IPL में आज हैदराबाद vs राजस्थान:RR ने सभी चार मैच जीते, टेबल में टॉप पर; SRH ने 3 मुकाबले गंवाए
इंडियन प्रीमियर लीग (IPL) के 19वें सीजन के 21वें मैच में आज सनराइजर्स हैदराबाद का सामना राजस्थान रॉयल्स से होगा। मुकाबला हैदराबाद के होम ग्राउंड राजीव गांधी इंटरनेशनल स्टेडियम में शाम 7:30 बजे से खेला जाएगा। टॉस शाम 7:00 बजे होगा। हैदराबाद और राजस्थान के बीच इस सीजन यह पहला मुकाबला होगा। दोनों टीमों का इस सीजन आज 5वां मैच रहेगा। SRH सीजन में अब तक एक भी मैच नहीं हारी है। टीम 4 मैच जीतकर पॉइंट्स टेबल टॉप पर है। दूसरी ओर RR 4 में से केवल 1 मैच जीत सकी, और 3 मैच हार चुकी है। हेड टु हेड में SRH आगे हेड टु हेड में में राजस्थान आगे है। दोनों टीमों के बीच अब तक कुल 21 IPL मैच खेले गए हैं। 12 में हैदराबाद और 9 में राजस्थान को जीत मिली। हैदराबाद में दोनों टीमों के बीच कुल 6 मैच खेले गए। इसमें 5 हैदराबाद और 1 मैच राजस्थान जीती। राजस्थान को हैदराबाद के खिलाफ आखिरी जीत 2023 सीजन में मिली थी। इसके बाद चार मैच खेले गए और सभी हैदराबाद ने जीते। क्लासन ने SRH के लिए सबसे ज्यादा रन बनाए इस सीजन SRH के लिए कुछ खिलाड़ियों ने शानदार प्रदर्शन किया है। बल्लेबाजी में हेनरिक क्लासन ने 4 मैचों में 184 रन बनाए हैं, जिसमें 2 अर्धशतक शामिल हैं। क्लासन सीजन में सबसे ज्यादा रन बनाने वालों की लिस्ट में दूसरे नंबर पर हैं। वहीं गेंदबाजी में हर्ष दुबे ने 4 मैचों में 5 विकेट लिए हैं। राजस्थान के खिलाड़ियों के पास ऑरेंज-पर्पल कैप इस सीजन फिलहाल ऑरेंज और पर्पल कैप दोनों राजस्थान के खिलाड़ियों के पास है। वैभव सूर्यवंशी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 4 मैचों में 200 रन बनाए हैं। उन्होंने 2 अर्धशतक लगाए हैं और उनका स्ट्राइक रेट 266.66 का रहा है, जो टीम के लिए बड़ी ताकत साबित हुआ है। वहीं गेंदबाजी में रवि बिश्नेई ने 4 मैचों में 9 विकेट लिए हैं। पिच रिपोर्ट हैदराबाद के राजीव गांधी इंटरनेशनल स्टेडियम की पिच बैटिंग फ्रेंडली है। यहां गेंदबाजों को भी मदद मिलती है। इस मैदान पर हाई स्कोरिंग मुकाबले देखने को मिलते है। इस स्टेडियम में अभी तक 84 IPL मैच खेले गए है, जिनमे से 35 मैच पहली पारी में बल्लेबाजी करने वाली टीम ने और 48 मैच चीज करने वाली टीम ने जीते है। वेदर कंडीशन हैदराबाद में 13 अप्रैल का मौसम काफी गर्म रहेगा। मैच वाले दिन यहां का टेम्प्रेचर 40 से 26 डिग्री रहने की उम्मीद है। इस दिन बारिश की बिल्कुल भी संभावना नहीं है। दोनों टीमों की पॉसिबल प्लेइंग-12 सनराइजर्स हैदराबाद: ट्रैविस हेड, अभिषेक शर्मा, ईशान किशन (कप्तान, विकेटकीपर), हेनरिक क्लासन, सलिल अरोरा, अनिकेत वर्मा, नीतीश कुमार रेड्डी, हर्ष दुबे, शिवांग कुमार, हर्षल पटेल, जयदेव उनादकट, ईशान मलिंगा। इम्पैक्ट प्लेयर- विष्णु विनोद। राजस्थान रॉयल्स: यशस्वी जायसवाल, ध्रुव जुरेल (विकेटकीपर), रियान पराग (कप्तान), शिमरोन हेटमायर, डोनोवन फरेरा, रवींद्र जड़ेजा, जोफ्रा आर्चर, नांद्रे बर्गर, बृजेश शर्मा, संदीप शर्मा, रवि बिश्नोई। इम्पैक्ट प्लेयर: वैभव सूर्यवंशी।
