आपको याद होगा कि कश्मीर के लोगों ने ईरान के लिए खूब पैसा जमा किया था। इसमें कैश, चांदी, पीतल के बर्तन और सोने के जेवर शामिल थे। कश्मीरियों और बाकी शिया मुस्लिमों से पैसा लेने के लिए भारत में ईरान के दूतावास ने क्यूआर कोड तक जारी कर दिया था। लेकिन आप यह जानकर हैरान हो जाएंगे कि ईरान अब इस पैसे से सिर्फ एक ही चीज खरीद सकता है और वह भी सिर्फ भारत से। यह खबर कई लोगों के होश उड़ा देगी। आप इसे भारत का मास्टर स्ट्रोक बोल सकते हैं। दरअसल सोशल मीडिया पर खूब बवाल मचा था कि कश्मीरी ईरान के लिए इतना पैसा कहां से और क्यों ला रहे हैं। कई लोगों ने तो यहां तक कहा कि दान की जा रही चीजों में से कुछ चीजें तो ऐसी लग रही हैं जैसी कश्मीरी हिंदुओं के पास हुआ करती थी। शायद यह वही बर्तन और आर्टिफेक्ट्स हैं जिन्हें कश्मीरी हिंदू पीछे छोड़ गए थे। लेकिन अब मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक एक खबर आई है कि ईरान को जो चंदा मिला है उस चंदे को ईरान अपने देश में नहीं ले जा पाएगा।
कई लोगों ने शक जताया था कि अचानक इतना चंदा जमा कैसे हो गया। क्या इस चंदे का गलत इस्तेमाल तो नहीं होगा। इसी कड़ी में खबर आई है कि ईरान के दूतावास को जितना भी पैसा मिला है, उसे वह पैसा भारत में ही खर्च करना होगा। ईरान को चंदे में जितना सोना, जेवर और बर्तन मिले थे, वह भी ईरानी दूतावास को भारत में ही जमा कराने होंगे। भारत के लिए इसका फायदा यह होगा कि अब 1-एक रुपए का हिसाब लगाया जा सकेगा। कितना पैसा जमा हुआ और कितना इस्तेमाल हुआ इसकी भी जानकारी मिल पाएगी। सूत्रों के मुताबिक जब यह पैसा ईरान की भलाई के लिए जमा किया गया था तो इसे भलाई के लिए ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए। किसी संदिग्ध चीज के लिए नहीं।
रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान को जितना भी कैश और ऑनलाइन पैसा मिला है, उससे ईरान सिर्फ और सिर्फ दवाइयां खरीद सकता है। यह दवाइयां भी ईरान को भारत से ही खरीदनी होंगी। यानी भारत का पैसा भारत में ही खर्च किया जाएगा। सूत्रों के मुताबिक ऐसा कोई डिप्लोमेटिक प्रोसेस नहीं है जिसके तहत ईरान का दूतावास, कैश और सोना ईरान ट्रांसफर कर सके। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक कश्मीर समेत भारत के विभिन्न हिस्सों से ईरान के लिए जो सोना और आभूषण जमा किए गए थे, वह भी ईरानी दूतावास को भारत के स्थानीय बैंक में ही जमा कराने होंगे। इन्हें जमा कराने के बाद ही ईरान को इस पर पैसा दिया जाएगा। ऐसी वस्तुएं भी ईरान का दूतावास ईरान नहीं भेज सकता। आपको बता दें कि इस चंदे की वजह से ईरान को कड़ी आलोचना का सामना भी करना पड़ा था।
