शिवसेना (यूबीटी) सांसद संजय राउत ने बुधवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विदेश नीति संबंधी दृष्टिकोण की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री को अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं के बजाय घरेलू राजनीतिक परामर्श पर अधिक ध्यान देना चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति के बीच हाल ही में हुई फोन कॉल पर टिप्पणी करते हुए यूबीटी सांसद ने कहा कि मध्य पूर्व संकट जैसे वैश्विक मुद्दों पर डोनाल्ड ट्रंप से बातचीत करने के बजाय मोदी को भारत में विपक्ष से बात करनी चाहिए, जिससे बेहतर परिणाम मिलेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि ट्रंप ऐसे व्यवहार कर रहे हैं मानो वे मोदी के बॉस हों।
संजय राउत ने कहा कि ट्रम्प से बात करने के बजाय, मोदी को देश के विपक्ष से बात करनी चाहिए; उन्हें उनसे बेहतर सुझाव मिलेंगे। ट्रम्प तो मोदी के बॉस जैसे हैं। राउत ने मौजूदा वैश्विक संघर्षों में भारत की भूमिका पर सवाल उठाते हुए पाकिस्तान की कूटनीतिक स्थिति का जिक्र किया और कहा कि पाकिस्तान ने ट्रंप के साथ बातचीत में समझौता करने की इच्छा दिखाई है, जिसकी सराहना की जा रही है।
उन्होंने आगे कहा कि दुनिया भर में चल रहे वैश्विक संघर्षों में भारत की क्या भूमिका है? पाकिस्तान जैसे देश ने आज एक रुख अपनाया है - उसने ट्रंप को बताया है कि वह समझौते के लिए तैयार है, और ट्रंप ने इसका स्वागत और सराहना की है। इसका मतलब है कि ट्रंप मोदी को मूर्ख बना रहे हैं। केंद्र सरकार ने बुधवार को एक घंटे 45 मिनट तक चली सर्वदलीय बैठक में सभी राजनीतिक दलों को आश्वासन दिया कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा स्थिर बनी हुई है और अतिरिक्त खेपें रास्ते में हैं। सरकार ने कहा कि पर्याप्त ऊर्जा सुरक्षा है और देश की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा किया जा रहा है। सरकार ने यह भी कहा कि उसने अग्रिम बुकिंग कर ली है, कई देशों के साथ बातचीत कर रही है और निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए अपने समझौतों में विविधता लाई है।
बैठक के बाद केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि आज सरकार द्वारा पश्चिम एशिया की स्थिति पर सर्वदलीय बैठक बुलाई गई थी। मैं बैठक में भाग लेने वाले सभी दलों के सदस्यों को धन्यवाद देना चाहता हूं। सरकार ने विपक्षी नेताओं के सभी प्रश्नों और शंकाओं का उत्तर दिया। सभी विपक्षी दलों ने हमें आश्वासन दिया है कि वे स्थिति के अनुसार सरकार द्वारा उठाए जाने वाले सभी कदमों में सरकार के साथ खड़े रहेंगे। उन्होंने कहा कि सभी उपस्थित रहे और सभी ने अच्छी तरह से भाग लिया। सभी दल के नेताओं ने जानकारी साझा की और अपने-अपने दलों की ओर से अपनी चिंताएं व्यक्त कीं।
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पश्चिम एशिया के ऊपर हवाई क्षेत्र में लगी पाबंदियों के कारण भारतीय विमानों को लंबा रास्ता अपनाना पड़ रहा है। पहले जो उड़ानें सीधे यूरोप और उत्तर अमेरिका जाती थीं, अब उन्हें दक्षिणी मार्ग से होकर जाना पड़ रहा है। इससे यात्रा का समय बढ़ गया है और ईंधन की खपत भी ज्यादा हो रही है।
मौजूद जानकारी के अनुसार, इन बदलावों के चलते विमान कंपनियों की लागत में 30 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो सकती है। उदाहरण के तौर पर एयर इंडिया की दिल्ली से लंदन जाने वाली उड़ान का समय पहले जहां करीब आठ घंटे था, अब 12 घंटे से अधिक हो गया है। वहीं मुंबई से न्यूयॉर्क जाने वाली उड़ान अब बीच में रुककर करीब 21 घंटे तक पहुंच रही है।
वहीं इंडिगो को भी काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। यूरोपीय पंजीकरण वाले विमानों के कारण उसे कई देशों के हवाई क्षेत्र से गुजरने की अनुमति नहीं मिल रही है, जिससे उसे अफ्रीका के रास्ते लंबी उड़ानें भरनी पड़ रही हैं।
हालात इतने मुश्किल हो गए हैं कि कुछ उड़ानों को बीच रास्ते से वापस लौटना पड़ा। इससे यात्रियों को भी भारी परेशानी का सामना करना पड़ा है और कंपनियों की छवि पर असर पड़ा है।
इसी बीच कई विमान कंपनियों ने पश्चिम एशिया के लिए अपनी उड़ानों में कटौती कर दी है। इंडिगो ने कई प्रमुख शहरों के लिए उड़ानें अस्थायी रूप से रोक दी हैं, जबकि एयर इंडिया ने भी बड़ी संख्या में उड़ानें रद्द की हैं और सीमित सेवाएं ही संचालित कर रही है।
ईंधन की बढ़ती कीमतें भी इस संकट को और गहरा कर रही हैं। विमान ईंधन की कीमतों में तेजी से बढ़ोतरी हुई है, जिससे कंपनियों की लागत बढ़ गई है। इसके चलते कंपनियों ने यात्रियों पर अतिरिक्त शुल्क लगाना शुरू कर दिया है, जिससे यात्रा महंगी हो गई है।
मौजूद जानकारी के अनुसार, घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों तरह की उड़ानों पर यह अतिरिक्त शुल्क लागू किया गया है, जिससे यात्रियों की जेब पर असर पड़ रहा है। सरकार ने भी संकेत दिया है कि आने वाले समय में लागत का दबाव और बढ़ सकता है। ऐसे में विमान कंपनियों के लिए आने वाले महीने चुनौतीपूर्ण साबित हो सकते हैं।
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