झारखंड छात्र आंदोलन को सपोर्ट करने पहुंचे पीयूष मिश्रा:बोले- छात्रों की आंखों में दर्द देखा तो आ गया; 'आरंभ है प्रचंड' गाकर बढ़ाया हौसला
झारखंड की राजधानी रांची में परीक्षाओं में धांधली और पेपर लीक के खिलाफ छात्रों का आंदोलन जारी है। प्रदर्शन के 16वें दिन अभिनेता और गायक पीयूष मिश्रा धरना स्थल जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम पहुंचे। उन्होंने अभ्यर्थियों के बीच बैठकर उनका समर्थन किया। मीडिया से बातचीत में पीयूष मिश्रा ने कहा कि वे छात्रों के इंटरव्यू देखकर और उनकी आंखों में दर्द देखकर यहां आए हैं। इस दौरान उन्होंने अपनी फिल्म 'गुलाल' का प्रसिद्ध गाना 'आरंभ है प्रचंड' भी गाया, जिससे पूरे परिसर में उत्साह दिखाई दिया। छात्रों को देखकर आया, कोई राजनीतिक एजेंडा नहीं मीडिया से बातचीत में पीयूष मिश्रा ने रांची आने की वजह बताई। उन्होंने कहा कि उनका यहां आने का कोई अन्य मकसद नहीं है। उन्होंने सोशल मीडिया पर प्रदर्शनकारी छात्रों के इंटरव्यू देखे थे। छात्रों की आंखों में दर्द, तकलीफ और आंसू देखकर उनसे रहा नहीं गया। दो दिन का समय खाली मिलते ही वे सीधे रांची आ गए। पीयूष मिश्रा ने कहा कि वे युवाओं को पसंद करते हैं और उन्हीं के लिए काम और सिंगिंग करते हैं। उन्होंने प्रदर्शनकारियों की तारीफ करते हुए कहा कि यह आंदोलन बिना किसी राजनीतिक झंडे या एजेंडे के शांतिपूर्ण तरीके से चलाया जा रहा है। खाने से लेकर तिरपाल और आर्थिक मदद देने का ऐलान गैंग्स ऑफ वासेपुर फेम अभिनेता ने बताया कि वे केवल मंच पर बोलने नहीं आए हैं, बल्कि अपनी क्षमता के अनुसार छात्रों की मदद भी कर रहे हैं। उन्होंने अपनी टीम और इवेंट मैनेजमेंट कंपनी की ओर से आंदोलन स्थल पर भोजन, गद्दे, तिरपाल और वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई है। पीयूष मिश्रा ने कहा कि वे कोई बहुत बड़े धन सेठ नहीं हैं, लेकिन उनसे जितना बन पड़ेगा, उतनी मदद लगातार करते रहेंगे। उन्होंने अभ्यर्थियों से अपील की कि आंदोलन को इसी तरह मर्यादित, अनुशासित और बिना किसी अभद्रता या अपशब्द के आगे बढ़ाएं। 'आरंभ है प्रचंड' गाया तो गूंज उठा प्रदर्शन स्थल धरना स्थल पर मौजूद युवाओं के बीच पीयूष मिश्रा ने निर्देशक अनुराग कश्यप की फिल्म 'गुलाल' (2009) का अपना प्रसिद्ध गाना 'आरंभ है प्रचंड' गाया। गाना शुरू होते ही पूरे स्टेडियम में मौजूद सैकड़ों छात्र-छात्राएं उनके साथ मिलकर पंक्तियां दोहराने लगे। गाना खत्म होने पर मैदान तालियों से गूंज उठा। इस भावुक पल ने प्रदर्शनकारी युवाओं में नया जोश भर दिया। पीयूष मिश्रा के अलावा बॉलीवुड के अन्य कलाकारों जैसे सोनाक्षी सिन्हा, इमरान खान, भूमि पेडनेकर और अनुपम खेर ने भी इस आंदोलन का समर्थन किया है। जानिए क्या है अभ्यर्थियों का पूरा विवाद झारखंड में छात्र 29 जुलाई से 14वीं जेपीएससी प्रारंभिक परीक्षा और जेएसएससी की भर्ती परीक्षाओं में हुई धांधली के खिलाफ आंदोलित हैं। अभ्यर्थियों का आरोप है कि राज्य में लंबे समय से परीक्षाएं समय पर नहीं हो रही हैं और जो परीक्षाएं आयोजित होती हैं, उनके पेपर लीक हो जाते हैं। छात्र 14वीं जेपीएससी पीटी परीक्षा को रद्द करने, पूरे मामले की सीबीआई (CBI) और ईडी (ED) से जांच कराने और भर्ती प्रक्रिया में सुधार की मांग कर रहे हैं। सरकार के प्रतिनिधियों और मंत्रियों के साथ कई दौर की वार्ता के बाद भी अब तक कोई ठोस फैसला नहीं हो सका है।'
लहर-लहर:ज़िंदगी से दु:ख कभी गायब नहीं हुआ, फिर गीतों की परंपरा से क्यों हो गया?