अलविदा आशा भोसले, रिजेक्शन से वर्ल्ड रिकॉर्ड तक का सफर:82 साल के सिंगिंग करियर में 100+ अवॉर्ड जीते; 20 भाषाओं में 12 हजार गाने
भारतीय संगीत जगत की सबसे वर्सेटाइल और दिग्गज सिंगर आशा भोसले का 92 साल की उम्र में निधन हो गया है। उन्होंने रविवार को मुंबई के ब्रीच कैंडी हॉस्पिटल में अंतिम सांस ली। आशा जी बीते 70 सालों से अधिक समय से हिंदी सिनेमा का अभिन्न हिस्सा थीं और शनिवार रात उन्हें चेस्ट इन्फेक्शन के चलते अस्पताल में भर्ती करवाया गया था। 10 साल की उम्र में अपना पहला गाना गाने वाली आशा का सिंगिंग करियर 82 साल का रहा, जिसमें उन्होंने 12 हजार से ज्यादा गाने गाकर अपना नाम 'गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स' में दर्ज कराया। शास्त्रीय संगीत से लेकर कैबरे, पॉप, जैज और गजल तक, हर विधा में उन्होंने अपनी महारत साबित की। आशा भोसले ने 9 फिल्मफेयर जीते हैं। इनमें 7 बेस्ट फीमेल प्लेबैक सिंगर अवॉर्ड शामिल हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, आशा को 100 से ज्यादा प्रतिष्ठित अवॉर्ड्स मिले। आशा को कुल 18 बार फिल्मफेयर अवॉर्ड के लिए नॉमिनेट किया गया। आशा का आखिरी गाना 2026 में रिलीज हुआ। पहले पढ़िए आशा जी के जीवन से जुड़े कुछ अनोखे किस्से… जब शाहरुख ने उठाया आशा जी का जूठा कप साल 2023 के क्रिकेट वर्ल्ड कप फाइनल के दौरान शाहरुख, आशा भोसले के साथ बैठे थे। जब आशा जी ने चाय पी ली, तो शाहरुख ने बड़े सम्मान के साथ उनके हाथ से खाली कप लिया और खुद उठाकर दूसरी तरफ रखने चले गए। आशा जी और उनकी पोती जनाई ने उन्हें मना भी किया, लेकिन किंग खान ने अपनी सीट से उठकर यह काम किया। सोशल मीडिया पर यह वीडियो उनके निधन के बाद दोबारा वायरल हो रहा है। सोनू निगम ने धोए थे पैर सिंगर सोनू निगम ने आशा जी के निधन पर यादगार तस्वीरें साझा कीं, जिनमें वे आशा भोसले के पैर पानी से धोते हुए नजर आ रहे हैं। फोटो में तो सोनू खुशी-खुशी आशा जी के पैरों को पानी से धो रहे हैं। इसमें आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत भी बैठे नजर आते हैं। वहीं दूसरी फोटो में वो स्टेज पर आशा भोसले के पांव को छू रहे हैं। रफी साहब से लगी 500 की शर्त आशा भोसले ने एक बार बताया था कि 'आजा आजा मैं हूं प्यार तेरा' गाने को लेकर उन्होंने मोहम्मद रफी से 500-500 रुपए की शर्त लगाई थी कि दोनों में से कौन बेहतर गाएगा। यह शर्त आशा जी ने जीती थी। इसी गाने के रियाज को लेकर उन्होंने मजेदार किस्सा सुनाया था कि वे इस गाने का इतना अभ्यास कर रही थीं कि उनके ड्राइवर को लगा उन्हें सांस लेने की कोई दिक्कत हो रही है। रोते हुए रिकॉर्ड किया 'अब के बरस भेज भैया' फिल्म 'बंदिनी' का गाना 'अब के बरस भेज भैया' औरतों के दर्द को बयां करता था। आशा जी ने बताया था कि इस गाने की रिकॉर्डिंग के दौरान उन्हें