Ranchi Student Protest News : रांची में छात्र आंदोलन का बड़ा अपडेट! आज सरकार से होगी बातचीत, मांगें नहीं मानीं तो उठाएंगे ये बड़ा कदम
रांची में JPSC और JSSC परीक्षाओं में कथित धांधली व प्रश्नपत्र लीक के खिलाफ अभ्यर्थियों का आंदोलन 16वें दिन भी जारी है। सरकार और छात्र प्रतिनिधियों के बीच आज फिर वार्ता होगी। छात्रों ने साफ कहा है कि लिखित में ठोस फैसला नहीं होने तक आंदोलन खत्म नहीं होगा और बातचीत विफल रहने पर 10 अगस्त को विधानसभा घेराव किया जाएगा।Explainer: FSSAI की सख्ती से क्यों घबरा रहीं कंपनियां? '100%' जैसे दावों पर कार्रवाई से क्या बदलेगा?
FSSAI Action: भारत में खाने-पीने की चीजों की पैकेजिंग और उन पर किए जाने वाले दावों को लेकर फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया यानी FSSAI का रुख अब पहले की तुलना में ज्यादा सख्त दिखाई दे रहा है. हाल में कई बड़ी कंपनियों के उत्पादों की पैकेजिंग पर लिखे दावों को लेकर कार्रवाई हुई है. इसका असर सिर्फ कंपनियों के कारोबार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि शेयर बाजार में भी देखने को मिला.
3 अगस्त को FSSAI ने डाबर इंडिया को ऐसे उत्पाद बेचने से रोक दिया, जिनकी पैकेजिंग पर भ्रामक "100%" जैसे दावे किए गए थे. इसके अगले दिन डाबर के शेयर करीब 4% गिर गए. यह करीब 20 हफ्तों में कंपनी के शेयर की सबसे बड़ी गिरावट थी. इसके बाद कंपनी ने दिल्ली हाई कोर्ट का रुख करते हुए FSSAI की कार्रवाई के खिलाफ जल्द सुनवाई की मांग की.
इसी तरह डियाजियो के स्वामित्व वाली यूनाइटेड स्पिरिट्स ने भी कुछ उत्पादों की बिक्री पर रोक लगाने वाले FSSAI के आदेश को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी है.
आखिर FSSAI अचानक इतना सख्त क्यों दिखाई दे रहा है? कंपनियों को किन दावों से परेशानी हो रही है और आम ग्राहकों के लिए इसका क्या मतलब है? आइए समझते हैं.
FSSAI की कार्रवाई में क्या बदला है?
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि FSSAI ने कोई नया कानून लागू नहीं किया है. असल बदलाव मौजूदा नियमों को लागू करने के तरीके में आया है. पहले भी खाद्य उत्पादों की पैकेजिंग और विज्ञापन से जुड़े नियम मौजूद थे. लेकिन अब FSSAI इन नियमों को ज्यादा सक्रियता से लागू कर रहा है.
रेगुलेटर सोशल मीडिया के जरिए भी लोगों को जागरूक कर रहा है. जुलाई में FSSAI ने अपने आधिकारिक X अकाउंट के जरिए लोगों से असुरक्षित खाद्य उत्पादों और नियमों के उल्लंघन की शिकायत करने की अपील की थी.
इसके अलावा Food Safety Connect मोबाइल ऐप के जरिए ग्राहक किसी उत्पाद की पैकेजिंग की तस्वीर अपलोड करके भ्रामक दावों की शिकायत भी कर सकते हैं. यानी अब कार्रवाई का आधार सिर्फ सरकारी निरीक्षण नहीं, बल्कि ग्राहकों की शिकायतें भी बन सकती हैं.
'100%' लिखने पर आपत्ति क्यों?
किसी उत्पाद के पैकेट पर "100%" लिखा होना ग्राहक के लिए एक मजबूत संदेश देता है. इससे ऐसा लग सकता है कि उत्पाद पूरी तरह उसी चीज से बना है जिसका दावा किया जा रहा है या उसमें किसी अन्य सामग्री की मिलावट नहीं है. समस्या तब पैदा होती है जब ऐसा दावा वैज्ञानिक या कानूनी तौर पर स्पष्ट रूप से साबित नहीं किया जा सकता.
