होता था। वह शूटिंग के लिए 10 दिन बाहर था, तो मैं अपने दोस्त राजपाल यादव के घर चला गया। उस समय हम सब स्ट्रगल कर रहे थे और एक-दूसरे के साथ रहकर काम चलता था। सवाल: मुंबई में शुरुआती रहने का सफर कैसा रहा? जवाब: शुरुआत में कहीं टिककर रहना मुश्किल था। दोस्त ही सहारा थे। जब थोड़ा काम मिलने लगा, तब लगा कि अपना घर होना चाहिए। सबसे बड़ी दिक्कत लोन को लेकर आई। उस समय इनकम स्टेबल नहीं थी, इसलिए बैंक लोन देने को तैयार नहीं थे। बार-बार रिजेक्शन मिलता था। फिर जुगाड़ करके, थोड़ा सेविंग, थोड़ा उधार और भरोसे के दम पर आखिरकार मुंबई में अपना घर लिया। यह बड़ा मोमेंट था, क्योंकि स्ट्रगल के बाद घर लेना सेटल होने जैसा था। सवाल: इतने सालों बाद भी क्या शूटिंग के पहले दिन नर्वसनेस होती है? जवाब: आज भी लगता है कि यह मेरा पहला दिन है, पहला कैरेक्टर है। सोचता हूं इसे कैसे डेवलप करूंगा। सेट पर इतने लोग देखते हैं। कैमरामैन, साउंड वाले, तो अलग दबाव होता है। कॉन्फिडेंस होता है, लेकिन ओवरकॉन्फिडेंस नहीं लेता। मैं हमेशा संतुलित रहने की कोशिश करता हूं, क्योंकि वही सही स्थिति है। सवाल: कब लगा कि अब लोग आपको पहचानने लगे हैं? जवाब: थोड़ी पहचान ‘ब्लैक फ्राइडे’ और ‘देव डी’ के बाद मिलनी शुरू हुई। उस समय लोग चेहरे से पहचानते थे, नाम से नहीं। आज भी कई लोग कहते हैं, “आपको कहीं देखा है,” लेकिन सही जगह याद नहीं आती। कभी-कभी लोग गलत फिल्म या सीरीज का नाम भी बोल देते हैं। फिर मुझे कहना पड़ता है कि “भाई, गूगल कर लो।” असल में सही पहचान OTT के आने के बाद मिली। जब काम ज्यादा लोगों तक पहुंचता है और उन्हें पसंद आता है, तभी लोग दिल में जगह देते हैं। सवाल: शुरुआत में जब काम कम मिलता था, तब क्या करते थे? जवाब: कुछ खास नहीं करता था। घर पर समय बिताता था। बच्चों के साथ खेलना, उन्हें स्कूल छोड़ना, पियानो और डांस क्लास ले जाना, खाना बनाना, किताबें पढ़ना, फिल्में देखना। मैं फैमिली वाला इंसान हूं। काम नहीं होता था तो कोलकाता चला जाता था और वहां समय बिताकर वापस आता था। सवाल: क्या आपने एक्टिंग की ट्रेनिंग भी दी है? जवाब: मैंने कभी इंस्टिट्यूट खोलकर ट्रेनिंग नहीं दी, लेकिन जरूरत पड़ने पर वर्कशॉप और वन-ऑन-वन कोचिंग की। मैंने अर्जुन कपूर, परिणीति चोपड़ा, वाणी कपूर जैसे कलाकारों एक्टिंग की ट्रेनिंग दी है। कई फिल्मों और प्रोजेक्ट्स में भी कोचिंग दी। वर्कशॉप आमतौर पर 7 से 15 दिन, और कभी-कभी एक महीने तक की होती थी। सवाल: आप एक्टिंग सिखाते समय किन बातों पर जोर देते हैं? जवाब: मैं सिर्फ डायलॉग या सीन नहीं सिखाता, बल्कि सोच सिखाता हूं। एक्टर की सोच अलग होनी चाहिए कि कैसे ऑब्जर्व करना है, चीजों को समझना है, ज्ञान इकट्ठा करना है और उसे परफॉर्मेंस में बदलना है। एक्टिंग जिम जाने जैसी चीज नहीं है। यह बड़ा और गहरा क्राफ्ट है। सवाल: जब आप इंडस्ट्री में आए, तो हीरो-विलेन को लेकर एक तय छवि होती है। क्या बचपन में आपने कभी सोचा था कि आप एक्टर बनेंगे? जवाब: नहीं, बचपन में मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं एक्टर बनूंगा। मैं पूरी तरह स्पोर्ट्स में था। फुटबॉल और क्रिकेट खेलता था। मुझे साहित्य में भी रुचि थी। मैं ‘लिटिल मैगजीन’ चलाता था, आर्टिकल लिखता था और कॉलेज मैगजीन में लिखता था। साथ ही थिएटर भी करता था। कोलकाता में मेरे दो थिएटर ग्रुप थे, एक में डायरेक्शन करता था और दूसरे में एक्टिंग। 