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सड़कों से गायब हुए फुटपाथ: अतिक्रमण पर आँख बंद करके बैठा प्रशासन

सड़कों से गायब होते फुटपाथ आज भारत के शहरी जीवन की एक कठोर सच्चाई बन चुके हैं, और अभी तक की स्थिति तक उपलब्ध नवीनतम सरकारी रिपोर्टों, नीतिगत दस्तावेजों और विश्वसनीय अध्ययनों को देखने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि यह समस्या न तो नई है और न ही आकस्मिक, बल्कि यह लगातार उपेक्षा, कमजोर शहरी नियोजन और प्रशासनिक निष्क्रियता का परिणाम है। भारत सरकार के सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट “रोड एक्सीडेंट इन इंडिया 2022” के अनुसार देश में कुल सड़क दुर्घटना मृत्यु में लगभग 19 प्रतिशत पैदल यात्रियों की हिस्सेदारी रही। इसका सीधा अर्थ यह है कि हर पाँच में से लगभग एक व्यक्ति, जो सड़क पर जान गंवा रहा है, वह पैदल चल रहा था। यह आँकड़ा केवल दुर्घटना का नहीं, बल्कि शहरी ढाँचे की प्राथमिकताओं का दर्पण है, जहाँ पैदल चलने वालों की सुरक्षा को व्यवस्थित रूप से नजरअंदाज किया गया है।

भारत के शहरी ढांचे में पैदल यात्रियों की भूमिका को समझना आवश्यक है। विभिन्न शहरी परिवहन अध्ययनों, जैसे कि “नैशनल अर्बन ट्रांसपोर्ट पॉलिसी 2006” और उसके बाद के संशोधित दृष्टिकोणों में यह स्वीकार किया गया है कि भारतीय शहरों में 20 से 40 प्रतिशत तक यात्राएँ छोटी दूरी की होती हैं, जिन्हें लोग पैदल या गैर-मोटर चालित साधनों से तय करते हैं। इसके बावजूद, शहरों की सड़क योजना मुख्यतः मोटर वाहनों की गति और संख्या को ध्यान में रखकर बनाई जाती है। नीति और व्यवहार के इस अंतर ने फुटपाथों को ‘वैकल्पिक’ बना दिया है, जबकि वे वास्तव में शहरी जीवन की मूलभूत आवश्यकता हैं। परिणामस्वरूप, आज अधिकांश शहरों में या तो फुटपाथ मौजूद ही नहीं हैं, या वे इतने खंडित, संकरे और अव्यवस्थित हैं कि उनका उपयोग करना जोखिम भरा हो जाता है।

फुटपाथों के अतिक्रमण की समस्या इस संकट को और गहरा करती है। शहरी स्थानीय निकायों के अधिकार क्षेत्र में आने वाले फुटपाथ, व्यवहार में बहुउद्देश्यीय और अनियंत्रित उपयोग के स्थल बन गए हैं। उन पर रेहड़ी-पटरी, अस्थायी दुकानें, अवैध पार्किंग, निर्माण सामग्री और कई बार स्थायी संरचनाएँ तक देखी जा सकती हैं। यह स्थिति केवल अवैधता का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह शहरी अर्थव्यवस्था और नियोजन के बीच असंतुलन का भी संकेत है। “Street Vendors (Protection of Livelihood and Regulation of Street Vending) Act, 2014” ने स्पष्ट रूप से यह प्रावधान किया था कि स्ट्रीट वेंडर्स को व्यवस्थित तरीके से निर्दिष्ट क्षेत्रों में स्थान दिया जाए, ताकि उनकी आजीविका भी सुरक्षित रहे और सार्वजनिक स्थानों का अतिक्रमण भी नियंत्रित हो। लेकिन 2026 तक उपलब्ध विभिन्न राज्य स्तरीय क्रियान्वयन रिपोर्टों और मीडिया विश्लेषणों से यह स्पष्ट है कि अधिकांश शहरों में टाउन वेंडिंग कमेटियाँ पूरी तरह सक्रिय नहीं हैं और न ही पर्याप्त वेंडिंग जोन विकसित किए गए हैं। इस नीति-क्रियान्वयन अंतर ने फुटपाथों को अव्यवस्था के हवाले कर दिया है।

प्रशासनिक दृष्टि से देखें तो समस्या और भी जटिल दिखाई देती है। नगर निगमों और विकास प्राधिकरणों के पास अतिक्रमण हटाने के लिए पर्याप्त कानूनी शक्तियाँ मौजूद हैं, लेकिन कार्रवाई प्रायः असंगत और अल्पकालिक होती है। समय-समय पर चलाए जाने वाले अतिक्रमण हटाओ अभियान कुछ दिनों के लिए दृश्य परिवर्तन अवश्य लाते हैं, लेकिन स्थायी सुधार नहीं कर पाते। इसका एक प्रमुख कारण राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव है, क्योंकि अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई अक्सर स्थानीय स्तर पर विरोध और दबाव का कारण बनती है। इसके अतिरिक्त, विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी भी एक बड़ी बाधा है, जहाँ सड़क, यातायात, नगर नियोजन और पुलिस विभाग अलग-अलग काम करते हैं, लेकिन साझा रणनीति का अभाव रहता है। यह संस्थागत विफलता फुटपाथों की दुर्दशा को स्थायी बना देती है।

