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बालेंद्र शाह सरकार ने पेश की 'नेपाल फर्स्ट' विदेश नीति, संतुलित कूटनीति पर जोर

काठमांडू, 14 अप्रैल (आईएएनएस)। नेपाल में भी अब दुनिया के कई देशों की तरह देश पहले वाली विदेश नीति अपनाने का ट्रेंड दिख रहा है। मंगलवार को प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह की नई सरकार ने नेपाल फर्स्ट नीति अपनाने की योजना का अनावरण क‍िया।

सरकार ने कहा कि नेपाल फर्स्ट, नेपाली फर्स्ट का विचार उसकी कूटनीतिक प्राथमिकताओं के केंद्र में रहेगा। यह बात नेशनल कमिटमेंट पेपर के ड्राफ्ट में कही गई है, जिसे पांच मार्च के चुनाव में राष्ट्रीय मान्यता पाने वाली छह पार्टियों के बीच सुझाव के लिए साझा किया गया है। ये पार्टियां हैं, राष्ट्रिय स्वतन्त्र पार्टी, नेपाली कांग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूएमएल), नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी, राष्ट्रिय प्रजातंत्र पार्टी और श्रम संस्कृति पार्टी।

यह ड्राफ्ट पेपर नई सरकार के 100-पॉइंट गवर्नेंस रिफॉर्म एजेंडा का हिस्सा है, जो बालेंद्र शाह के 27 मार्च को प्रधानमंत्री बनने के बाद जारी किया गया था।

प्रस्ताव के अनुसार, नेपाल सभी देशों के साथ “बराबर दूरी और बराबर नजदीकी” की नीति अपनाएगा। इसके पीछे सोच यह है कि सैन्य गठबंधन, हथियारों की होड़ और युद्ध, दुनिया में शांति के लिए ठीक नहीं हैं।

असल में नेपाल का भारत के साथ रिश्ता काफी गहरा और कई पहलुओं वाला है, जैसे भूगोल, संस्कृति और धर्म। दोनों ही देश हिंदू बहुल हैं।

नेपाल आगे “संतुलित और गतिशील कूटनीति” अपनाना चाहता है, ताकि बदलती दुनिया की राजनीति को अपने विकास के मौके में बदला जा सके। साथ ही, देश अपनी संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और राष्ट्रीय हितों को सबसे ऊपर रखेगा।

सरकार का यह भी कहना है कि नेपाल अपने पड़ोसी शक्तिशाली देशों के उभार और बदलती वैश्विक परिस्थितियों का फायदा उठाकर आर्थिक विकास तेज करेगा, निवेश बढ़ाएगा और क्षेत्रीय सहयोग को मजबूत करेगा।

इस नीति के तहत नेपाल अपनी पारंपरिक गुटनिरपेक्ष नीति को जारी रखेगा, लेकिन साथ ही व्यवहारिक, लचीली और नतीजों पर ध्यान देने वाली कूटनीति अपनाएगा।

सरकार ने यह भी प्रस्ताव दिया है कि नेपाल खुद को सिर्फ “बफर स्टेट” (दो बड़े देशों के बीच फंसा हुआ देश) के रूप में नहीं, बल्कि एक “सक्रिय पुल” के रूप में बदले।

भारत और चीन जैसे दो बड़े देशों के बीच स्थित नेपाल को लंबे समय से एक बफर स्टेट माना जाता रहा है।

अब सरकार का लक्ष्य है कि त्रिपक्षीय (तीन देशों के बीच) आर्थिक साझेदारी और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी के जरिए अपने राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाया जाए, और दुनिया में नेपाल को एक स्वतंत्र, तटस्थ और गुटनिरपेक्ष देश के रूप में स्थापित किया जाए।

हालांकि इस योजना में सीधे तौर पर देशों के नाम नहीं लिए गए हैं, लेकिन आम तौर पर माना जा रहा है कि इसमें नेपाल, भारत और चीन शामिल हैं।

