पाकिस्तान में चारों तरफ विद्रोह भड़का हुआ है। लगातार मार-काट की तस्वीरें सामने आ रही है। लेकिन मुनीर और शहबाज इन सबको नजरअंदाज करके अलग ही खेल में लगे हुए हैं। कभी मुनीर शहबाज ईरान की तरफ से बैटिंग करते हैं तो कभी अमेरिका की तरफ से। लेकिन इस बार इनकी गर्दन ऐसी फंसी है कि सारी हेकरी निकल गई और बुरी तरह से फड़फड़ा रहे हैं। दरअसल ईरान की ओर से लगातार उन मुस्लिम देशों में हमले किए जा रहे हैं जहां अमेरिका की सेना या सैन्य अड्डे हैं। उन्हीं में से एक सऊदी अरब भी है जो इन दिनों हमलों की सबसे ज्यादा मार झेल रहा है। वही सऊदी जिसने कुछ समय पहले पाकिस्तान के साथ एक समझौता किया था कि अगर दोनों देशों में से किसी एक पर हमला होता है तो वो दोनों देशों पर ही हमला माना जाएगा। ये एक डिफेंस डील की गई और इस डील के तहत एक दूसरे की मदद भी की जाएगी।
जैसे ही ईरान की ओर से हमले शुरू हुए तो पाकिस्तान बिल में जा चुका और उसने किसी भी तरह की सऊदी की मदद नहीं की। लगातार हो रहे हमलों के बीच अचानक पाकिस्तान के पीएम शहबाज और सेना प्रमुख मुनीर सऊदी पहुंचे तो ईरान और ईरान समर्थित हूती ने ऐसे भीषण हमले किए कि पाकिस्तान के डिफेंस बिल की सारी हवा निकल। हूती विद्रोहियों ने यमन सीमा से लगे सऊदी इलाके में हमला जोरदार किया है। सैन्य ठिकानों को बैलेस्टिक मिसाइलों और ड्रोन से निशाना बनाया गया। हमला इतना भीषण था कि कई किलोमीटर तक तबाही का धुआं साफ-साफ दिखाई दे रहा था। इन हमलों में कम से कम 30 सैनिकों की मौत और 50 से ज्यादा घायल होने की खबर सामने आई।
हूती ने दावा किया है कि सऊदी समर्थित बलों को निशाना बनाया गया और बड़ी संख्या में हताहत हुए। यह हमला तब हुआ जब पाकिस्तानी पीएम शहबाज शरीफ और आर्मी चीफ आसिम मुनीर सऊदी में ही मौजूद थे। सीधे तौर पर इस्लामाबाद के लिए भूति विद्रोहियों ने एक कड़ा संदेश भी दिया है कि पाकिस्तान की सैनिक गारंटी के बावजूद पूछे हटने वाले नहीं। 2022 के युद्ध विराम के बाद यह पहला मौका है जब सऊदी अरब की सीमा पर तनाव इस कदर चरम पर पहुंच गया है। अब पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हुई है कि रियाद में जुटने जा रहे सऊदी अरब तुर्की और पाकिस्तान के शीर्ष नेता हूती विद्रियों और ईरान समर्थित मिलीशिया के इस सीधे चैलेंज का क्या जवाब देते हैं?
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मिडिल ईस्ट जल रहा है। रूस यूक्रेन युद्ध थमने का नाम नहीं ले रहा है और इन सबके बीच भारत की धड़कनें तेज हैं। क्योंकि हम अपनी जरूरत का 89% तेल विदेशों से मंगाते हैं। अगर कल सप्लाई रुक गई तो भारत थम जाएगा। लेकिन दिल्ली के गलियारों में एक ऐसी योजना को हरी झंडी दे दी गई है जो दुनिया के तेल बाजारों में हलचल पैदा कर सकती है। नाम है समुद्र मंथन। बजट है 8484 करोड़ और लक्ष्य है भारत के गहरे समुद्र से तेल के भंडार को निचोड़ लेना। यह मेगा रिपोर्ट केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव के उस आधिकारिक ऐलान पर आधारित है जिसमें 8484 करोड़ की नेशनल ऑफशोर एक्सप्लोरेशन स्कीम को मंजूरी दे दी गई है। तेल की खोज कोई नल लगाना नहीं है। यह एक वैज्ञानिक तपस्या होती है। यही वो कुएं हैं जो आने वाले समय में आपकी गाड़ी के पेट्रोल की कीमत तय करेंगे। भारत सरकार ने 8484 करोड़ को दो बड़े हिस्सों में बांट दिया है। पहला हिस्सा है 28000 करोड़ का। यह समुद्र के सीने का डिजिटल एक्सरे है और इसे कहते हैं सिस्मिक डाटा। इनमें अत्याधुनिक जहाज समुद्र की गहराई में तरंगे भेजते हैं ताकि पता चल सके कि चट्टानों के नीचे तेल है या सिर्फ पानी।
