Explainer: क्यों सुलग रहा है E20 पेट्रोल का मुद्दा? जानिए इस पूरे विवाद की शुरुआत से लेकर अब तक का घटनाक्रम
E20 पेट्रोल को लेकर बीते कई दिनों से लगातार हंगामा जारी है। पहले सोशल मीडिया पर इसे लेकर कई तरह के दावे किए गए, फिर इस पर राजनीति शुरू हो गई और जैसे-जैसे सियासत बढ़ी, सरकार की ओर से भी सफाई सामने आई। सरकार के स्पष्टीकरण के बाद भी यह विवाद थमता नजर नहीं आ रहा है।
स्थिति यह है कि कोई प्रधानमंत्री को पीड़ितों की चिट्ठी देने की कोशिश कर रहा है तो कोई सड़क परिवहन मंत्री के घर तक मार्च कर रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर ई20 को लेकर विवाद कब शुरू हुआ, इसमें अब तक क्या-क्या हो चुका है, विपक्ष के दावे क्या हैं और सरकार का इस पर क्या कहना है?
ताजा घटनाक्रम: आम आदमी पार्टी और युवा कांग्रेस का विरोध प्रदर्शन
आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने मंगलवार को प्रधानमंत्री आवास तक मार्च निकालने का ऐलान किया था। उनकी पार्टी ने दावा किया कि उसने देश भर से 2.33 लाख लोगों के हस्ताक्षर जुटाए हैं और प्रधानमंत्री को याचिका सौंपना चाहती है। दोपहर 12 बजे केजरीवाल करीब 100 लोगों के साथ पार्टी मुख्यालय से निकले, लेकिन दिल्ली पुलिस ने मार्च की अनुमति नहीं दी। फिरोजशाह रोड पर बैरिकेड लगाकर जुलूस रोक दिया गया, जिसके बाद आप नेताओं और कार्यकर्ताओं ने वहीं धरना शुरू कर दिया।
करीब सवा घंटे तक चले इस विरोध प्रदर्शन के बाद पुलिस ने आश्वासन दिया कि शिकायतें प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुंचा दी जाएंगी, जिसके बाद धरना समाप्त हुआ। हालांकि केजरीवाल ने स्पष्ट किया कि E20 के खिलाफ उनका आंदोलन जारी रहेगा। इससे एक दिन पहले नागपुर में युवा कांग्रेस ने केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी के आवास तक मार्च निकालने की कोशिश की। पुलिस ने रास्ते में बैरिकेड लगाकर प्रदर्शनकारियों को रोक दिया और कई कार्यकर्ताओं को हिरासत में ले लिया।
आखिर E20 पेट्रोल क्या है और इसके उद्देश्य क्या हैं?
E20 ऐसा ईंधन है जिसमें 20 प्रतिशत एथेनॉल और 80 प्रतिशत पेट्रोल होता है। एथेनॉल एक प्रकार का जैव ईंधन है, जिसे मुख्य रूप से गन्ने, मक्का और अन्य कृषि उत्पादों से बनाया जाता है। सरकार ने इसे तीन बड़े उद्देश्यों के साथ बढ़ावा दिया है जिसमें कच्चे तेल के आयात पर भारत की निर्भरता कम करना, प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन घटाना, तथा किसानों और बायोफ्यूल उद्योग की आय बढ़ाना शामिल है।
विपक्ष की आपत्ति क्या है?
आम आदमी पार्टी का कहना है कि सरकार लोगों पर एक ही प्रकार का ईंधन थोप रही है। पार्टी की मुख्य मांगें हैं कि लोगों को E20 के साथ सामान्य पेट्रोल और ई10 का भी विकल्प मिले, पेट्रोल की कीमत घटाकर 82 रुपये प्रति लीटर की जाए, और सरकार E20 नीति की समीक्षा करे। वहीं कांग्रेस पार्टी का कहना है कि सरकार वैज्ञानिक परीक्षणों का हवाला दे रही है, लेकिन देश भर के वाहन मालिक और मैकेनिक लगातार शिकायतें कर रहे हैं। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि लोगों को कम माइलेज, इंजन खराब होने, पुराने वाहनों में ईंधन इनजेक्टर जाम होने, फ़्यूल पाइप खराब होने और रबर पार्ट्स में दरार जैसी समस्याएं आ रही हैं, और पार्टी ने सरकार से इन शिकायतों का जवाब मांगा है।
इसके अलावा शिवसेना-मनसे के नेता उद्धव ठाकरे ने मुंबई में आयोजित एक रैली को संबोधित करते हुए युवाओं से अपील की कि वे विरोध की इस चिंगारी को जिंदा रखें।
सोशल मीडिया पर E20 जनता पार्टी (EJP) का अभियान
E20 विवाद अब केवल राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं रह गया है। सोशल मीडिया पर E20 जनता पार्टी (EJP) नाम से एक डिजिटल अभियान भी शुरू हुआ है। इसके तहत यह मांग की जा रही है कि लोगों को E20 के साथ 100 प्रतिशत शुद्ध पेट्रोल खरीदने का विकल्प मिले। इसमें एथेनॉल नीति खत्म करने की मांग नहीं की जा रही है, बल्कि विकल्प देने की मांग रखी गई है और पुराने वाहनों की सुरक्षा सुनिश्चित करने पर जोर दिया जा रहा है। यह अभियान बहुत कम समय में सोशल मीडिया पर लाखों लोगों तक पहुंच चुका है।
सरकार का पक्ष और आंकड़े क्या कहते हैं?
