अक्षरधाम मंदिर: 108 फीट ऊंची नीलकंठ वर्णी की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा संपन्न, जानिये 'एक पांव पर खड़ी' इस मूर्ति की विशेषताएं
देश की राजधानी दिल्ली स्थित अक्षरधाम मंदिर में आज युवा स्वामीनारायण को चित्रित करने वाली नीलकंठ वर्णी की 108 फीट ऊंची प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा की गई। ऐसे में लंबे समय से इस प्रतिमा के दीदार को लेकर इंतजार भी समाप्त हो गया है। महंत स्वामी महाराज की उपस्थिति ने इस आध्यात्मिक कार्यक्रम को और भी भव्य बना दिया। प्राण प्रतिष्ठा का कार्यक्रम सुबह 6 बजे से शुरू हो गया था। इस आध्यात्मिक कार्यक्रम में देश-विदेशों से आए हजारों श्रद्धालुओं ने हिस्सा लिया।
अक्षरधाम मंदिर में बाहर की ओर स्थापित इस प्रतिमा को बनाने का कार्य लगभग सात वर्षों से चल रहा था। 108 फीट ऊंची इस प्रतिमा के माध्यम से नीलकंठ वर्णी को एक पैर पर खड़ा होकर साधान में लीन दर्शाया गया है। यह प्रतिमा देखते ही मन में गहन शांति महसूस होगी। यह प्रतिमा पंचधातु से बनाई गई है।
बताया जा रहा है कि दुनिया में ऐसी प्रतिमा कहीं भी नहीं बनी है। इस प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा के लिए बीते कई दिनों से तैयारियां चल रही थी। आज इस प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा की प्रक्रिया संपन्न हो गई। इस दो दिवसीय कार्यक्रम की शुरुआत 25 मार्च से हुई थी। पहले दिन शांति यज्ञ का आयोजन किया गया। आज 26 मार्च को नीलकंठ वर्णी की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा पूरे विधि-विधान से संपन्न की गई।
इस मौके पर महंत स्वामी महाराज ने कहा कि यह अत्यंत सुंदर प्रतिमा है। यह उनके तप और दिव्य यात्रा की प्रतीक है। नीलकंठ वर्णी की यह प्रतिमा विश्वभर में शांति का संदेश फैलाएगी और जो भी उनके दर्शन करेगा, वह जीवन में आध्यात्मिक उन्नति पाएगा।
#WATCH | Delhi: A 108-ft tall statue of Neelkanth Varni, depicting young Swaminarayan, to be consecrated at Swaminarayan Akshardham Temple today.
— ANI (@ANI) March 26, 2026
(Video Source: BAPS) pic.twitter.com/kequ4CxTi4
नीलकंठ वर्णी कौन हैं?
नीलकंठ वर्णी यानी भगवान स्वामीनारायण हिंदू धर्म के स्वामी नारायण संप्रदाय के संस्थापक थे। उन्हें घनश्याम पांडे और सहजानंद स्वामी के नाम से भी जाना जाता है। उनका जन्म अयोध्या के पास स्थित छपिया गांव में हुआ था।
बताया जाता है कि उन्होंने 5 साल की उम्र से ही शिक्षा लेना शुरू कर दिया और 11 साल की उम्र में घर छोड़ दिया। इसके बाद करीब 7 साल तक भारत में आध्यात्मिक यात्रा की। उन्होंने कई तीर्थ स्थानों के दर्शन किए। बाद में उन्हें नीलकंठ वर्णी के नाम से पहचाना जाने लगा।
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