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हिमाचल के पांच नगर निगमों में पार्षदों का कार्यकाल खत्म, अब प्रशासकों के हाथ में कमान
हिमाचल प्रदेश के पांच नगर निगमों का पांच साल का कार्यकाल 12 अप्रैल को खत्म हो गया। इसके साथ ही धर्मशाला, पालमपुर, मंडी, सोलन समेत अन्य नगर निगमों के महापौर, उपमहापौर और पार्षदों के अधिकार भी समाप्त हो गए। अब इन नगर निगमों का कामकाज सरकार द्वारा नियुक्त प्रशासक संभालेंगे। राज्य सरकार ने यह फैसला इसलिए लिया है क्योंकि वार्ड परिसीमन और मतदाता सूचियों के शुद्धिकरण की प्रक्रिया चल रही है, जिससे चुनाव में देरी की संभावना है।
शहरी विकास विभाग के नियमों के अनुसार अब संबंधित जिलों के उपायुक्त या उनके द्वारा नामित वरिष्ठ अधिकारी प्रशासक के रूप में नगर निगम का काम देखेंगे। यानी अब शहरों के प्रशासनिक फैसले और विकास कार्य सीधे अधिकारियों के जरिए ही होंगे।
पहले की तरह सदन की बैठकें नहीं होंगी
इस फैसले के बाद नगर निगमों में पहले की तरह सदन की बैठकें नहीं होंगी, जिनमें पार्षद विकास कार्यों और नीतियों पर चर्चा करते थे। पार्षदों के पास अब अपने वार्ड से जुड़े नए विकास कार्यों की फाइलों को मंजूरी देने का अधिकार भी नहीं रहेगा। सोमवार सुबह से ही कई नगर निगम कार्यालयों में अलग माहौल देखने को मिला। कई पार्षदों ने अपने कार्यालय खाली कर दिए और अपने आधिकारिक पहचान पत्र भी जमा कर दिए।
परिसीमन एक लंबी प्रक्रिया
सरकार का कहना है कि वार्डों का नए सिरे से परिसीमन एक लंबी प्रक्रिया है। इसमें शहर की सीमाओं और जनसंख्या के आधार पर वार्डों का पुनर्गठन किया जाता है। इसके साथ ही मतदाता सूचियों को भी अपडेट किया जा रहा है, ताकि चुनाव पूरी पारदर्शिता के साथ कराए जा सकें। इन्हीं कारणों से समय पर चुनाव कराना संभव नहीं हो पाया। ऐसे में शहरों की प्रशासनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रशासकों की नियुक्ति को जरूरी माना गया है। इस नई व्यवस्था का असर आम लोगों पर भी पड़ेगा। अब शहर की सफाई व्यवस्था, खराब स्ट्रीट लाइट, जलापूर्ति या अन्य समस्याओं के लिए लोगों को पार्षदों के बजाय सीधे नगर निगम के अधिकारियों से संपर्क करना होगा।
इन मामलों में पार्षद जनता और प्रशासन के बीच एक अहम कड़ी
पहले इन मामलों में पार्षद जनता और प्रशासन के बीच एक अहम कड़ी होते थे। अब शुरुआती समय में लोगों को नई व्यवस्था के साथ तालमेल बैठाने में थोड़ी परेशानी हो सकती है। राजनीतिक नजरिए से भी यह स्थिति काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। पार्षदों का कार्यकाल खत्म होने से स्थानीय राजनीति में फिलहाल ठहराव आ गया है। इसी बीच आगामी नगर निगम चुनाव को देखते हुए कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही अपनी रणनीति बनाने में जुट गई हैं। राजनीतिक दल संभावित उम्मीदवारों की तलाश और संगठन को मजबूत करने में लगे हैं।
विपक्षी दलों ने इस पूरे मामले को सरकार की विफलता बताया है। उनका आरोप है कि सरकार समय पर चुनाव कराने में नाकाम रही, जिससे स्थानीय स्तर पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया प्रभावित हुई है। हालांकि सरकार का कहना है कि सभी प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद ही चुनाव कराए जाएंगे, ताकि चुनाव पूरी तरह निष्पक्ष और पारदर्शी हों।
फिलहाल इन शहरों का प्रशासन पूरी तरह अधिकारियों के हाथ में है। यह स्थिति तब तक बनी रहेगी जब तक नए चुनाव नहीं हो जाते और जनता के चुने हुए प्रतिनिधि फिर से नगर निगमों की कमान नहीं संभाल लेते।
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