--आईएएनएस

एवाई/एमएस

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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भाजपा के वरिष्ठ नेता व पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा के जन्मदिन पर विशेष

– डॉ. दुर्गेश केसवानी

भारतीय राजनीति में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो केवल सत्ता के समीकरणों में न फंसकर, एक विचारधारा, संस्कृति और अडिग विश्वास का प्रतीक बन जाते हैं। मध्य प्रदेश की राजनीति में “संकटमोचक” के रूप में चर्चित पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा ऐसे ही व्यक्तित्व हैं। उनका जीवन और कार्य हमें यह संदेश देते हैं कि राजनीति केवल अवसरवादिता तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह समाज के सांस्कृतिक और धार्मिक मूल्यों की रक्षा का एक पवित्र दायित्व भी है।

15 अप्रैल 1960 को ग्वालियर की ऐतिहासिक भूमि पर जन्मे डॉ. नरोत्तम मिश्रा के व्यक्तित्व में चंबल की प्रचंडता और ग्वालियर की सांस्कृतिक गरिमा का अद्वितीय सम्मिलन है। उनकी शिक्षा और जीवन के प्रारंभिक संघर्षों ने उन्हें न केवल अकादमिक रूप से सशक्त किया, बल्कि उनके भीतर राष्ट्रवाद, सनातन संस्कृति और धर्म के प्रति अडिग श्रद्धा का बीज भी रोपित किया। डॉ. मिश्रा का राजनीति में प्रवेश केवल एक पेशेवर विकल्प नहीं था, बल्कि यह समाज की सेवा और भारतीय संस्कृति की रक्षा का संकल्प था।

डॉ. नरोत्ततम मिश्रा ने हमेशा यह कहा है कि भारत की आत्मा उसके मंदिरों, ग्रंथों और परंपराओं में बसी है। गृह मंत्री के रूप में उनके कार्यकाल में, मध्य प्रदेश में धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने और मंदिरों के जीर्णोद्धार की जो पहल की, वह उनकी इस दृष्टि का सशक्त प्रमाण है। उज्जैन के ‘महाकाल लोक’ से लेकर ओरछा के ‘राम राजा लोक’ तक, उन्होंने हर कदम पर सनातन की गरिमा को पुनर्निर्मित किया। इन प्रयासों ने न केवल राज्य की सांस्कृतिक धरोहर को फिर से जीवित किया, बल्कि लाखों श्रद्धालुओं के लिए आस्था का नया केंद्र भी स्थापित किया।

डॉ. मिश्रा का सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार उनका स्पष्ट दृष्टिकोण और साहसिक निर्णय थे। जब भी सनातन संस्कृति पर हमलावर शक्तियाँ सामने आईं, उन्होंने उनके खिलाफ हमेशा अपनी आवाज उठाई। लव जिहाद पर कड़ा कानून लागू करना हो या धर्म परिवर्तन पर रोक लगाने के लिए कानून बनाना, डॉ. मिश्रा ने यह सुनिश्चित किया कि धर्म की मर्यादाओं की रक्षा के लिए कानून उतना ही कठोर और स्पष्ट रहे जितना समाज के अन्य मुद्दों पर होता है।

डॉ. मिश्रा का सनातन धर्म के प्रति प्रेम दतिया में बने नवग्रह मंदिर में जीवित रूप से देख सकते हैं। दतिया को ‘लघु वृंदावन’ का दर्जा दिलाने में उनका अत्यधिक योगदान है, और नवग्रह मंदिर का निर्माण उनके जीवन का एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक कार्य है। यह मंदिर न केवल श्रद्धा का प्रतीक है, बल्कि सनातन धर्म के ज्योतिषीय और स्थापत्य विज्ञान का अद्वितीय संगम भी है।