दूसरा हिस्सा 43,200 करोड़ का है। यह वो पैसा है जो ड्रिलिंग मशीनों और उत्पादन के लिए इस्तेमाल होगा। भारत सरकार का लक्ष्य है कि साल 2030-31 तक हम अपने समुद्रों का पूरा नक्शा तैयार कर लें। अब समुद्र मंथन की सबसे बड़ी खबर यह है कि ओएनजीसी ने आने वाले समय में 150 गहरे पानी के कुएं यानी डी वाटर वेल्स खोदने की योजना बनाई है। एक गहरा कुआं खोदने का खर्च 500 करोड़ से 1000 करोड़ तक हो सकता है। 150 कुओं का मतलब है कि हज़ारों करोड़ का दाव और भारत सरकार को उम्मीद है कि इन कुओं से 600 मिलियन मीट्रिक टन तेल के बराबर संसाधन मिल सकते हैं। गहराई में ड्रिलिंग शुरू करना कोई आसान खेल नहीं है। हाल ही में ओएनजीसी की टीम ने प्लैटिनम एक्सप्लोरर पर एमए डीडब्ल्यू जैसे व्हेल के लिए 84 इंच बिट प्रोटोजन की जांच की है। समुद्र की लहरों के बीच हज़ारों फीट नीचे एक ड्रिल बीट को सटीक तरीके से पहुंचाना जहां दबाव इतना ज़्यादा होगा कि लोहा भी चिपका दे। ये इस भारत के इंजीनियरिंग की वो चुप्पी है जो आने वाले समय में धमाका करने वाली है और यहां सुरक्षा और सटीकता ही सबसे बड़ा हथियार है। भारत आज दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल उपभोक्ता है। हमारा 88 से 89% तेल बाहर से आता है। जब हम आयात करते हैं तो हम सिर्फ तेल नहीं खरीदते हैं। हम अपनी मेहनत की कमाई यानी कि विदेशी मुद्रा जिसे हम फॉरेक्स कहते हैं वो बाहर भेजते हैं।
समुद्र मंथन के जरिए अगर हम 150 कुओं से तेल निकालने में सफल रहे तो भारत का विदेशी मुद्रा भंडार बचेगा। रुपया मजबूत होगा और हम खाड़ी देशों की दादागिरी से मुक्त हो पाएंगे। यह मिशन सिर्फ आर्थिक नहीं बल्कि सामरिक भी है। लेकिन सवाल उठता है सवाल यह है कि आखिर भारत को इस मिशन की जरूरत आखिर क्यों पड़ी? भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल उपभोक्ता है। रूस की बात करें तो रूस वर्तमान में भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्ति यानी सप्लायर बन गया है। जिसकी हिस्सेदारी बढ़कर 35 से 40% से भी अधिक हालिया आंकड़ों में 50% से अधिक है। हालिया कुल द्विपक्षीय व्यापार के मामले में अमेरिका और चीन के बाद रूस शीर्ष व्यापारिक साझेदारों में शामिल है और भारत के कुल आयात का सबसे बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के रूप में रूस से ही आ रहा है।
जुलाई 2026 में भारत का रूस से कच्चे तेल का आयात बढ़कर 27.8 लाख बैरल प्रतिदिन के ऑल टाइम रिकॉर्ड पर पहुंच गया। जो कुल आयात का 55% से अधिक है। बात करें इराक और सऊदी अरब की तो यह भारत के पारंपरिक और भरोसेमंद साथी हैं जो दूसरे और तीसरे नंबर पर हैं। अमेरिका और यूएई की बात करें तो तो इन देशों से भी हम अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा कर रहे हैं। संकट यह है कि हम हर साल करीब 150 बिलियन विदेशी तेल पर खर्च कर देते हैं। यह पैसा भारत के टैक्स पेयर्स का है जो विदेशों में जा रहा है। अगर हम इसमें से थोड़ा हिस्सा भी बचा लें तो भारत की अर्थव्यवस्था रॉकेट की रफ्तार से दौड़ेंगी। समुद्र मंथन भारत की ऊर्जा सुरक्षा की वो महागाथा है जिसे आने वाली पीढ़ियां याद रखेंगी। ₹84,000 करोड़ का यह निवेश जोखिम भरा हो सकता है लेकिन बिना जोखिम के कोई भी राष्ट्र महाशक्ति नहीं बन सकता है। समुद्र की गहराइयों में होने वाली यह खोजे भारत की कल की बुनियाद है।
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