भारत में खाद्य लेबलिंग मुख्य रूप से Food Safety and Standards Act, 2006 और उससे जुड़े नियमों के तहत नियंत्रित होती है. FSS (Advertising & Claims) Regulations, 2018 में ऐसे दावों को लेकर प्रावधान हैं जो अस्पष्ट, सत्यापित न किए जा सकने वाले या उपभोक्ता को गुमराह करने वाले हों. यही वजह है कि FSSAI अब पैकेजिंग पर लिखे शब्दों को ज्यादा बारीकी से देख रहा है.
पैकेजिंग इतनी महत्वपूर्ण क्यों हो गई है?
आज के समय में किसी खाद्य उत्पाद की पैकेजिंग सिर्फ जानकारी देने का माध्यम नहीं रह गई है. यह ग्राहकों को आकर्षित करने और उत्पाद बेचने का बड़ा जरिया बन चुकी है.
खासकर हेल्थ और फिटनेस से जुड़े उत्पादों में कंपनियां कई तरह के दावे करती हैं, जैसे—
- 100% प्राकृतिक
- नो एडेड शुगर
- हेल्दी
- हाई प्रोटीन
- क्लीन लेबल
- नेचुरल
- लो फैट
ग्राहक इन शब्दों को देखकर किसी उत्पाद को दूसरे उत्पाद की तुलना में ज्यादा स्वस्थ या बेहतर समझ सकता है. यही वजह है कि FSSAI के लिए यह सुनिश्चित करना जरूरी हो गया है कि ऐसे दावे तथ्यात्मक और प्रमाणित हों.
हेल्थ फूड का बाजार तेजी से क्यों बढ़ रहा है?
स्वास्थ्य को लेकर बढ़ती जागरूकता ने हेल्थ और फिटनेस से जुड़े खाद्य उत्पादों का बाजार तेजी से बढ़ाया है. मार्च 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर प्रोटीन बार, मखाना, हेल्दी चिप्स, नट्स और सीड्स जैसे उत्पादों की बिक्री एक साल में दोगुनी से ज्यादा होकर करीब 327.7 करोड़ रुपये पहुंच गई.
यानी ग्राहक अब सिर्फ स्वाद और कीमत नहीं देख रहा, बल्कि यह भी देख रहा है कि उत्पाद कितना हेल्दी है. इसी वजह से पैकेट पर लिखे स्वास्थ्य संबंधी दावों की व्यावसायिक कीमत भी बढ़ गई है.
ग्राहक 'हेल्दी' दावों पर कितना भरोसा करते हैं?
मार्केट रिसर्च के अनुसार, बड़ी संख्या में ग्राहक हेल्थ और क्लीन-लेबल उत्पादों के लिए ज्यादा कीमत चुकाने को तैयार हैं. एक Redseer रिपोर्ट के मुताबिक करीब दो-तिहाई मिलेनियल ग्राहक ऐसे रेडी-टू-ईट और रेडी-टू-कुक उत्पादों के लिए लगभग 15% तक ज्यादा कीमत देने को तैयार हैं, जिन्हें वे ज्यादा साफ-सुथरा या स्वास्थ्यवर्धक मानते हैं. इससे समझा जा सकता है कि पैकेजिंग पर लिखा एक छोटा-सा दावा कंपनी की बिक्री और मुनाफे पर कितना असर डाल सकता है.
कंपनियां अब क्या कर रही हैं?
FSSAI की सख्ती के बाद कंपनियों के सामने मुख्य रूप से दो रास्ते हैं—या तो अपनी पैकेजिंग और विज्ञापन में बदलाव करें या फिर रेगुलेटर की कार्रवाई को अदालत में चुनौती दें.
उदाहरण के लिए, मई में The Whole Truth ने अपने पैकेजिंग से "No Added Sugar" का दावा हटाकर उसकी जगह "Sweetened with Dates" लिखना शुरू किया. कंपनी को इस मामले में FSSAI से शो-कॉज नोटिस मिला था.
इसी तरह कुछ एनर्जी ड्रिंक कंपनियां भी अपने पैकेजिंग दावों में बदलाव कर रही हैं ताकि उन पर सीधे तौर पर स्वास्थ्य संबंधी ऐसे दावे न हों, जिन्हें रेगुलेटर भ्रामक मान सकता है.
डाबर ने भी कहा है कि उसने "100%" वाले दावे वाली पैकेजिंग और विज्ञापनों को बदलना शुरू कर दिया है. हालांकि कंपनी ने FSSAI की ताजा कार्रवाई के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट का रुख किया है.
क्या इसका असर शेयर बाजार पर भी पड़ेगा?