अपने भाई की इतनी याद आई कि वे रो पड़ी थीं। उन्होंने रोते हुए ही इस गाने को सिर्फ एक टेक में रिकॉर्ड कर दिया था। वहीं, उनके मशहूर गाने 'दम मारो दम' को रेडियो और टीवी पर बैन कर दिया गया था, लेकिन इसी गाने के लिए उन्हें बेस्ट प्लेबैक सिंगर का अवॉर्ड मिला। लता दीदी के साथ प्रेशर और दूध-मलाई का शौक आशा जी बचपन में खेल-कूद और खाने-पीने की शौकीन थीं, खासकर दूध और मलाई उनकी कमजोरी थी। गायिकी के दौरान अपनी बड़ी बहन लता मंगेशकर के साथ उनके रिश्ते खास थे। उन्होंने बताया था कि जब वे दीदी के साथ 'मन क्यों बहका' गाना गाती थीं, तो एक-दूसरे की नजरों को देखकर लाइन उठाती थीं। उन्हें हमेशा लगता था कि दीदी के सामने उनकी गायिकी कम न पड़े। अब पढ़िए जन्म से आखिरी गाने तक की कहानी… सांगली में जन्म और गरीबी का संघर्ष 8 सितंबर 1933 को महाराष्ट्र के सांगली में जन्मीं आशा भोसले का बचपन बेहद तंगहाली में बीता। उनके पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर एक रंगमंच कलाकार और शास्त्रीय गायक थे। घर में संगीत का माहौल तो था, लेकिन आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी। गरीबी का आलम यह था कि फीस न होने के चलते उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया था। बचपन का एक भावुक किस्सा है कि बड़ी बहन लता मंगेशकर जब स्कूल जाती थीं, तो वे आशा को चोरी-छिपे अपने साथ ले जाकर क्लास में बैठा लेती थीं। मास्टरजी से छिपकर दो दिन तो पढ़ाई चली, लेकिन तीसरे दिन पकड़ी गईं। मास्टरजी ने साफ कह दिया कि एक फीस में एक ही बच्चा पढ़ सकता है और दोनों को बाहर कर दिया।उस दिन लता ने फैसला किया कि वह खुद नहीं पढ़ेंगी बल्कि छोटी बहन को पढ़ाएंगी। उन्होंने अपना नाम कटवाकर आशा का एडमिशन कराया, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। जब आशा महज 9 साल की थीं (1942), तब उनके पिता का निधन हो गया। परिवार पर अचानक आर्थिक संकट का पहाड़ टूट पड़ा। तब बड़ी बहन लता ने जिम्मेदारी संभाली और मंगेशकर परिवार पुणे से मुंबई आकर बस गया। परिवार को सहारा देने के लिए लता और आशा दोनों ने ही कम उम्र में फिल्मों में गाना और छोटी भूमिकाएं करना शुरू कर दिया। करियर की शुरुआत और 1947 में रिजेक्शन आशा ने अपने सिंगिंग करियर की शुरुआत 1943 में मराठी फिल्म 'माझा बाळ' के गाने ‘चला चला नव बाड़ा’ से की थी। इसके बाद 15 साल की उम्र में उन्हें 1948 में हिंदी फिल्म 'चुनरिया' का गाना 'सावन आया' मिला। उस दौर में नूर जहां, शमशाद बेगम और गीता दत्त जैसी बड़ी गायिकाओं का दबदबा था। आशा को केवल वही गाने मिलते थे जिन्हें बड़ी सिंगर्स या तो छोड़ देती थीं या उनकी फीस फिल्ममेकर्स नहीं दे पाते थे। इसी संघर्ष के दौरान 1947 में आशा भोसले के साथ एक ऐसी घटना घटी जिसने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। वे किशोर कुमार के साथ 'फेमस स्टूडियो' में फिल्म ‘जान पहचान' के लिए गाना रिकॉर्ड करने गई थीं। संगीतकार खेमचंद