केंद्र सरकार लगातार कह रही है कि E20 भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है। सरकार का दावा है कि अगर पेट्रोल में एथेनॉल नहीं मिलाया जाता तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने के दौरान दिल्ली में पेट्रोल लगभग 125 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच सकता था। लेकिन चूंकि पेट्रोल का 20 प्रतिशत हिस्सा घरेलू एथेनॉल था, जिसकी कीमत पहले से तय थी, इसलिए वैश्विक महंगाई का पूरा असर उपभोक्ताओं पर नहीं पड़ा और उस समय दिल्ली में पेट्रोल 94.77 रुपये प्रति लीटर रहा।
सरकार के अनुसार इसके जरिए 1.97 लाख करोड़ रुपये से अधिक की विदेशी मुद्रा बची है। इसके अलावा 316 लाख मैट्रिक टन से ज्यादा कच्चे तेल के आयात की जरूरत कम हुई है और 950 लाख मैट्रिक टन से अधिक कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन कम हुआ है, जबकि किसानों और डिस्टिलरी उद्योग को 1.66 लाख करोड़ रुपये का लाभ हुआ है।
नितिन गडकरी के बयान विवाद की वजह क्यों बने?
E20 विवाद में सबसे ज्यादा चर्चा केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी के अलग-अलग समय पर दिए गए बयानों की हुई है। अपने पहले बयान में उन्होंने कहा था कि अगर E20 से एक भी गाड़ी खराब हुई है तो उसका नाम बताइए और वाहन निर्माता कंपनियों के विशेषज्ञों ने E20 को सुरक्षित बताया है। बाद में बॉम्बे हाईकोर्ट में अपनी याचिका में गडकरी ने स्पष्ट किया कि E20 फ़्यूल पॉलिसी को तैयार करने और लागू करने की पूरी जिम्मेदारी पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय (MoPNG) की है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय का इस नीति के निर्माण, संचालन, वित्तीय प्रबंधन या नियमन से कोई संबंध नहीं है क्योंकि वे कभी पेट्रोलियम मंत्रालय के प्रभारी नहीं रहे, इसलिए E20 कार्यक्रम के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है। हालांकि यह कानूनी रूप से सही था, लेकिन लोगों ने सवाल उठाया क्योंकि E20 के प्रचार में वे सबसे आगे रहे थे।
गडकरी ने कोर्ट का दरवाजा क्यों खटखटाया?
केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख करते हुए आरोप लगाया है कि सोशल मीडिया पर उनके और उनके परिवार को लेकर फर्जी व मानहानिकारक पोस्ट व डीपफेक सामग्री प्रसारित की जा रही है। इन पोस्टों में यह दावा किया गया कि उन्हें ई20 इथेनॉल कार्यक्रम से निजी आर्थिक लाभ हो रहा है। गडकरी ने इन आरोपों को पूरी तरह झूठा और उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाला बताया।
उन्होंने मेटा, अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और अज्ञात व्यक्तियों या संस्थाओं के खिलाफ दीवानी मानहानि का मुकदमा दायर करने की अनुमति मांगी, जिसे बॉम्बे हाईकोर्ट ने स्वीकार करते हुए मुकदमा दायर करने की इजाजत दे दी।
क्या सचमुच पुराने वाहनों को नुकसान हो सकता है और माइलेज का सच क्या है?