2-3 और ग्रुप्स के साथ भी जुड़ा था। मैं स्टूडेंट यूनियन में भी एक्टिव था, इसलिए दिनभर व्यस्त रहता था। सवाल: तो एक्टिंग का ख्याल कब आया? जवाब: जब ग्रेजुएशन खत्म होने वाला था, तब लगा कि जिंदगी में कुछ खास नहीं किया। सिर्फ बीकॉम करके क्या करूंगा? उस समय उम्र 21-22 साल थी और स्पोर्ट्स में उस स्तर तक नहीं पहुंच पाया था, जहां तक पहुंचना चाहता था। तभी लगा कि एक्टिंग ऐसी चीज है, जो मैं कर सकता हूं। सवाल: इसके बाद आपका सफर कैसे आगे बढ़ा? जवाब: मैंने थिएटर को गंभीरता से लेना शुरू किया। 1993 में IPTA (वेस्ट बंगाल) की तरफ से बेस्ट एक्टर का अवॉर्ड मिला। 1994 में नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) जॉइन किया। एनएसडी में आने के बाद भी कभी नहीं सोचा था कि मुंबई जाऊंगा। मैं थिएटर ही करना चाहता था, इसलिए रिपर्टरी कंपनी जॉइन की। वाल: रिपर्टरी और थिएटर का अनुभव कैसा रहा? जवाब: रिपर्टरी में थिएटर करना मेरे लिए खास अनुभव था, क्योंकि वहां इज्जत और पैसे- दोनों के साथ काम करने का मौका मिलता था। सरकारी संस्था होने के कारण बड़े बजट में अलग-अलग तरह के नाटक करने का मौका मिलता था। यहां कॉमर्शियल दबाव नहीं होता था- टिकट बिके या न बिके, फर्क नहीं पड़ता था। हम ऐसे प्रयोग करते थे, जो बाहर इंडिपेंडेंट थिएटर में करना मुश्किल होता है। सवाल: फिर थिएटर छोड़कर आगे बढ़ने का फैसला कैसे लिया? जवाब: कुछ समय बाद माहौल अलग होने लगा। मुझे लगा कि हर किसी का अपना एजेंडा है और मेरा अपना। मैं बेवजह लड़ाई-झगड़े में समय खराब नहीं करना चाहता। इसलिए अपनी राह अलग बनाना बेहतर लगा और वहां से निकल आया। सवाल: आपके आने वाले प्रोजेक्ट्स कौन-कौन से हैं? जवाब: कुछ प्रोजेक्ट्स लाइन में हैं। एक ‘राख’ है, जो अमेजन पर आएगी और उसका टीजर आ चुका है। इसके अलावा एक सीरीज साल के अंत तक आएगी। ‘गुलाबी’, ‘रुका हुआ फैसला’, ‘अल्फा’ जैसे प्रोजेक्ट्स भी हैं। साथ ही ‘चकदा एक्सप्रेस’ भी है, लेकिन उसकी रिलीज तय नहीं है। अगर सब सही से रिलीज हो जाएं, तो दर्शकों को अच्छी चीजें देखने को मिलेंगी।
गीतकार हसरत जयपुरी की 104वीं बर्थ एनिवर्सरी:भांजे डब्बू मलिक बोले- आखिरी सांस तक मामा के हाथ में कलम और किताब थी
हिंदी सिनेमा के दिग्गज गीतकार हसरत जयपुरी की 104वीं बर्थ एनिवर्सरी पर उनके भांजे डब्बू मलिक ने उनसे जुड़ी कई खास यादें साझा कीं। उन्होंने बताया कि हसरत जयपुरी न सिर्फ बेहतरीन शायर थे, बल्कि अपनी निजी जिंदगी में बेहद सादगी और अपनापन रखने वाले इंसान भी थे। चौपाटी पर खिलौने बेचने और बस कंडक्टर की नौकरी से शुरू हुआ उनका सफर उन्हें फिल्म इंडस्ट्री के शीर्ष गीतकारों में ले आया। शंकर-जयकिशन और राज कपूर के साथ उनकी