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Uncovered With Manoj Gairola: भारत विदेशी NGO फंडिंग के नियमों को क्यों सख्त कर रहा है?

Uncovered With Manoj Gairola: भारत में गैर सरकारी संगठनों को मिलने वाले विदेशी फंड के गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए सरकार एफसीआरए संशोधन बिल में बड़े बदलाव करने जा रही है. इस कदम के बाद से ही राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में एक नई बहस शुरू हो चुकी है. विदेशी पैसे का सही काम में इस्तेमाल हो और इसका दुरुपयोग देश की शांति या सुरक्षा को नुकसान न पहुंचाए, इसी उद्देश्य से यह संशोधन तैयार किया जा रहा है.

एक पुराना किस्सा और धर्मांतरण का सच

विदेशी फंडिंग का असल चेहरा समझने के लिए सालों पुरानी एक घटना को याद करना जरूरी है. एक साधारण ड्राइवर अपने बच्चे का दाखिला दिल्ली के एक बहुत प्रसिद्ध स्कूल में कराने का सपना देख रहा था. उसे वहां मुफ्त पढ़ाई का ऑफर मिला, लेकिन इसके पीछे एक शर्त रखी गई थी. शर्त यह थी कि परिवार को 14 सालों के लिए ईसाई धर्म अपनाना होगा और कभी-कभी चर्च जाना होगा. पढ़ाई खत्म होने के बाद वे फिर से अपने मूल धर्म में वापस लौट सकते थे.

यह कहानी किसी एक इंसान की नहीं है, बल्कि उस बड़े तंत्र की झलक है जो मदद के नाम पर चल रहा है. कई मिशनरी संस्थाएं हर साल हजारों करोड़ रुपये की फॉरेन फंडिंग पाती हैं. यह पैसा कागजों पर तो अस्पताल, स्कूल और अनाथालय चलाने के नाम पर आता है, लेकिन इसका एक बड़ा हिस्सा लोगों को लालच देकर धर्म परिवर्तन कराने में लगा दिया जाता है.

विकास कार्यों में रुकावट और विदेशी पैसा

मामला सिर्फ धर्म बदलने तक सीमित नहीं है. विदेशी पैसे का इस्तेमाल देश के बड़े प्रोजेक्ट्स को रोकने और अस्थिरता फैलाने के लिए भी किया गया है. पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल के दौरान तमिलनाडु में कुडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्लांट का निर्माण होना था. यह प्रोजेक्ट भारत की ऊर्जा जरूरतों के लिए बेहद खास था.

लेकिन अचानक कुछ विदेशी फंड पाने वाले एनजीओ ने स्थानीय लोगों को भड़काकर विरोध प्रदर्शन शुरू करवा दिए. मामले को अदालत तक ले जाया गया, जिससे प्रोजेक्ट सालों पीछे चला गया. जब गृह मंत्रालय ने जांच की तो चौंकाने वाला सच सामने आया. जिस पैसे का इस्तेमाल दिव्यांगों की मदद के लिए होना था, उसे परमाणु संयंत्र के काम को ठप करने में लगा दिया गया था. इसके बाद सरकार ने कई एनजीओ के लाइसेंस रद्द किए थे.

राजनीतिक घेराबंदी और नया संशोधन

साल 2010 में यूपीए सरकार के समय एफसीआरए एक्ट को कड़ा किया गया था. अब मौजूदा सरकार इसमें और नए बदलाव करके इसे अधिक सख्त बना रही है. हालांकि, कुछ विरोधी नेता इस संशोधन का लगातार विरोध कर रहे हैं. उनका तर्क है कि जब अन्य धार्मिक स्थलों को विदेश से मदद मिल सकती है तो बाकी संस्थाओं पर पाबंदी क्यों लगाई जा रही है.

लेकिन सरकार का रुख साफ है कि जिस काम के लिए पैसा विदेश से आ रहा है, उसका उपयोग केवल उसी काम में होना चाहिए. अगर पैसा सामाजिक भलाई के लिए आया है तो उससे विकास कार्य रुकवाने या धर्मांतरण जैसे काम नहीं किए जा सकते.

आंकड़ों का भ्रम और जमीनी हकीकत

सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में ईसाई आबादी में कोई बड़ा उछाल नहीं दिखता, लेकिन हकीकत इससे काफी अलग है. धर्म बदलने वाले ज्यादातर गरीब और अनुसूचित जाति वर्ग के लोग कागजों में अपना पुराना धर्म ही लिखते हैं. इसका मुख्य कारण आरक्षण का फायदा बचाए रखना है. अगर वे आधिकारिक रूप से नया धर्म दर्ज कराएंगे तो उन्हें मिलने वाला आरक्षण का लाभ खत्म हो जाएगा.

यही वजह है कि पंजाब, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु जैसे राज्यों में बड़े पैमाने पर हुए बदलाव के बावजूद सरकारी आंकड़ों में यह दर्ज नहीं हो पाता. राजनीतिक दल भी अपने वोट बैंक के चक्कर में इस मुद्दे पर चुप्पी साधे रहते हैं.

अंतरराष्ट्रीय नियम और भारत की सुरक्षा

विदेशी फंडिंग पर निगरानी रखना हर देश की प्राथमिकता होती है. अमेरिका जैसे विकसित देशों में भी बाहरी पैसे के इस्तेमाल को लेकर बेहद कड़े कानून हैं. वहां भी अगर कोई संस्था या व्यक्ति दूसरे देश से पैसा लेकर लॉबिंग या प्रभाव डालने की कोशिश करता है, तो उस पर सख्त कानूनी कार्रवाई की जाती है.

भारत में भी हर साल अरबों रुपये की विदेशी फंडिंग आती है. जब भारत सरकार खुद समाज कल्याण की योजनाओं पर लाखों करोड़ रुपये खर्च कर रही है, तो ऐसे में पारदर्शी व्यवस्था बनाना बेहद जरूरी हो जाता है. एफसीआरए संशोधन बिल का मुख्य लक्ष्य यही है कि विदेशी पैसा देश की प्रगति में मददगार बने, न कि देश की सुरक्षा और शांति के लिए खतरा.

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