अमेरिका के 300 सैनिक मिडिल ईस्ट पहुंच गए हैं। अमेरिका ईरान में जमीनी ऑपरेशन की तैयारी कर रहा है। यह जंग अब डोनाल्ड ट्रंप के लिए इज्जत का सवाल बन गई है। नाटो देशों ने अमेरिका का साथ देने से साफ मना कर दिया है। इसी कड़ी में डोनाल्ड ट्रंप ने मिडिल ईस्ट में सैनिक भेजने के बाद मिडिल ईस्ट के ही एक ताकतवर नेता को सरेआम मंच से भद्दी गाली दे दी। लेकिन इससे भी हैरान करने वाली बात यह है कि उसी मिडिल ईस्ट के नेता ने पीएम मोदी को फोन मिलाकर बात की है। दरअसल डोनल्ड ट्रंप ने सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान को गाली दी है। इस गाली का सभ्य भाषा में ट्रांसलेशन है कि मेरी चापलूसी करो। यानी ट्रंप ने मंच पर खड़े होकर मोहम्मद बिन सलमान को कहा है कि तुम मेरी चापलूसी करो। डॉनल्ड ट्रंप का यह पूरा बयान हम आपको आगे सुनवाएंगे। यह भी बताएंगे कि मोहम्मद बिन सलमान ने पीएम मोदी से फोन पर क्या कहा है। लेकिन उससे पहले समझ लीजिए कि डॉनल्ड ट्रंप ने मोहम्मद सलमान को गाली क्यों दी है वो भी तब जब सऊदी अरब खाड़ी के क्षेत्र में अमेरिका का सबसे पुराना और भरोसेमंद साझेदार रहा है।
दरअसल एक्सपर्ट्स का मानना है कि ईरान पर हमले के लिए अमेरिका को इजराइल के साथ-साथ सऊदी अरब ने भी उकसाया था। ईरान और सऊदी अरब के बीच तनाव के मुख्य तीन कारण हैं। सबसे पहला क्षेत्रीय प्रभुत्व, दूसरा धार्मिक मतभेद यानी शिया बनाम सुन्नी और तीसरा जिओपॉलिटिकल हितों के कारण ईरान और सऊदी अरब के बीच तनाव है। 1979 की ईरानी क्रांति के बाद ईरान ने सऊदी अरब की राजशाही के लिए खतरा पैदा कर दिया था। जिसके बाद दोनों देशों के बीच वर्चस्व की जंग शुरू हो गई थी। ईरान और सऊदी अरब, सीरिया, यमन और इराक जैसे देशों में विरोधी गुटों का समर्थन करके एक दूसरे से लड़ाई लड़ रहे हैं। लेकिन अब यह लड़ाई सीधी जंग में बदल चुकी है। सऊदी अरब के कहने पर ही अमेरिका ने ईरान पर हमला किया। यह बात बाकी के खाड़ी देश भी जानते हैं। इसीलिए ईरान इजराइल के साथ-साथ खाड़ी देशों से भी बदला ले रहा है। एक्सपर्ट्स दावा कर रहे हैं कि डॉनल्ड ट्रंप और सऊदी अरब के बीच ईरान हमले को लेकर एक डील हुई थी।
शायद वही डील अब अटक गई है। देखिए, आप यह समझ लीजिए कि डॉनल्ड ट्रंप सीधे-सीधे एक बिजनेसमैन है। जहां से अपने हितों और पैसे की बात आती है, डोनाल्ड ट्रंप उसी दिशा में जाते हैं। इस बात की पूरी संभावना है कि ट्रंप ने सऊदी अरब की बात मानने के बदले पैसा, इन्वेस्टमेंट, कूटनीतिक और रणनीतिक फायदे मांगे होंगे। अब शायद यह पूरे नहीं हो पाए हैं। इसीलिए डोनाल्ड ट्रंप अचानक सऊदी अरब पर भड़क गए हैं। सऊदी अरब भी विचित्र स्थिति में फंस गया है क्योंकि सऊदी अरब भी नहीं जानता था कि ईरान इतना जबरदस्त पलटवार कर देगा। पूरे मिडिल ईस्ट में गैस और तेल सप्लाई 70% ठप हो गई है। ऐसे में पैसे की किल्लत तो सऊदी अरब को भी है। सऊदी अरब को अब भविष्य की चिंता भी सता रही है। ऐसे में शायद सऊदी अरब ने पीछे हटने की कोशिश की।
ट्रंप ने मोहम्मद बिन सलमान को हड़का दिया। अब अमेरिका को लग रहा है कि सऊदी अरब अगर पीछे हट गया तो हम कहीं के नहीं रह पाएंगे। बहरहाल इस मुश्किल घड़ी में अब सऊदी अरब भारत से मदद चाहता है। वैसे तो सऊदी अरब की डील पाकिस्तान के साथ है। लेकिन पाकिस्तान सऊदी अरब के लिए सिर्फ एक दलाल देश है। अमेरिका से बचने के लिए सऊदी अरब को भारत की ही मदद चाहिए होगी। इसी कड़ी में मोहम्मद बिन सलमान ने पीएम मोदी से बात की है।