जोड़ी ने कई यादगार गाने दिए। आखिरी सांस तक उनके हाथ में कलम और किताब रही, जो उनके काम के प्रति जुनून को दिखाती है। लोग इतना इंपोर्टेंस उन्हें क्यों दे रहे हैं, यह जानने के लिए वर्षों लगे डब्बू मलिक बताते हैं- हम बहुत छोटे थे, तब खार स्थिति मामा हसरत जयपुरी के घर पर जाते थे। घर से बालकनी से सटा उनका बेड होता था, जहां बैठकर वे पोयट्री लिखते थे। हमारी बचपन की यादें यह है कि बड़े-बड़े डायरेक्टर, प्रोडूसर, एक्टर का हुजूम उनसे मिलने के लिए घर आते थे। हम छोटे थे, तब इतना क्लीयर नहीं होता था कि लोग उन्हें इतना रिस्पेक्ट या इतना इंपोर्टेंस क्यों दे रहे हैं। यह जानने के लिए हमें वर्षों लगे। फिर धीरे-धीरे पता चला कि मामाजी बहुत बड़े गीतकार हैं। अब पीछे मुड़कर देखता हूं, तब पाता हूं कि बाप रे! इस इंसान ने इतना बेहतरीन काम किया। उनकी सबसे खूबसूरत चीज यह होती थी कि उनको किमाम पान और परफ्यूम का बड़ा शौक था। उसी तरह उनकी खुशबूदार पर्सनालिटी भी थी। उनका बहन-बहनोई आदि का काफी बड़ा कुनबा था और वे सबको बड़ा प्यार देते थे। सबका खयाल रखते थे, उनकी यह सबसे बड़ी विशेषता थी। लोगों की जिंदगी के बारे में सोचते थे और उसमें मग्न रहते थे। हम लोग सोचते थे कि उनका अटेंशन लेना भी बहुत मुश्किल था। बिकॉज, वे दिन भर गीत लिखने में लगे रहते थे। जयकिशन की डेथ पर दिन भर रोते रहे मुझे उनकी एक शाम की बात याद है, जो कभी भूलता नहीं हूं। वह यह है कि जय किशन की डेथ हुई थी। उस दिन नेशनल रेडियो पर उनका लिखा गीत पूरे हिंदुस्तान में बज रहा था। वह गीत था- ‘गीतों का कन्हैया चला गया, अब गीत मेरे विरान हुए...’, इसे सुनकर उनके आंसू रुक नहीं रहे थे। मुझे पता नहीं, शायद इसकी कम्पोजिशन शंकर-जयकिशन जी ने की होगी। लेकिन वह लम्हा कभी भुलाए भुला नहीं जाता। उनके गीतों पर शंकर-जयकिशन की जोड़ी ने बड़ा दिलकश काम किया है। आखिरी सांस तक उनके हाथ में कलम और किताब थी मामा हसरत जयपुरी, मुझसे बेहद प्यार करते थे। मैं उनका लाडला था, क्योंकि घर में सबसे छोटा मैं ही था। मुझे उनसे बहुत प्यार मिला। हालांकि उस समय वे काफी ओल्ड हो चुके थे, लेकिन उन्होंने मुझे प्रेडिक्ट किया था कि तुम्हारे अंदर भी एक संगीतकार छुपा है, तुम गाने बना सकते हो। मैंने बोला कि मैं तो कुछ सीखा ही नहीं हूं। उस समय तक वे जुहू स्थिति अपने बंगले में रहने के लिए आ गए थे। जुहू में उनका भव्य बंगला था। फाइनेंशियली बहुत ही सिक्योर इंसान थे। वे और उनकी वाइफ ने फैमिली के लिए बड़े-बड़े डिसीजन लिये। अपने जमाने में उनकी बहुत ही सक्सेसफुल फैमिली रही है। वे आने वाली 10 जेनरेशन को सिक्योर करके चले गए। इतने महान आदमी थे। लेकिन मैंने एक चीज देखी है कि आखिरी सांस तक उनके हाथ में कलम और किताब थी। अपनी बहन यानी मेरी मम्मी के लिए लिखा गीत मेरी मम्मी मिल्किस, हसरत जयपुरी की सबसे छोटी बहन थीं। वे मेरी मम्मी को बहुत प्यार करते थे। प्यार से मम्मी को नन्हूं (छोटी) बुलाते थे। उन्होंने गीत- ‘सुनो छोटी-सी गुड़िया की लंबी कहानी...’, मेरी मम्मी के लिए लिखा था। मेरी