मुझे कभी-कभी लगता है कि आज की फिल्मों में जैसे दु:ख का कोई वजूद ही नहीं रह गया है। एक जमाना था जब लगभग हर फिल्म में एक-दो ऐसे गीत जरूर होते थे जो बिछड़ने, तन्हाई, इंतजार, टूटे हुए दिल या ज़िंदगी की शिकस्त की कहानी कहते थे। आज फिल्मी गानों को सुनकर तो ऐसा लगता है जैसे हर कोई हर वक्त खुश है। मैं तो मजाक में कह देता हूं कि शायद सचमुच ‘अच्छे दिन आ गए हैं!’ लेकिन हकीकत यह है कि ज़िंदगी से दु:ख कभी गायब नहीं हुआ। इंसान आज भी वही है। उसे आज भी मोहब्बत होती है, वह आज भी बिछड़ता है, उसे आज भी तन्हाई महसूस होती है और उसके ख्वाब आज भी टूटते हैं। तो फिर ऐसा क्या हुआ कि हमारे गीतों से दु:ख क्यों गायब हो गया? मेरे खयाल में दु:ख से मुंह मोड़ना किसी सेहतमंद समाज की निशानी नहीं है। यही वजह है कि पुराने दौर के दर्द भरे गीत सिर्फ मनोरंजन नहीं थे, बल्कि इंसान के दिल में दबे जज्बात को आवाज देते थे। जब कोई अपने ही दर्द को किसी गीत में सुनता है, तो उसे लगता है कि उसके दु:ख को किसी ने समझा है। यही एहसास उसके दिल का बोझ हल्का कर देता है। जब मैं शैलेंद्र, साहिर लुधियानवी और शकील बदायूनी जैसे गीतकारों को याद करता हूं, तो महसूस करता हूं कि उन्होंने दर्द को सिर्फ मोहब्बत तक सीमित नहीं रखा, उनके गीतों में तन्हाई भी थी, गरीबी भी थी, टूटे हुए ख्वाब भी थे, समाज का दर्द भी था और इंसान की बेबसी भी। शायद यही वजह है कि उनके लिखे हुए गीत आज भी उतने ही ताजा लगते हैं जितने अपने दौर में थे। आम इंसान न तो फिलॉसफी की किताबें पढ़ता है, न दुनिया का इतिहास समझने के लिए मोटे-मोटे ग्रंथ। उसके लिए फिल्मी गीत ही जीवन के मूल्य और संस्कारों के सबसे सहज शिक्षक रहे हैं। शैलेंद्र का यह गीत देखिए - किसी की मुस्कराहटों पे हो निसार, किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार, किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार...। आज के बहुत-से फिल्मकार पश्चिमी सिनेमा के प्रभाव में बड़े हुए हैं। वे गीतों को कहानी का हिस्सा नहीं, बल्कि कारोबारी जरूरत मानने लगे हैं। गीतों को बैकग्राउंड में धकेला जा रहा है, जबकि वे भारतीय सिनेमा की सांस्कृतिक विरासत हैं। बिना गीतों की फिल्म बनाना अलग बात है, लेकिन गीतों की पूरी परंपरा को खत्म कर देना न कला के हित में है, न संस्कृति के। लेकिन जरा हमारी सांस्कृतिक विरासत को देखिए। संस्कृत के प्राचीन नाटकों में गीत हैं। रामलीला और कृष्णलीला में गीत हैं। उर्दू और पारसी थिएटर में गीत हैं।नौटंकी जैसी लोकनाट्य परंपराओं में गीत हैं। यानी हमारी कथा-परंपरा में संगीत और कहानी हमेशा साथ-साथ चले हैं। फिर आज हम उनसे शर्मिंदा क्यों हों? आज कई फिल्मकार गीतों को एक तरह की ‘नेसेसरी इविल’ समझते हैं। इसका असर भी साफ दिखाई देता है। कई बार गीत का उस दृश्य से कोई रिश्ता ही नहीं होता जो पर्दे पर चल रहा है। वह बस इसलिए मौजूद होता है कि एल्बम बिके, ‘स्ट्रीमिंग’ हो और कारोबार चलता रहे; लेकिन मेरे लिए गीत तभी सार्थक है, जब वह कहानी और किरदारों के साथ सांस ले। एक और बात मुझे परेशान करती है। आज संगीत की रफ्तार इतनी तेज हो गई है कि शब्दों को सांस लेने की मोहलत ही नहीं मिलती। धुन, ताल और तकनीक कई बार बोलों पर हावी हो जाते हैं, जबकि गीत की जान उसके अल्फाज में होती है। शब्द तभी असर करते हैं, जब उन्हें सुनने, समझने और महसूस करने का वक्त मिले। आज का संगीत कहीं-न-कहीं बाजार की जल्दबाजी का शिकार हो गया है। यह मान लिया गया है कि लोगों को सिर्फ तेज धुनें, डांस नंबर और जश्न के गीत चाहिए। मैं इससे इत्तेफाक नहीं रखता। - अरविंद मण्डलोई- संपादन और समन्वय
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