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भारत की ऊर्जा ताकत को लेकर एक बड़ी खबर सामने आई है। जहां एक तरफ दुनिया तेल और गैस के संकट से जूझ रही है। वहीं भारत ने चुपचाप एक ऐसा कदम उठा दिया है जो आने वाले सालों में गेम बदल सकता है। देश की सबसे बड़ी सरकारी ऑयल कंपनी ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉरपोरेशन यानी कि ओएनजीसी ने अपने 1 अरब के बड़े प्रोजेक्ट से गैस सप्लाई शुरू कर दी है। सबसे बड़ी बात यह प्रोजेक्ट 2 साल से भी कम समय में पूरा कर लिया गया है। दरअसल ओएनजीसी ने ऐलान किया है कि उसके वेस्टर्न ऑफशोर यानी कि पश्चिमी समुद्री क्षेत्र में स्थित दमन अपसाइड डेवलपमेंट प्रोजेक्ट यानी डीयूडीपी के तहत प्लेटफार्म B124P से गैस का प्रवाह शुरू हो चुका है। इसका मतलब क्या हुआ? इसका मतलब सीधे शब्दों में समझिए कि अब इस प्रोजेक्ट से कमाई शुरू हो चुकी है और आज के समय में जब बड़े-बड़े प्रोजेक्ट सालों तक लटक जाते हैं, वहीं ओएनजीसी ने इसे 2 साल से भी कम समय में पूरा करके एक बड़ा रिकॉर्ड बना दिया है। इससे भारत की घरेलू गैस सप्लाई बढ़ेगी। दूसरा भारत बाहर से गैस कम खरीदेगा और तीसरा यह सीधे-सीधे भारत की एनर्जी सिक्योरिटी को मजबूत करेगा। आज भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा तेल और गैस आयात करता है विदेशों से। ऐसे में अगर देश के अंदर ही उत्पादन बढ़े तो विदेशी खर्च कम होगा।
अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और संकट के समय सप्लाई सुरक्षित रहेगी। यानी यह सिर्फ एक प्रोजेक्ट नहीं है बल्कि भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा और ऐतिहासिक कदम है। बता दें कि ओएनजीसी ने यह भी कहा है कि अभी गैस का प्रवाह शुरू हो चुका है। लेकिन आने वाले समय में जैसे-जैसे बाकी कुओं से उत्पादन बढ़ेगा कुल आउटपुट भी बढ़ेगा और प्रोजेक्ट की पूरी क्षमता सामने आएगी। यानी अभी यह शुरुआत है। आगे इसका असली असर और बड़ा होने वाला है। ओएनजीसी सिर्फ प्रोजेक्ट शुरू नहीं किया है बल्कि यह दिखा दिया है कि वह समय पर बड़े प्रोजेक्ट पूरा करने की क्षमता रखता है। आज के दौर में जहां इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट में देरी आम बात है वहीं ओएनजीसी ने 1 अरब डॉलर का निवेश ऑफशोर जैसी मुश्किल लोकेशन से तय समय से पहले पूरा कर दिया है। यह भारत के ऑयल और गैस सेक्टर के लिए बहुत बड़ा पॉजिटिव सिग्नल है।
ऑफशोर यानी कि समुंदर के अंदर काम करना आसान नहीं होता है। भारी निवेश चाहिए, एडवांस टेक्नोलॉजी चाहिए और बहुत ज्यादा जोखिम होता है। लेकिन ओएनजीसी के पास इन सब का लंबा अनुभव है और इसी वजह से यह प्रोजेक्ट सफल हो पाया। ओएनजीसी के अलावा भारत में कुछ और बड़ी कंपनियां भी इस सेक्टर में एक्टिव हैं। इसके अलावा ऑयल इंडिया लिमिटेड जो घरेलू उत्पादन में सहयोग देती है। लेकिन ओएनजीसी का यह प्रोजेक्ट इसलिए खास है क्योंकि यह पूरी तरह सरकारी कंपनी का बड़ा ऑफशोर प्रोजेक्ट है और इसने तेज एक्सक्यूजन का नया बेंचमार्क सेट कर दिया है।
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