पाकिस्तान के दबाव में इस चंदे के लिए किए गए थैंक्यू इंडिया वाले सारे ट्वीट ईरान ने डिलीट कर दिए थे। इसके बाद ईरान ने थैंक्यू कश्मीर लिखकर ट्वीट जारी किए। यानी ईरान ने भारतीयों द्वारा दिए गए समर्थन को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की थी। उसी के बाद से ईरान को दिए जा रहे इस चंदे पर शक की नजरें बढ़ गई। आपको बता दें कि राजनयिक संबंधों और प्रोटोकॉल्स को निर्धारित करने वाला वियना कन्वेंशन विदेशी दूतावासों द्वारा धन जुटाने के विषय को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं करता है। लेकिन इन दूतावासों को बैंकिंग अधिकार प्रदान जरूर करता है। हालांकि एक नियम जरूर है जो दूतावासों को अपने प्राथमिक बैंक खातों का उपयोग किसी अन्य गतिविधि के लिए करने से रोकता है। इसमें चंदा प्राप्त करना भी शामिल है। अगर किसी दूतावास को किसी देश में चंदा इकट्ठा करना होता है तो उसे उस देश के विदेश मंत्रालय की अनुमति की जरूरत है।
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यह कहानी है उस अमेरिकी पायलट के सहयोगी वेपन सिस्टम ऑफिसर की जो ईरान में ऑपरेशन के दौरान अमेरिकी फाइटर जेट F15 ई स्ट्राइक ईगल में सवार था। तभी ईरान के एयर डिफेंस सिस्टम के रडार में आने के बाद ईरानी मिसाइल का शिकार बन गया। लेकिन गनीमत यह रही कि इस दौरान पायलट और उसके सहयोगी फाइटर जेट के क्रैश होने से पहले ही पैराशूट की मदद से कूद गए। इस दौरान अमेरिकी सैनिकों ने फाइटर जेट के मेन पायलट का तो रेस्क्यू कर लिया लेकिन उसका सहयोगी वेपन सिस्टम ऑफिसर लापता हो गया। काफी मशक्कत के बाद शनिवार रात को अमेरिकी सेना ने आखिरकार इस ऑफिसर का भी ईरान के अंदर से रेस्क्यू कर लिया। यह ऑपरेशन अपने आप में बहुत खतरनाक था। जिसे अमेरिकी सेना ने अंजाम दिया। एक तरफ जहां इस मिशन में अमेरिका और इजराइल के एलट कमांडो फोर्स, स्पेशल ऑपरेशन विमानों और हेलीकॉप्टर्स को लगाया गया तो वहीं दूसरी तरफ पायलट का सहयोगी दुश्मन से घिरकर जिंदगी और मौत के बीच खड़ा था। हालांकि अमेरिकी सैनिकों ने अपने इस ऑफिसर को खतरनाक ऑपरेशन के बाद आखिरकार ईरान की जमीन से बचा लिया। अब इस ऑफिसर ने ईरान में दुश्मनों और मौत के बीच गुजारे अपने 24 घंटे का खुलासा किया। जिससे यह पता चला कि कैसे ईरानी मिसाइल का शिकार होने के बाद लापता हुए इस पायलट ने दुश्मनों को चकमा देकर खुद की जान बचाई।
दरअसल ईरान की सेना ने अमेरिका के एक F1-15 ई स्ट्राइक ईगल फाइटर जेट को मार गिराया। इस फाइटर जेट में एक पायलट था और एक वेपन सिस्टम ऑफिसर। फाइटर जेट क्रैश होते ही किसी तरह से अमेरिका के इन दोनों सैनिकों ने खुद को इस विमान से इजेक्ट किया और उसके बाद पैराशूट की मदद से ईरान के पहाड़ों में जा गिरे। ईरान की सेना किसी भी कीमत पर इन दोनों अमेरिकी सैनिकों को जिंदा पकड़ना चाहती थी। इसीलिए ईरान की सेना ने उस इलाके के आसपास रहने वाले लोगों से भी मदद करने को कहा। ईरान की सेना ने कहा कि जो कोई भी इन सैनिकों को जिंदा पकड़ेगा, उसे लगभग 60 हजार अमेरिकी डॉलर से भी ज्यादा का इनाम दिया जाएगा। ईरान की सेना और लोग धीरे-धीरे इन सैनिकों के पास पहुंच रहे थे। यानी अमेरिका के पास रेस्क्यू के लिए बहुत कम समय बचा था। लेकिन अमेरिका ने आखिरी वक्त में अपने इन दोनों सैनिकों को बचा लिया है।
सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक यह वेपन सिस्टम ऑफिसर पहाड़ की दरार में छिपते हुए लगातार अपनी लोकेशन बदलता रहा ताकि ईरान की उन सर्च टीमों को चकमा दिया जा सके जो उसकी जगह के बेहद करीब पहुंच रही थी। इस अमेरिकी पायलट ने ईरान के अंदर इतने सीमित संसाधन में उबड़ खाबड़ और खड़ी चढ़ाई वाले इलाकों को पार किया। रिपोर्ट्स के मुताबिक इस दौरान अमेरिकी पायलट एक जगह समुद्र तल से लगभग 7000 फीट ऊंची पहाड़ी चोटी पर चढ़ गया ताकि उसके बचने और बचाए जाने की संभावना बढ़ सके। अमेरिकी अधिकारियों ने बताया कि उस एयरमैन ने ठीक ऐसी ही स्थितियों के लिए बनाए गए सर्वाइकल प्रोटोकॉल का पालन किया। हालांकि इस दौरान ईरानी सेना ने अमेरिकी पायलट की जानकारी देने वालों को इनाम देने की घोषणा कर दी थी। जिसके बाद आम नागरिक भी उसे ढूंढने के काम में शामिल हो गए थे।
अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक अमेरिकी पायलट की हर हरकत और रियल टाइम पर नजर रखी जा रही थी। अधिकारी लगातार खतरे को भांपते रहे और पायलट को सुरक्षित निकालने के लिए सही वक्त का इंतजार करते रहे। अधिकारियों के मुताबिक ईरान में फंसा एयरमैन कभी भी पूरी तरह से रडार की पहुंच से बाहर नहीं हुआ। क्योंकि उसके पास मौजूदा बीकेन की मदद से अमेरिकी सेना उस पर लगातार नजर बनाए हुए थे। भले ही ईरानी सैनिक उसके करीब पहुंच रहे थे लेकिन अमेरिकी सैनिकों को इस बात का पूरा यकीन था कि वह वक्त से पहले अपने साथी को सही सलामत ईरान से बाहर निकाल लेंगे और ऐसा हुआ भी। अमेरिकी सैनिकों ने इस कठिन ऑपरेशन को अंजाम देकर आखिरकार अपने सहयोगी को ईरान से बाहर निकाल ही लिया। जिसके बाद रविवार की सुबह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर इस बात की जानकारी दुनिया के सामने साझा की। उन्होंने कहा कि अफसर को चोट आई है लेकिन वह पूरी तरह से ठीक है।
ट्रंप ने इसे अमेरिकी इतिहास का सबसे साहसी सर्च और रेस्क्यू ऑपरेशन करार दिया। जिसमें सैकड़ों अमेरिकी कमांडो शामिल थे। जिन्होंने ईरान के काफी अंदर जाकर यह रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया। बता दें कि ईरान और अमेरिका के बीच 28 फरवरी को शुरू हुई यह जंग अब तक जारी है और यह जंग और भी ज्यादा घातक हो सकती है क्योंकि ईरान ने मिडिल ईस्ट में मौजूद कई अमेरिकी सेना ठिकानों को तबाह कर दिया है। इसके साथ ही ईरान ने स्ट्रेट ऑफ हॉर्मोस को भी बंद कर दिया। जिसके बाद से दुनिया भर में तेल और गैस के लिए हाहाकार मचा हुआ है और अमेरिका लगातार ईरान को अल्टीमेटम दे रहा है कि अगर उसने स्ट्रेट ऑफ हॉर्मोंस नहीं खोला तो ईरान में वो पहले से भी ज्यादा भयंकर तबाही मचाएगा और इस बार अमेरिका के निशाने पर ईरान के पावर प्लांट यानी कि बिजली घर और ब्रिज होंगे यानी कि पुल जहां से आम इंसानों का आना-जाना होगा और वह बिजली घर निशाने पर होंगे।
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