प्रकाश वहां मौजूद थे। जैसे ही आशा और किशोर दा ने माइक के सामने गाना शुरू किया, रिकॉर्डिस्ट रॉबिन चटर्जी ने म्यूजिक डायरेक्टर से बंगाली में कहा- "इन दोनों की आवाज माइक में अच्छी नहीं लग रही, इनका गला खराब है, किसी और को बुलाओ।" उन्हें अपमानित कर स्टूडियो से निकाल दिया गया। रात के 2 बज रहे थे, आशा और किशोर दा महालक्ष्मी रेलवे स्टेशन के पास बैठकर अपनी किस्मत पर रो रहे थे और चर्चा कर रहे थे कि आखिर उनसे चूक कहां हुई। लेकिन आशा ने हार नहीं मानी। उन्होंने किशोर दा को ढांढस बंधाते हुए कहा था कि उनकी आवाज को कोई नहीं रोक सकता। 16 की उम्र में भागकर शादी और घरेलू हिंसा का दर्द आशा की निजी जिंदगी भी संघर्षों से भरी रही। महज 16 साल की उम्र में उन्हें अपनी बड़ी बहन लता के सेक्रेटरी गणपत राव भोसले से प्यार हो गया, जो उम्र में उनसे 15 साल बड़े थे। परिवार के विरोध के बावजूद उन्होंने घर से भागकर शादी कर ली। इस फैसले से मंगेशकर परिवार और खासकर लता दीदी से उनके रिश्ते बिगड़ गए। ससुराल में आशा को खुशियां नहीं मिलीं। उन्हें पति और ससुराल वालों के खराब व्यवहार और घरेलू हिंसा का सामना करना पड़ा। शक और तनाव के चलते यह रिश्ता टूटने की कगार पर पहुंच गया। 1960 में, जब आशा दो बच्चों के साथ थीं और तीसरे बच्चे की मां बनने वाली थीं, गणपत राव ने उन्हें घर से निकाल दिया। मजबूरी में उन्हें अपने मायके लौटना पड़ा। इस कठिन समय में भी उन्होंने हार नहीं मानी और अपने बच्चों की परवरिश के लिए गायकी को अपना हथियार बनाया। ओपी नैयर का साथ, जब लता के साये से बाहर निकलीं आशा 1950 के दशक में संगीतकार ओपी नैयर ने आशा भोसले की आवाज की उस 'खनक' को पहचाना जिसे दुनिया खराब समझ रही थी। नैयर साहब ने ही पहली बार उनकी आवाज के 'वेस्टर्न मॉड्यूलेशन' का सही इस्तेमाल किया। 1954 में 'मंगू' से शुरू हुआ उनका सफर 1957 में फिल्म 'नया दौर' के साथ शिखर पर पहुंच गया। 'उड़े जब जब जुल्फें तुम्हारी' और 'मांग के साथ तुम्हारा' जैसे गानों ने आशा को सुपरस्टार बना दिया। नैयर साहब ने कसम खाई थी कि वे केवल आशा के साथ काम करेंगे और कभी लता मंगेशकर की ओर रुख नहीं करेंगे। उन्होंने आशा के लिए 324 गाने बनाए, जिनमें 'हावड़ा ब्रिज' का 'आइए मेहरबां' जैसा कल्ट क्लासिक शामिल है। इन्हीं गानों ने आशा को लता के साये से निकलकर अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने में मदद की। दिलचस्प बात यह है कि जब आशा कामयाब हो गईं, तो वे उसी स्टूडियो में रिकॉर्डिंग के लिए पहुंचीं जहां से उन्हें निकाला गया था। वहां रॉबिन चटर्जी भी मौजूद थे। तब किशोर कुमार ने रिकॉर्डिस्ट को टोकते हुए कहा था- "क्यों, आपने तो कहा था कि हम गा नहीं सकते। अब देख लीजिए हम कहां हैं।" आरडी बर्मन (पंचम दा) और 'क्वीन ऑफ इंडिपॉप' का दौर 1960 और 70 के दशक में आरडी बर्मन के साथ आशा भोसले की जोड़ी ने भारतीय संगीत में क्रांति ला दी। पंचम दा ने आशा की आवाज को कैबरे, जैज और रॉक संगीत के लिए तराशा। 