सरकार और विशेषज्ञों का कहना है कि हर वाहन में समस्या नहीं आएगी, लेकिन पुराने वाहनों में लगे कुछ रबर और प्लास्टिक के हिस्से लंबे समय तक हाई इथेनॉल वाले ईंधन के साथ पूरी तरह अनुकूल नहीं होते हैं। इसी वजह से इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ISMA) पुराने वाहनों की सुरक्षा को लेकर चिंता जता चुका है।
जहां तक माइलेज की बात है, सरकार ने पहली बार संसद में स्वीकार किया कि E20 इस्तेमाल करने पर कुछ वाहनों में 2 से 6 प्रतिशत तक माइलेज कम हो सकता है। इसका कारण यह है कि एथेनॉल की ऊर्जा क्षमता सामान्य पेट्रोल से कम होती है, इसलिए समान मात्रा का ईंधन जलाने पर वाहन थोड़ी कम दूरी तय कर सकता है, हालांकि यह असर हर वाहन में समान नहीं होगा।
सरकार अब क्या कर रही है?
E20 को लेकर सोशल मीडिया पर फैल रही कथित भ्रमित जानकारियों के बीच नागपुर साइबर पुलिस ने कड़ी कार्रवाई की है। नागपुर पुलिस ने कई सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और कंटेंट क्रिएटर्स के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है क्योंकि उन पर E20 को लेकर गलत जानकारी फैलाकर लोगों को गुमराह करने का आरोप है।
Article 370 Removed: अनुच्छेद 370 हटने के 7 साल पूरे, जम्मू-कश्मीर में क्या बदला? जानिए घाटी के हालात और बड़े बदलाव
5 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 और 35A को निष्प्रभावी कर जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त कर दिया था। सात साल बाद घाटी की सुरक्षा, विकास, कानून, आतंकवाद, निवेश और पाकिस्तान के साथ हालात में क्या बदलाव आए? पढ़िए पूरा विश्लेषण।
संसद में हंगामे और लंबी चर्चा के बाद इस पर मुहर लगी और तब से लेकर आज तक जम्मू-कश्मीर एक केंद्र शासित प्रदेश के रूप में अस्तित्व में है। आज इस फैसले के सात साल पूरे होने पर यह चर्चा लाजिमी है कि आखिर इन वर्षों में घाटी की तस्वीर कितनी बदली है और पाकिस्तान के दुष्प्रचार का भारत ने किस तरह जवाब दिया है।
जम्मू-कश्मीर का इतिहास: विलय से लेकर अनुच्छेद 370 तक का सफर
तीन तलाक की तरह ही अनुच्छेद 370 का मसला भी भारत की आजादी के साथ ही शुरू हुआ था। वर्ष 1948 में जम्मू-कश्मीर के राजा हरि सिंह ने भारत में विलय से पहले कुछ विशेषाधिकारों की शर्त रखी थी। जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा होने के बाद भी अलग ही रहा और राज्य का अपना अलग संविधान बना, जहाँ भारत के चुनिंदा कानून ही लागू होते थे। इतिहासकार प्रो. संध्या के अनुसार, मार्च 1948 में महाराजा ने शेख अब्दुल्ला के साथ प्रधानमंत्री के रूप में राज्य में एक अंतरिम सरकार नियुक्त की थी।
जुलाई 1949 में शेख अब्दुल्ला और तीन अन्य सहयोगी भारतीय संविधान सभा में शामिल हुए और जम्मू-कश्मीर की विशेष स्थिति पर बातचीत की, जिससे अनुच्छेद-370 को अपनाया गया। अंततः 2019 में चुनाव जीतने के बाद मोदी सरकार ने 5 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 को पूरी तरह खत्म कर दिया।
अनुच्छेद 370 क्या था और इसके प्रमुख प्रावधान क्या थे?
अनुच्छेद 370 में यह प्रावधान किया गया था कि रक्षा, विदेश, वित्त और संचार मामलों को छोड़कर भारतीय संसद को राज्य में किसी कानून को लागू करने के लिए जम्मू-कश्मीर सरकार की मंजूरी की आवश्यकता होगी। इसके चलते जम्मू और कश्मीर के निवासियों की नागरिकता, संपत्ति के स्वामित्व और मौलिक अधिकारों का कानून शेष भारत में रहने वाले नागरिकों से अलग था। अनुच्छेद-370 के तहत अन्य राज्यों के नागरिक जम्मू-कश्मीर में संपत्ति नहीं खरीद सकते थे और केंद्र के पास राज्य में वित्तीय आपातकाल घोषित करने की शक्ति भी नहीं थी।
इसके अलावा, अनुच्छेद-370 (1) (सी) में उल्लेख किया गया था कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 1 अनुच्छेद-370 के माध्यम से कश्मीर पर लागू होता है। जम्मू-कश्मीर का संविधान 17 नवंबर 1956 को अपनाया गया था और 26 जनवरी 1957 को लागू हुआ था, जिसे 5 अगस्त 2019 को राष्ट्रपति के आदेश (सीओ 272) द्वारा निष्प्रभावी बना दिया गया।
आर्टिकल 35A क्या था और इसे लेकर विवाद क्यों हुआ?
जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 के अलावा संविधान का आर्टिकल-35ए भी लागू था, जो भारत सरकार की ही देन था। यह आर्टिकल-35ए जम्मू-कश्मीर की विधानसभा को कुछ विशेष शक्तियां प्रदान करता था। कश्मीर के भारत में विलय के बाद शेख अब्दुल्ला को वहाँ का अंतरिम प्रधानमंत्री बनाया गया था। वर्ष 1952 में अब्दुल्ला और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बीच दिल्ली में एक समझौता हुआ था, जिसके बाद तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने अनुच्छेद-370(1)(डी) के तहत 14 मई, 1954 को एक आदेश पारित कर अनुच्छेद-35ए को लागू किया था।
इसके तहत जम्मू-कश्मीर के लोगों को भूमि, कारोबार और रोजगार संरक्षण के विशेषाधिकार दिए गए, जिससे दूसरे राज्यों के लोगों के लिए संपत्ति और रोजगार के अधिकार समाप्त हो गए थे। इसे संसदीय प्रणाली के तहत संविधान संशोधन के बिना लागू किए जाने के कारण इसकी संवैधानिकता हमेशा विवादित रही।
अनुच्छेद 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर में क्या-क्या बदला?
अब जम्मू-कश्मीर में भी देश के सभी केंद्रीय कानून लागू होते हैं, और मनरेगा तथा शिक्षा के अधिकार जैसे कानून भी प्रभावी कर दिए गए हैं। हालांकि, शुरुआती दौर में इसके कुछ विरोध भी देखने को मिले, राजनीतिक पार्टियों ने इसका बहिष्कार किया और सुरक्षा कारणों से लंबे समय तक इंटरनेट भी बैन रखा गया। इन बदलावों के बाद जमीन पर जो बड़े सकारात्मक परिवर्तन आए हैं, वे निम्नलिखित हैं:
- पूरे जम्मू-कश्मीर में तिरंगा और राष्ट्रीय कार्यक्रमों का विस्तार: सबसे बड़ा बदलाव यह आया कि अब कश्मीर में जगह-जगह तिरंगा फहराया जा रहा है। सरकारी भवनों से लेकर सहरद तक लहराता तिरंगा पाकिस्तान समेत दुनिया को संदेश दे रहा है, और अब राष्ट्रीय पर्व पर गाँवों में भी तिरंगा फहरने के साथ राष्ट्रगान गाया जाने लगा है, जबकि पहले लोग यहाँ तिरंगा उठाने से भी घबराते थे।
- अलगाववाद और पाकिस्तान समर्थक गतिविधियों पर कार्रवाई: 5 अगस्त 2019 के बाद हुरियत की ओर से कश्मीर के किसी कोने से पाकिस्तान परस्ती की आवाज नहीं उठी। हवा के बदले रुख को भांपकर अलगाववादी खेमे सैयद अली शाह गिलानी और मीरवाइज उमर फारूक की ओर से भी बंद का आह्वान नहीं किया गया। आम कश्मीरियों ने अलगाववादियों के बंद के पोस्टरों को कोई तवज्जो नहीं दी और अब युवाओं का पूरा ध्यान सिर्फ अपने करियर पर है।
पाकिस्तान समर्थकों पर कड़ा शिकंजा, आतंकवाद का सफाया और ऑपरेशन सिंदूर
बदलावों के बीच सरकार ने पाकिस्तान परस्त लोगों पर जबरदस्त शिकंजा कसा। आतंकवादियों से साठगांठ और पाकिस्तान के इशारे पर काम करने वाले सरकारी कर्मचारियों को बर्खास्त करना शुरू किया गया। इसी कड़ी में हिजबुल मुजाहिदीन सरगना सैयद सलाहुद्दीन के दो बेटों की सरकारी सेवा समाप्त कर दी गई और हिजबुल आतंकी के साथ गिरफ्तार डीएसपी दविंदर सिंह को भी बर्खास्त कर दिया गया।
- आतंकवाद के खिलाफ सुरक्षा बलों का अभियान: अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद से घाटी में आतंकवादियों की कमर टूट चुकी है। पिछले दो वर्षों में घाटी में 130 टॉप कमांडरों समेत 459 आतंकवादियों को मार गिराने में सुरक्षाबलों को सफलता मिली है। सुरक्षाबलों की सख्ती से 149 आतंकियों ने या तो सरेंडर किया है या वे जिंदा पकड़े गए हैं।
- ऑपरेशन सिंदूर और पाकिस्तान पर भारत की रणनीति: दहशतगर्दों के खिलाफ सबसे ठोस और हालिया सैन्य कार्रवाई 'ऑपरेशन सिंदूर' है, जिसके बाद भारतीय सेना ने मई 2025 में पाकिस्तान के भीतर बने आतंक के अड्डों को नेस्तनाबूद कर दिया।
- केंद्रीय कानून, विकास और निवेश का असर: अनुच्छेद-370 हटने के बाद पाकिस्तान इतना बौखलाया कि सरहद पर हर रोज सीजफायर तोड़ने लगा। जहाँ 2018 में पाकिस्तान ने सीमा पर 1800 बार गोलीबारी की थी, वहीं अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 हटने के बाद 2019 में ही सरहद पर 3200 बार गोलाबारी की गई (अगस्त से 31 दिसंबर 2019 के बीच ही 1400 बार उल्लंघन हुआ), और अगले साल 2020 में 5100 बार गोलाबारी कर सारी हदें पार कर दी गईं। इसके बावजूद भारत की मजबूत रणनीति के आगे पाकिस्तान की हर चाल नाकाम साबित हुई है।
FAQ: अनुच्छेद 370 हटने के 7 साल
Q1. अनुच्छेद 370 क्या था?
