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शांति की पहल के नाम पर खड़ा किया भ्रम का तूफान, पढ़िये शहबाज शरीफ और असीम मुनीर की हास्यास्पद दास्तान

ईरान अमेरिका संघर्षविराम पर पाकिस्तान का कूटनीतिक खेल अब उसके गले की फांस बन चुका है। जिस समझौते को शांति की दिशा में एक बड़ा कदम बताया जा रहा था, वह चौबीस घंटे के भीतर ही भ्रम, विरोधाभास और अविश्वास का प्रतीक बन गया। और इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में है पाकिस्तान, जिसने अपनी भूमिका को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने की कोशिश में न केवल खुद को हास्यास्पद स्थिति में ला खड़ा किया, बल्कि पूरे क्षेत्र को नई अनिश्चितता में धकेल दिया।

संघर्षविराम की घोषणा के तुरंत बाद ही यह साफ हो गया कि अमेरिका और ईरान के बीच जो सहमति बनी, उसकी व्याख्या दोनों पक्ष अलग अलग तरीके से कर रहे हैं। अमेरिका साफ कह रहा है कि यह समझौता केवल ईरान तक सीमित है, जबकि पाकिस्तान ने इसे लेबनान समेत पूरे क्षेत्र में लागू होने वाला व्यापक संघर्षविराम बता दिया। यही वह बिंदु है जहां से पूरे विवाद की शुरुआत होती है।

इसे भी पढ़ें: कूटनीतिक ब्लंडर हो गया, Pakistan ने करा दिया कांड? Shehbaz Sharif की 'गलती' से लेबनान में बरपा इज़रायली कहर?

अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने दो टूक शब्दों में कह दिया कि लेबनान इस समझौते का हिस्सा था ही नहीं। उनका कहना है कि ईरान ने गलतफहमी पाल ली है, जबकि अमेरिका ने कभी ऐसा वादा किया ही नहीं। उन्होंने ईरान के प्रस्तावों को लगभग मजाक करार देते हुए उन्हें गंभीरता से लेने से इंकार कर दिया। यह बयान इस बात का स्पष्ट संकेत है कि वाशिंगटन और तेहरान के बीच बातचीत की वास्तविकता और सार्वजनिक दावों में जमीन आसमान का अंतर है।

लेकिन असली कूटनीतिक विस्फोट तब हुआ जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सार्वजनिक रूप से यह घोषणा कर दी कि संघर्षविराम हर जगह लागू होगा, जिसमें लेबनान भी शामिल है। यह बयान सीधे तौर पर अमेरिका के रुख के खिलाफ था। सवाल उठता है कि क्या पाकिस्तान को अलग मसौदा मिला था या फिर उसने खुद ही कहानी गढ़ ली?

स्थिति और भी गंभीर तब हो गई जब खुलासा हुआ कि शहबाज शरीफ का सोशल मीडिया पोस्ट व्हाइट हाउस की मंजूरी से जारी हुआ था। यानी जिस बयान को पाकिस्तान अपनी पहल के रूप में पेश कर रहा था, वह दरअसल अमेरिका के इशारे पर तैयार किया गया था। इससे पाकिस्तान की तथाकथित स्वतंत्र कूटनीतिक भूमिका की पोल खुल गई।

असलियत यह है कि पाकिस्तान इस पूरे घटनाक्रम में एक स्वतंत्र मध्यस्थ नहीं बल्कि अमेरिका का संदेशवाहक बनकर उभरा है। रिपोर्टों के अनुसार वाशिंगटन ने ही इस्लामाबाद पर दबाव डालकर ईरान तक प्रस्ताव पहुंचाने का काम कराया। इसका मकसद साफ था कि एक मुस्लिम बहुल देश के जरिए संदेश भेजकर ईरान को समझौते के लिए राजी किया जाए।

इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान की हड़बड़ी और जल्दबाजी भी साफ दिखाई देती है। शहबाज शरीफ ने अपने संदेश में दो हफ्ते के संघर्षविराम की अपील करते हुए होर्मुज जलडमरूमध्य खोलने की बात कही, लेकिन इसी संदेश में वह बुनियादी स्पष्टता ही गायब थी कि आखिर समझौता किन शर्तों पर हुआ है?