'दम मारो दम' (हरे रामा हरे कृष्णा) और 'पिया तू अब तो आजा' (कारवां) जैसे गानों ने आशा को 'क्वीन ऑफ इंडिपॉप' की उपाधि दिलाई। प्रोफेशनल रिश्ता जल्द ही प्यार में बदल गया। पंचम दा उम्र में आशा से 6 साल छोटे थे। जब उन्होंने शादी का फैसला किया, तो आरडी बर्मन की मां सख्त खिलाफ हो गईं। उन्होंने यहां तक कह दिया कि "अगर शादी करनी है, तो मेरी लाश पर से गुजरना होगा।" पंचम दा ने इंतजार किया और 1980 में, जब उनकी मां की स्थिति बदल गई, तब दोनों ने शादी कर ली। हालांकि 1994 में पंचम दा के निधन ने आशा को फिर अकेला कर दिया। उमराव जान और क्लासिकल सिंगिंग से जीता दिल जब दुनिया को लगने लगा था कि आशा केवल चुलबुले या कैबरे गाने ही गा सकती हैं, तब 1981 में फिल्म 'उमराव जान' आई। संगीतकार खय्याम के निर्देशन में उन्होंने 'दिल चीज क्या है' और 'इन आंखों की मस्ती के' जैसी गजलें गाकर साबित कर दिया कि वे शास्त्रीय गायन में भी लता मंगेशकर के बराबर खड़ी हैं। उपलब्धियां और वर्ल्ड रिकॉर्ड्स गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड: 2011 में उन्हें दुनिया में सबसे अधिक स्टूडियो रिकॉर्डिंग (12,000+ गाने) करने वाली कलाकार के रूप में मान्यता मिली। अवॉर्ड्स: उन्होंने 9 फिल्मफेयर अवॉर्ड्स जीते (7 बेस्ट फीमेल प्लेबैक)। 1979 में उन्होंने अपना नाम नॉमिनेशन से वापस ले लिया ताकि नई सिंगर्स को मौका मिल सके। उन्हें 100 से ज्यादा प्रतिष्ठित पुरस्कार मिले। सर्वोच्च सम्मान: साल 2000 में 'दादा साहब फाल्के' और 2008 में 'पद्म विभूषण' से नवाजा गया। जुगलबंदी: उन्होंने मोहम्मद रफी के साथ करीब 900 और किशोर कुमार के साथ 600 से ज्यादा गाने गाए। सिंगिंग के साथ सफल बिजनेस आशा भोसले एक बेहतरीन कुक भी थीं। उनके हाथ के बने 'कढ़ाई गोश्त' और 'बिरयानी' के शौकीन राज कपूर और ऋषि कपूर जैसे दिग्गज थे। उन्होंने 'Asha's' नाम से रेस्तरां की एक ग्लोबल चैन शुरू की, जो दुबई, कुवैत और अबू धाबी जैसे शहरों में आज भी मशहूर है। हालांकि, उनके जीवन में दुखों का सिलसिला थमा नहीं। उनके बड़े बेटे हेमंत भोसले का 2015 में कैंसर से निधन हो गया। उनकी बेटी वर्षा भोसले ने 55 साल की उम्र में आत्महत्या कर ली थी। उनके छोटे बेटे आनंद भोसले ही उनके करियर को संभालते थे। इंटरनेशनल कोलैबोरेशन और आखिरी गाना आशा की आवाज सरहदों के पार भी गूंजी। 2006 में उन्होंने ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर ब्रेट ली के साथ 'यू आर द वन फॉर मी' गाना गाया, जो सुपरहिट रहा। उनके करियर का आखिरी गाना मार्च 2026 में ब्रिटिश वर्चुअल बैंड 'गोरिल्लाज' की एल्बम 'द माउंटेन' के लिए रिलीज हुआ। "द शैडोई लाइट" नाम के इस ट्रैक में वे हरी साड़ी पहने पोस्टर पर नजर आईं। 'गोरिल्लाज' के डेमन अलबर्न उनकी आवाज के बड़े प्रशंसक थे। 92 साल की उम्र तक उनकी आवाज में वही ताजगी और खनक बनी रही जो 1950 में थी।
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