मम्मी के जीवन में जो संघर्ष था, उसे ध्यान रखते हुए लिखा था। पापा ने काफी स्ट्रगल देखा था। उनके लिए तो मम्मी 15-16 साल की बहन थी, जिनकी शादी 18 साल की उम्र में हो गई। उन्होंने बहन की सारी जिंदगी देखी। हालांकि अपने हिसाब से वे जो कुछ भी कर सकते थे, वह किया। लेकिन मम्मी को देखकर वे हमेशा कहते थे कि यह मेरी गुड़िया है। उनको इन सब चीजों की तकलीफ उठाने की जरूरत नहीं थी, तब उन्होंने यह गाना लिखा था। अपने काम के प्रति फोकस्ड थे उनकी बहुत ही क्रिएटिव और बड़े कमाल की पर्सनालिटी थी। अपने काम के प्रति इतना फोकस्ड और इतना लीन होना उनसे सीखा जा सकता है। मतलब उनके पास किसी तरह का कोई डायवर्जन ही नहीं था। दिन भर लफ्जों की कहानी में बिजी रहते थे। उन्होंने कभी नॉर्मल जिंदगी जिया ही नहीं। हर एक पल, हर एक क्षण उनको सिर्फ म्यूजिक, लिरिक्स, गीत-गाने, मुखड़े ही सुनते थे। कमाल की शख्सियत थी। डायरेक्टर वगैरह से मिलना हो, तभी वे पार्टी-फंक्शन में जाते थे। अपने जमाने में राइटिंग कि हिसाब से कमर्शियल सक्सेसफुल इंसान रहे। उन्होंने अपने दौर में जो समय देखा है, वह कोई देख ही नहीं सकता। इतना पॉवर, इतनी कमर्शियल सक्सेस, बाप रे बाप! वॉव!! आज अतीत में जाएंगे, तब पाएंगे कि क्या गाने और क्या पिक्चर, क्या काम किया है। मैंने भी सुना है कि चौपाटी पर बैठकर खिलौने बेचते थे उनके बारे जितना सुना है, वह यह है कि वे अपनी फैमिली को संभालने जयपुर से मुंबई आए थे। यहां चौपाटी पर बैठकर खिलौने बेचते थे। फिर उनको बस कंडक्टर की नौकरी मिली। फिर किसी मुशायरे में बतौर पोएट उनको पृथ्वी राज कपूर मिले। पृथ्वी राज कपूर ने उन्हें रेकमेंड किया है कि मेरे बेटे राज कपूर से मिलिए। वहां से कहानी शुरू हुई। मैंने इतना मेहनत करने वाला इंसान अपनी जिंदगी में कभी नहीं देखा। ‘बाहरों फूल बरसाओ...’, ‘लिखे जो खत तुझे...’, ‘तुम मुझे यूं न भुला पाओगे...’, ‘एहसास तेरा होगा मुझ पर...’ ‘जिंन्दगी एक सफर है सुहाना...’ आदि उनके लिखे मेरे पसंदीदा गानों की लिस्ट ही खत्म नहीं होगी। आज सोचता हूं कि इतना दिग्गज इंसान इस पृथ्वी पर आया और इतने अच्छे रोमेंटिक गाने लिखकर चला गया। खुशकिश्मत हूं कि उन्हें गले लगाने का मौका मिला हम तो सारी जिंदगी उनके मुरीद ही बने रहेंगे। कभी-कभी खुद को खुशकिस्मत समझते हैं, जो उनको दिल से दिल गले लगाने मौका मिला। हम उनको किस कर सके और वे हमारे माथे को चूम सके। यह हमारी किस्मत थी कि इतने बड़े आदमी का हमें प्यार मिला। उन्हें वेज-नॉन वेज सब पसंद था। उनके बेटे भी कहते हैं कि गाना और खाना उनका फेवरिट रहा है। वे अपनी बहन यानी मेरी मम्मी के हाथ का खाना खाने के लिए शंकर-जयकिशन, राज कपूर आदि के साथ घर आया करते थे। मेरी मम्मी बहुत अच्छा नॉन वेजिटेरियन बनाती थी। वे घर पर फोन करके बोलते थे कि नंदो से कहना कि आज शाही कबाब बना दें। मेरी मम्मी के खाने पकाने पर उनको बड़ा गर्व था। वे बड़े साधारण तरीके जन्मदिन मनाते थे। जन्मदिन पर गरीबों को खाना बांटते थे।
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