सावन के महीने में चारों ओर हरियाली ही हरियाली देखने को मिलती है। इस दौरान पेड़ों पर नए पत्ते आ जाते हैं, मौसम सुहावना हो जाता है। वहीं घर से लेकर मंदिरों तक में शिवभक्ति का माहौल होता है। वहीं सावन के महीने में एक चीज और भी खास होती है, वह है झूला। आपने देखा होगा कि अक्सर सावन के महीने में लोग अपने घरों में झूला डालते हैं।
वहीं लड़कियां और महिलाएं सज-धजकर झूला झूलती हैं और सावन के गीत गाती हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर सावन में झूला की परंपरा कैसे शुरू हुई।
सावन और झूले का कनेक्शन
सावन के महीने को खुशियों, हरियाली और उत्सव का महीना माना जाता है। सावन का मौसम ठंडा और सुहावना भी होता है। इसलिए पुराने समय से लोग इस महीने पेड़ों पर झूले डालकर दोस्तों और परिवार के साथ झूला झूलते हैं और समय बिताते हैं। खासकर महिलाएं और लड़कियां इस महीने झूला झूलते हुए लोकगीत गाती हैं। धीरे-धीरे यह परंपरा सावन के खास रीति-रिवाजों में शामिल हो गई।
मां पार्वती से जुड़ी है झूले की परंपरा
धार्मिक मान्यता है कि भगवान शंकर ने सावन के महीने में मां पार्वती के लिए झूला लगाया था। महादेव ने प्रेम से मां पार्वती को झूला झुलाया था। इस कारण से झूला पति-पत्नी के बीच सम्मान, प्यार और अच्छे रिश्ते का भी प्रतीक माना जाता है। माना जाता है कि जो भी दंपत्ति सावन में साथ झूला झूलते हैं। उनके रिश्ते में हमेशा अपनापन और प्रेम बना रहता है।
सावन में मायके आई थीं मां पार्वती
इसके अलावा एक और कहावत सुनने को मिलती है कि सावन में मां पार्वती अपने मायके आई थीं। वहां पर मां पार्वती की सखियों ने झूला लगाया और उनको झूला झुलाया। इस दौरान सखियों ने लोक गीत गाए और खुशियां मनाईं। तभी से यह परंपरा चली आ रही है।
कृष्ण और राधा से भी जुड़ी है मान्यता
भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी से भी सावन में झूला झूलने की परंपरा का संबंध जोड़ा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि सावन के मौसम में भगवान श्रीकृष्ण ने राधा रानी को झूला झुलाया था। फिर कई जगहों पर मंदिरों में राधा-कृष्ण के लिए सुंदर झूले सजाए जाते हैं। सावन के महीने में कई मंदिरों में झूलन उत्सव भी पड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।
मंदिरों में सजाए जाते हैं झूले
बता दें कि सावन में कई मंदिरों में देवी-देवताओं और भगवान के लिए भी झूले सजाए जाते हैं। इन झूलों को फूलों और रंग-बिरंगी झालरों से इन झूलों को सुंदर बनाया जाता है। यह परंपरा कई राज्यों यह आज भी पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता है।
सावन में झूला झूलने का महत्व
धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक सावन में झूला झूलना बेहद शुभ माना जाता है। माना जाता है कि इससे परिवार में प्यार और एकता बनी रहती है। पति-पत्नी के रिश्ते में मधुरता आती है और मां पार्वती का आशीर्वाद भी मिलता है। वहीं झूला झूलने से आपका मन भी प्रसन्न रहता है। सावन के सुंदर मौसम का आनंद लेने का मौका भी मिलता है।
सावन में कैसे डालें झूला
झूला डालने के लिए मजबूत पेड़ की डाल, छत का हुक या लोहे की ग्रिल चुनें।
नायलॉन, जूट या सूती की मोटी रस्सी लें।
झूले पर बैठने के लिए मजबूत लकड़ी की बोर्ड लें।
बोर्ड के दोनों तरफ रस्सी बांधने के लिए दो-दो छेद बनाएं।
तख्ते और हुक पर सेफ्टी नॉट लगाएं।
इसको आम के पत्तों, गेंदे के फूलों या सुंदर कपड़ों से झूले को सजाएं।
झूले पर बैठने से पहले थोड़ा वेट डालकर इसकी मजबूती को जरूर चेक कर लें।
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श्रावण मास भगवान शिव को अति प्रिय है। इस दौरान पड़ने वाला हर सोमवार का अपना एक खास महत्व है। सावन के महीने में साधक भगवान भोलेनाथ की भक्ति में डूब जाते हैं, सच्चे मन से व्रत रखते है और पूजा अर्चना करते हैं। कई भक्तजन सावन के महीने से 16 सोमवार व्रत की शुरुआत करते हैं। वैसे हर महीने की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत रखा जाता है, जो कि यह व्रत भगवान शिव को समर्पित है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, प्रदोष काल के शिव-पूजन के लिए श्रेष्ठ समय माना गया है।
हालांकि, कई बार पंचांग में ऐसा दुलर्भ संयोग बन ही जाता है जब सावन का सोमवार और प्रदोष व्रत दोनों एक ही दिन पड़ जाए। ऐसे में साधक भी दुविधा में चले जाते हैं कि पूजा कैसे करे? क्योंकि दोनों व्रतों की अपनी अलग मुख्यता है और भगवान का अभिषेक किस समय करना सही होता है, आइए आपको बताते हैं।
धार्मिक शास्त्र क्या कहते हैं?
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, जब सावन सोमवार और प्रदोष व्रत की तिथि एक साथ पड़ जाए,तो भगवान शिव और माता पार्वती की असीम कृपा का महा-संयोग मानना चाहिए। इस दिन की गई श्रद्धापूर्ण पूजा से जीवन में सुख-शांति आती है। इसलिए आपको दोनों व्रत अलग-अलग रखने की कोई जरुरत नहीं है। आप एक ही दिन में दोनों व्रत के नियमों का पालन कर सकते हैं।
जाने सही पूजा-विधि
इस खास संयोग के दौरान आप सुबह और शाम को पूजा कर सकती हैं-
सुबह की पूजा (सोमवार व्रत के लिए)
सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनें। भगवान शिव का स्मरण करते हुए दोनों व्रत का एक साथ संकल्प लें। इसके बाद शिवलिंग का जल या पंचामृत से अभिषेक करें। 'ॐ नमः शिवाय'का जप करते हुए बेलपत्र अर्पित करें और सोमवार व्रत की कथा जरुर पढ़ें।
शाम की पूजा (प्रदोष व्रत के लिए)
वैसे प्रदोष व्रत की असली महत्व संध्या काल यानी 'प्रदोष काल' में होती है। यह समय सूर्यास्त से लेकर करीब 2 घंटे बाद तक रहता है। शाम के समय एक बार फिर स्नान करने करें या हाथ-मुंह धोकर स्वच्छ हो जाएं। इसके बाद शिवलिंग पर दूध, बेलपत्र, धतूरा, चंदन और अक्षत अर्पित करें। इसके बाद प्रदोष व्रत की कथा सुनें, दीपदान करें और आखिर में भगवान शिव की आरती करें। वहीं व्रत का पारण (खोलना) आप अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार शाम की पूजा या फिर अगले दिन सुबह कर सकते हैं।
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