उधर, ईरान की प्रतिक्रिया ने इस भ्रम को और गहरा कर दिया। तेहरान ने साफ संकेत दिया कि वह संघर्षविराम को व्यापक दायरे में देख रहा है और लेबनान में हिजबुल्लाह पर हमले जारी रहने पर समझौता टूट सकता है। ईरानी संसद की सुरक्षा समिति के प्रमुख ने खुले तौर पर धमकी भरे लहजे में कहा कि यदि शर्तों का पालन नहीं हुआ तो जवाब दिया जाएगा।

इसी बीच, इजराइल द्वारा लेबनान में हमले जारी रखने से स्थिति और विस्फोटक हो गई। यह घटनाक्रम इस बात का प्रमाण है कि जमीनी स्तर पर संघर्षविराम का कोई स्पष्ट असर नहीं दिख रहा। यानी कागज पर बना समझौता जमीन पर लागू ही नहीं हो पा रहा।

वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस पूरे मामले को और उलझा दिया है। उन्होंने अपना अलग तथाकथित वास्तविक समझौता पेश करते हुए साफ कर दिया कि अमेरिका केवल उन्हीं शर्तों को मानेगा जो वह तय करेगा। उन्होंने कहा कि समझौते का मूल केवल दो बातों पर आधारित है कि परमाणु हथियार नहीं बनाया जायेगा और होर्मुज जलडमरूमध्य खुला रहेगा। हम आपको यह भी बता दें कि ट्रंप के बयानों में भी लगातार बदलाव देखने को मिल रहा है। एक तरफ वह बातचीत की बात करते हैं, दूसरी तरफ धमकी देते हैं कि अगर समझौता नहीं हुआ तो पहले से भी ज्यादा भीषण कार्रवाई होगी। इस दोहरे रुख ने पूरी स्थिति को और अधिक अस्थिर बना दिया है।

साथ ही इस पूरे प्रकरण ने एक और गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या वास्तव में कोई एक साझा समझौता है भी या नहीं? अलग अलग मसौदे, अलग अलग दावे और अलग अलग व्याख्याएं इस बात की ओर इशारा करती हैं कि शायद दोनों पक्ष अलग अलग शर्तों पर बातचीत कर रहे हैं।

वहीं पाकिस्तान के लिए यह स्थिति बेहद शर्मनाक है। जो देश खुद को मुस्लिम दुनिया का नेता और सुरक्षा प्रदाता बताने की कोशिश कर रहा था, वह अब एक ऐसे मध्यस्थ के रूप में सामने आया है जिसे न पूरी जानकारी है और न ही कोई स्पष्ट रणनीति है। इस्लामिक नाटो जैसे बड़े सपने दिखाने वाला पाकिस्तान आज अपने ही जाल में उलझ गया है। यही वजह है कि वह न तो पूरी तरह ईरान के साथ खड़ा हो पा रहा है और न ही अमेरिका के खिलाफ जा सकता है।

ईरान के साथ उसके रिश्ते पहले से ही तनावपूर्ण हैं, खासकर बलूचिस्तान में हुए हमलों के बाद। ऐसे में मध्यस्थ बनने की उसकी कोशिश शुरू से ही कमजोर आधार पर टिकी थी। इसके अलावा, पाकिस्तान की सेना और सरकार आंतरिक दबावों से जूझ रही है। बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में बढ़ती गतिविधियां यह दिखाती हैं कि देश के भीतर स्थिरता भी चुनौती बनी हुई है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी भूमिका निभाने का उसका दावा खोखला नजर आता है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह संघर्षविराम टिक पाएगा? देखा जाये तो जिस समझौते की बुनियाद ही अस्पष्टता, विरोधाभास और अविश्वास पर टिकी हो, उसका भविष्य संदिग्ध ही होता है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि पाकिस्तान की कूटनीतिक भूल ने न केवल उसकी बची खुची साख को और झटका दिया है, बल्कि पूरे क्षेत्र में तनाव को और जटिल बना दिया है। यह घटना इस बात का उदाहरण है कि आधी अधूरी जानकारी और अतिआत्मविश्वास कैसे एक देश को वैश्विक मंच पर कठघरे में खड़ा कर सकता है।

बहरहाल, अब नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या इस्लामाबाद वास्तव में स्थिति को संभाल पाएगा या फिर यह कूटनीतिक अव्यवस्था एक बड़े संकट में बदल जाएगी? फिलहाल तो तस्वीर यही दिखा रही है कि पाकिस्तान ने शांति की पहल नहीं बल्कि भ्रम का तूफान खड़ा कर दिया है।

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