दतिया का नवग्रह मंदिर दुनिया का एकमात्र ऐसा मंदिर है, जहां नौ ग्रहों के अधिष्ठाता देवों की भव्य मूर्तियाँ शास्त्रों के अनुसार स्थापित की गई हैं। यह मंदिर न केवल आध्यात्मिक शांति का केंद्र है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति और खगोलशास्त्र का एक अद्वितीय संगम भी प्रस्तुत करता है। मंदिर की स्थापत्य कला में उत्तर और दक्षिण भारतीय कला का मिश्रण है, जो डॉ. मिश्रा की कलात्मक दृष्टि और संस्कृतिपरक दृषटिकोन को दर्शाता है।

यह नवग्रह मंदिर दतिया को अंतरराष्ट्रीय धार्मिक मानचित्र पर एक प्रमुख स्थान प्रदान करता है। लाखों श्रद्धालु यहाँ आकर ग्रहों की शांति और आध्यात्मिक उन्नति के लिए पूजा अर्चना करते हैं। इससे न केवल धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिला है, बल्कि स्थानीय रोजगार के अवसरों में भी अभूतपूर्व वृद्धि हुई है।

डॉ. मिश्रा को उनके प्रभावशाली भाषणों और वाकपटुता के लिए भी जाना जाता है। चाहे वह विधानसभा में हो या प्रेस कांफ्रेंस में, वे सनातन धर्म विरोधी नरेटीव को तथ्यों और तर्कों से ध्वस्त कर देते हैं। वे हमेशा कहते हैं, “सनातन वह प्रवाह है जिसे कोई भी बांध नहीं सकता।” उनके भाषण युवाओं को प्रेरित करते हैं कि वे अपनी सांस्कृतिक धरोहर पर गर्व करें और उसे राजनीति के माध्यम से प्रोत्साहित करें।

डॉ. मिश्रा ने हमेशा संस्कृति की रक्षा के लिए आवाज उठाई है। चाहे ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर सनातन प्रतीकों का अपमान हो, या कहीं अन्यत्र सनातन के विरुद्ध कुछ हो, डॉ. मिश्रा हमेशा उसके खिलाफ खड़े हुए। उनका मानना है कि राजनीति को धर्म (कर्तव्य) के अंकुश में रहकर ही चलाना चाहिए।

सादगी और पारंपरिकता का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए, डॉ. मिश्रा ने यह सिद्ध किया है कि सत्ता के शीर्ष पर रहते हुए भी अपनी संस्कृति और परंपराओं से नाता तोड़ा नहीं जा सकता। उनकी पारंपरिक वेशभूषा और अनुष्ठान उनके सनातन धर्म के प्रति अडिग समर्पण को दर्शाते हैं। आज, डॉ. नरोत्तम मिश्रा के जन्मदिवस पर मध्य प्रदेश और देशभर से उन्हें शुभकामनाएं दी जा रही हैं। वे केवल एक राजनेता नहीं हैं, बल्कि वे उन करोड़ों सनातनी युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत हैं, जो अपनी संस्कृति को राजनीति के माध्यम से सशक्त देखना चाहते हैं। दतिया में बना नवग्रह मंदिर उनके विराट व्यक्तित्व और सनातन धर्म के प्रति अडिग निष्ठा का प्रतीक है, जो आने वाली शताब्दियों तक उनके योगदान को याद दिलाता रहेगा।

डॉ. मिश्रा का जीवन हमें यह सिखाता है कि आधुनिकता की दौड़ में भी हमें अपनी जड़ों से जुड़े रहना चाहिए। वे सनातन की ध्वजा के वाहक हैं, जो विकास और विरासत के संतुलन को समझते हैं। उनकी यह वैचारिक दृढ़ता और धर्म के प्रति अडिग निष्ठा राजनीति को एक नई दिशा प्रदान करेगी। डॉ. नरोत्तम मिश्रा को जन्मदिवस की अनंत शुभकामनाएं!

-लेखक भाजपा मध्‍यप्रदेश के प्रदेश प्रवक्‍ता हैं।

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