उत्तर: अनुच्छेद 370 भारतीय संविधान का एक विशेष प्रावधान था, जो जम्मू-कश्मीर को अलग संविधान, अलग झंडे और कुछ मामलों में विशेष अधिकार प्रदान करता था। रक्षा, विदेश, वित्त और संचार को छोड़कर कई विषयों पर केंद्र सरकार के कानून लागू करने के लिए राज्य सरकार की सहमति आवश्यक होती थी।
Q2. अनुच्छेद 370 कब हटाया गया था?
उत्तर: केंद्र सरकार ने 5 अगस्त 2019 को राष्ट्रपति के आदेश और संसद की मंजूरी के बाद अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधानों को निष्प्रभावी कर दिया। इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त कर दिया गया।
Q3. आर्टिकल 35A क्या था?
उत्तर: आर्टिकल 35A जम्मू-कश्मीर विधानसभा को 'स्थायी निवासियों' की परिभाषा तय करने और उन्हें भूमि, सरकारी नौकरी तथा अन्य विशेष अधिकार देने की शक्ति देता था। यह प्रावधान भी 5 अगस्त 2019 के फैसले के साथ समाप्त हो गया।
Q4. अनुच्छेद 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर में क्या बदलाव हुए?
उत्तर: अनुच्छेद 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर में सभी केंद्रीय कानून लागू हुए, केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा मिला, सुरक्षा व्यवस्था में बदलाव हुए, विकास परियोजनाओं और निवेश पर जोर दिया गया तथा आतंकवाद और अलगाववाद के खिलाफ कार्रवाई तेज हुई।
Q5. क्या अब दूसरे राज्यों के लोग जम्मू-कश्मीर में संपत्ति खरीद सकते हैं?
उत्तर: अनुच्छेद 370 और 35A हटने के बाद संपत्ति से जुड़े नियमों में बदलाव हुए हैं। हालांकि, भूमि खरीद और उपयोग को लेकर केंद्र शासित प्रदेश के लागू कानूनों और स्थानीय नियमों का पालन करना आवश्यक है।
Q6. क्या जम्मू-कश्मीर का अलग संविधान अब भी लागू है?
उत्तर: नहीं। जम्मू-कश्मीर का अलग संविधान 5 अगस्त 2019 के बाद प्रभावहीन हो गया। अब भारतीय संविधान पूरी तरह लागू है।
Q7. क्या अनुच्छेद 370 हटाने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने सही माना था?
उत्तर: हां। दिसंबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने केंद्र सरकार के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि अनुच्छेद 370 एक अस्थायी प्रावधान था और उसे निष्प्रभावी करने का निर्णय संवैधानिक रूप से वैध है।
Q8. अनुच्छेद 370 हटाने का सरकार का उद्देश्य क्या था?
उत्तर: केंद्र सरकार के अनुसार, इस फैसले का उद्देश्य जम्मू-कश्मीर को देश के अन्य राज्यों के समान संवैधानिक व्यवस्था में लाना, विकास को गति देना, निवेश बढ़ाना, सुशासन को मजबूत करना और आतंकवाद व अलगाववाद पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करना था।
होम
जॉब
पॉलिटिक्स
बिजनेस
ऑटोमोबाइल
गैजेट
लाइफस्टाइल
फोटो गैलरी
Others 
Haribhoomi