हां, अगर FSSAI की कार्रवाई किसी बड़े ब्रांड के महत्वपूर्ण उत्पाद से जुड़ी होती है तो इसका असर निवेशकों की धारणा पर पड़ सकता है. डाबर के मामले में कार्रवाई के अगले दिन कंपनी के शेयर करीब 4% गिर गए. इसका कारण यह चिंता हो सकती है कि पैकेजिंग बदलने, उत्पादों को वापस लेने, विज्ञापन बदलने या बिक्री प्रभावित होने से कंपनी की लागत और कारोबार पर असर पड़ सकता है. हालांकि, किसी एक दिन शेयर में गिरावट का मतलब यह नहीं है कि कंपनी के पूरे कारोबार पर लंबे समय का नकारात्मक असर तय हो गया है.
कंपनियां कोर्ट क्यों जा रही हैं?
कंपनियों के लिए पैकेजिंग बदलना आसान नहीं होता. हजारों-लाखों पैकेट पहले से बाजार में मौजूद हो सकते हैं. नया डिजाइन तैयार करने, पुराने स्टॉक को बदलने और विज्ञापन संशोधित करने में काफी खर्च हो सकता है. दूसरी तरफ कंपनियां यह भी मान सकती हैं कि उनके दावे नियमों के तहत स्वीकार्य हैं.
ऐसे में वे अदालत का दरवाजा खटखटाकर FSSAI के आदेश को चुनौती दे सकती हैं. डाबर और यूनाइटेड स्पिरिट्स के मामले में फिलहाल यही स्थिति दिखाई दे रही है.
क्या भारत के नियम दूसरे देशों से कमजोर हैं?
भारत में खाद्य सुरक्षा और लेबलिंग के लिए व्यापक कानून मौजूद हैं. लेकिन स्वास्थ्य से जुड़े संगठनों और कुछ विशेषज्ञों ने लंबे समय से नियमों के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर सवाल उठाए हैं.
यूरोपीय संघ (EU) को खाद्य सुरक्षा और उपभोक्ता जानकारी के मामले में दुनिया के कड़े नियामक क्षेत्रों में माना जाता है. वहां कीटनाशक अवशेष, खाद्य रंग और कई एडिटिव्स पर कड़े नियम लागू हैं.
वहीं लैटिन अमेरिका के कई देशों ने पैकेज के सामने चेतावनी लेबल को अनिवार्य किया है. इसमें ऐसे उत्पादों पर "High in" या "Excess" जैसी चेतावनी दी जाती है जिनमें चीनी, सोडियम, सैचुरेटेड फैट या ट्रांस फैट की मात्रा निर्धारित सीमा से अधिक होती है.
आम ग्राहक के लिए इसका क्या मतलब है?
FSSAI की सख्ती का सबसे सीधा असर ग्राहकों पर पड़ सकता है. अगर पैकेजिंग पर किए जाने वाले दावे अधिक स्पष्ट और प्रमाणित होंगे तो ग्राहक को उत्पाद खरीदते समय बेहतर जानकारी मिलेगी.
लेकिन ग्राहक को केवल पैकेट पर लिखे "100%", "हेल्दी" या "नेचुरल" जैसे शब्दों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए. Nutrition Facts, ingredients list, sugar, sodium, fat और serving size जैसी जानकारी भी देखना जरूरी है.
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आगे क्या होगा?
FSSAI की बढ़ती निगरानी से कंपनियों पर अपने दावों को ज्यादा सावधानी से इस्तेमाल करने का दबाव बढ़ सकता है. संभव है कि आने वाले समय में कंपनियां पैकेजिंग की भाषा को सरल और ज्यादा सटीक बनाएं. साथ ही, अदालतों में चल रहे मामलों से यह भी स्पष्ट होगा कि अलग-अलग दावों की कानूनी व्याख्या किस तरह की जाती है.
FSSAI की हालिया कार्रवाई को केवल कुछ कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए. इसके पीछे खाद्य उत्पादों की लेबलिंग, विज्ञापन और उपभोक्ता अधिकारों को लेकर बढ़ती सख्ती है. हेल्थ फूड का बाजार तेजी से बढ़ रहा है और ग्राहक उत्पाद के स्वास्थ्य संबंधी दावों पर भरोसा करके ज्यादा कीमत भी चुका रहे हैं. ऐसे में "100%" या "नो एडेड शुगर" जैसे दावों का सही और प्रमाणित होना बेहद जरूरी है. आने वाले समय में कंपनियों को बिक्री बढ़ाने के साथ-साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि पैकेट पर लिखा हर महत्वपूर्ण दावा नियमों और वैज्ञानिक तथ्यों के अनुरूप हो.
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