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फुटपाथों की गुणवत्ता और डिजाइन भी उतनी ही गंभीर समस्या है। भारतीय सड़क कांग्रेस (IRC) द्वारा जारी दिशानिर्देश स्पष्ट रूप से बताते हैं कि शहरी सड़कों पर फुटपाथों की न्यूनतम चौड़ाई, समतल सतह, बाधा-रहित मार्ग और दिव्यांगजन के लिए सुगम डिजाइन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। लेकिन जमीनी स्तर पर इन मानकों का पालन अपवाद के रूप में ही देखने को मिलता है। कई शहरों में फुटपाथ बीच-बीच में टूट जाते हैं, कहीं बिजली के खंभे या पेड़ रास्ता रोक लेते हैं, तो कहीं ऊँचाई और ढलान इतनी असमान होती है कि पैदल चलना लगभग असंभव हो जाता है। इस प्रकार की अव्यवस्थित संरचना पैदल यात्रियों को सड़क पर उतरने के लिए मजबूर करती है, जिससे दुर्घटनाओं का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

इस समस्या का एक महत्वपूर्ण आयाम सामाजिक न्याय से भी जुड़ा हुआ है। पैदल चलने वाले लोग प्रायः समाज के वे वर्ग होते हैं, जिनके पास निजी वाहन नहीं होते—जैसे मजदूर, छात्र, बुजुर्ग, महिलाएँ और निम्न आय वर्ग। जब फुटपाथ सुरक्षित नहीं होते, तो इसका सबसे अधिक प्रभाव इन्हीं वर्गों पर पड़ता है। इस दृष्टि से फुटपाथों का अभाव केवल एक भौतिक कमी नहीं, बल्कि शहरी असमानता का प्रत्यक्ष उदाहरण है। संयुक्त राष्ट्र के “सतत विकास लक्ष्य” विशेष रूप से लक्ष्य 11 (सतत शहर एवं समुदाय) में सुरक्षित, समावेशी और सुलभ सार्वजनिक स्थानों की आवश्यकता पर बल दिया गया है। भारत ने इन लक्ष्यों को अपनाया है, लेकिन फुटपाथों की वर्तमान स्थिति यह संकेत देती है कि इन लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है।

अंतरराष्ट्रीय अनुभव यह दिखाते हैं कि यदि नीति-निर्माण में पैदल यात्रियों को प्राथमिकता दी जाए, तो शहरी जीवन की गुणवत्ता में व्यापक सुधार संभव है। विश्व बैंक और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के अध्ययन यह बताते हैं कि जिन शहरों में पैदल और साइकिल आधारित परिवहन को बढ़ावा दिया गया है, वहाँ न केवल सड़क दुर्घटनाओं में कमी आई है, बल्कि प्रदूषण, ट्रैफिक जाम और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएँ भी कम हुई हैं। इसके विपरीत, भारत के अधिकांश शहर अभी भी वाहन-केंद्रित विकास मॉडल पर आधारित हैं, जहाँ सड़कों का विस्तार तो होता है, लेकिन फुटपाथों को या तो नजरअंदाज किया जाता है या बाद में जोड़ने की कोशिश की जाती है, जो अक्सर असफल रहती है।

समाधान की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता दृष्टिकोण में बदलाव की है। फुटपाथों को ‘सप्लीमेंटरी’ नहीं, बल्कि ‘प्राथमिक’ अवसंरचना के रूप में देखा जाना चाहिए। प्रत्येक नई सड़क परियोजना में फुटपाथों को अनिवार्य घटक बनाया जाए और उनके लिए अलग से बजट और समयसीमा तय की जाए। इसके साथ ही, अतिक्रमण के समाधान के लिए केवल दमनात्मक कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि समावेशी नीति की आवश्यकता है, जिसमें स्ट्रीट वेंडर्स के लिए व्यवस्थित और कानूनी स्थान उपलब्ध कराए जाएँ। “स्ट्रीट वेंडर्स ऐक्ट 2014” का प्रभावी क्रियान्वयन इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, बशर्ते इसे गंभीरता से लागू किया जाए।

अंततः, फुटपाथों का प्रश्न केवल शहरी नियोजन या यातायात प्रबंधन का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह नागरिक अधिकारों, गरिमा और लोकतांत्रिक समानता से जुड़ा हुआ विषय है। जब कोई नागरिक अपने ही शहर में सुरक्षित और सम्मानजनक तरीके से पैदल नहीं चल सकता, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि शासन के मूल उद्देश्यों पर भी प्रश्नचिह्न है। 2026 के इस समय में, जब भारत ‘स्मार्ट सिटी’, ‘अमृत योजना’ और सतत विकास की बात कर रहा है, तब यह आवश्यक है कि विकास की परिभाषा को पुनः परिभाषित किया जाए। सड़कों की चौड़ाई और वाहनों की गति से आगे बढ़कर, यह सुनिश्चित करना होगा कि हर व्यक्ति—चाहे वह पैदल हो—सुरक्षित, सुलभ और सम्मानजनक तरीके से शहर में चल सके। फुटपाथों की वापसी दरअसल शहरों को अधिक मानवीय बनाने की दिशा में पहला और अनिवार्य कदम है, और जब तक प्रशासन इस सत्य को स्वीकार नहीं करता, तब तक अतिक्रमण और अव्यवस्था की यह कहानी यूँ ही दोहराई जाती रहेगी।
 
- डॉ. शैलेश शुक्ला
वैश्विक समूह संपादक, सृजन संसार अंतरराष्ट्रीय पत्रिका समूह
सलाहकार संपादक, नईदुनिया
आशियाना, लखनऊ - 226012, उत्तर प्रदेश

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