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धर्म बदला तो नहीं लगेगा SC-ST एक्ट: SC ने साफ किया- ईसाई या मुस्लिम बनने पर नहीं मिलेगा कानूनी सुरक्षा कवच

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि अनुसूचित जाति (SC) से संबंधित कोई व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म जैसे ईसाई या इस्लाम में धर्मांतरण करता है, तो वह अपना अनुसूचित जाति का दर्जा खो देगा।

कोर्ट ने यह भी साफ किया है कि ऐसे व्यक्ति को धर्मांतरण के बाद 'अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम, 1989' (SC/ST Act) के तहत मिलने वाली विशेष कानूनी सुरक्षा भी प्राप्त नहीं होगी।

धर्मांतरण और संवैधानिक आदेश 1950 का तर्क
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के पैरा 3 का हवाला दिया। इस आदेश के अनुसार, केवल वही व्यक्ति अनुसूचित जाति का सदस्य माना जा सकता है जो हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म को मानता हो। मूल रूप से यह दर्जा केवल हिंदुओं के लिए था, लेकिन बाद में 1956 में सिखों और 1990 में बौद्धों को इसमें शामिल किया गया था।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चूंकि ईसाई और इस्लाम धर्म में आधिकारिक तौर पर जाति व्यवस्था या छुआछूत जैसी कुरीतियों को स्थान नहीं दिया गया है, इसलिए इन धर्मों को अपनाने वाले व्यक्ति को उस विशेष आरक्षण या सुरक्षा की आवश्यकता नहीं मानी गई है जो ऐतिहासिक रूप से पिछड़ी जातियों के लिए बनाई गई थी।

क्या धर्मांतरण के बाद मिल सकती है SC/ST एक्ट की सुरक्षा? 
​इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यह था कि क्या जातिगत अपमान या उत्पीड़न होने पर धर्मांतरित व्यक्ति SC/ST एक्ट के तहत शिकायत दर्ज करा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि एक बार जब कोई व्यक्ति ईसाई या इस्लाम धर्म अपना लेता है, तो वह कानूनी रूप से अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं रह जाता।

SC/ST अधिनियम की धारा 3 के तहत अपराध केवल तभी माना जाता है जब पीड़ित व्यक्ति अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य हो। यदि पीड़ित व्यक्ति ने धर्मांतरण कर लिया है, तो आरोपी पर इस विशेष अधिनियम के तहत मुकदमा नहीं चलाया जा सकता, भले ही उत्पीड़न उसकी मूल जाति के आधार पर ही क्यों न किया गया हो।

​केस की पृष्ठभूमि: क्यों उठा यह विवाद?
यह पूरा मामला एक विवादित घटना से शुरू हुआ था जहा एक व्यक्ति, जिसने ईसाई धर्म अपना लिया था, उसने अपनी मूल जाति के आधार पर अपमानित किए जाने पर SC/ST एक्ट के तहत मामला दर्ज कराया था। निचली अदालतों में इस बात पर बहस हुई कि क्या सामाजिक वास्तविकता कानूनी दर्जे से ऊपर हो सकती है।

याचिकाकर्ता का तर्क था कि धर्म बदलने के बाद भी समाज उसे उसकी पुरानी जाति की नजर से ही देखता है और उसके साथ भेदभाव जारी रहता है। हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि कानून भावनाओं या सामाजिक धारणाओं के बजाय संवैधानिक परिभाषाओं पर चलता है।

​ईसाई और मुस्लिम दलितों की मांग पर प्रभाव
​पिछले कई दशकों से देश में 'दलित ईसाइयों' और 'दलित मुस्लिमों' को भी अनुसूचित जाति का दर्जा देने की मांग उठती रही है। इस मुद्दे पर केंद्र सरकार ने पहले ही के.जी. बालकृष्णन आयोग का गठन किया है जो इस बात की जांच कर रहा है कि क्या धर्मांतरण के बाद भी सामाजिक और आर्थिक स्थिति वैसी ही रहती है।

सुप्रीम कोर्ट के इस ताजा रुख ने उन समुदायों के लिए उम्मीदें कम कर दी हैं, क्योंकि कोर्ट ने वर्तमान संवैधानिक ढांचे को ही प्राथमिकता दी है। कोर्ट ने कहा कि जब तक संसद कानून में बदलाव नहीं करती, तब तक 1950 का आदेश ही सर्वोपरि रहेगा।

​सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव 
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला उन राज्यों में धर्मांतरण विरोधी कानूनों को और मजबूती देगा जहां लालच या दबाव में धर्म परिवर्तन के मामले सामने आते हैं। वहीं, दलित संगठनों का एक वर्ग इसे 'अन्याय' बता रहा है, उनका तर्क है कि धर्म बदलने से समाज की मानसिकता नहीं बदलती और छुआछूत का दंश धर्मांतरण के बाद भी पीछा नहीं छोड़ता।

दूसरी ओर, कई संगठन इस फैसले का स्वागत कर रहे हैं, उनका कहना है कि इससे मूल हिंदू, सिख और बौद्ध दलितों के अधिकारों की रक्षा होगी और आरक्षण के लाभ का बंदरबांट रुकेगा।

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Land for Jobs Scam: Lalu Yadav को Delhi High Court से बड़ा झटका, FIR रद्द करने की याचिका खारिज

दिल्ली उच्च न्यायालय ने मंगलवार को लालू प्रसाद यादव की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें कथित भूमि-बदले-नौकरी मामले में सीबीआई की एफआईआर को रद्द करने की मांग की गई थी। इससे आरजेडी प्रमुख और पूर्व रेल मंत्री को झटका लगा है। सुनवाई के दौरान, अदालत ने याचिका को सारहीन और निराधार बताते हुए केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा दर्ज एफआईआर को रद्द करने के अनुरोध को खारिज कर दिया।

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यह मामला यादव के रेल मंत्री रहते हुए रेलवे में नौकरी दिलाने के बदले जमीन के टुकड़े लेने के आरोपों से संबंधित है। सीबीआई इस मामले की जांच कर रही है, जिसमें कई आरोपी शामिल हैं और भर्ती में अनियमितताओं का आरोप है। उच्च न्यायालय के इस फैसले से यादव को कोई राहत नहीं मिली है और मामले की जांच जारी रहेगी। यादव की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिबल ने दलील दी कि कथित कृत्य उनके रेल मंत्री रहते हुए किए गए थे और इसलिए ये उनके आधिकारिक कर्तव्यों के दायरे में आते हैं। उन्होंने तर्क दिया कि ऐसे मामलों में किसी भी जांच या छानबीन शुरू करने से पहले पूर्व स्वीकृति अनिवार्य है। इस दलील का विरोध करते हुए, सीबीआई की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने तर्क दिया कि ऐसी किसी स्वीकृति की आवश्यकता नहीं थी। उन्होंने तर्क दिया कि नियुक्तियों से संबंधित निर्णय महाप्रबंधकों द्वारा लिए जाते हैं, न कि सीधे मंत्री द्वारा, और इसलिए धारा 17ए के तहत संरक्षण लागू नहीं होगा। अदालत ने इससे पहले दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनीं और फैसला सुनाने से पहले लिखित दलीलें दाखिल करने के लिए समय भी दिया था।

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यह मामला यादव के रेल मंत्री के रूप में 2004 से 2009 के बीच के कार्यकाल के दौरान मध्य प्रदेश के जबलपुर स्थित भारतीय रेलवे के पश्चिम मध्य जोन में ग्रुप डी पदों पर कथित अनियमित नियुक्तियों से संबंधित है। सीबीआई ने आरोप लगाया है कि यादव के परिवार के सदस्यों या सहयोगियों के नाम पर हस्तांतरित भूमि पार्सल के बदले में नौकरियां दी गईं। 18 मई, 2022 को यादव और उनकी पत्नी, दो बेटियों, अज्ञात सरकारी अधिकारियों और निजी व्यक्तियों सहित अन्य लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी। अपनी याचिका में यादव ने देरी का मुद्दा भी उठाया और कहा कि कथित घटनाओं के लगभग 14 साल बाद एफआईआर दर्ज की गई, जबकि पहले की जांच एक सक्षम अदालत में रिपोर्ट प्रस्तुत करके बंद कर दी गई थी। उन्होंने दावा किया कि पहले की बंद रिपोर्टों का खुलासा किए बिना मामले को फिर से खोलना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग है।

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11 नंबर की जर्सी, बांह पर काली पट्टी, चिन्नास्वामी हादसे के मृतकों को कुछ यूं श्रद्धांजलि देंगे आरसीबी के खिलाड़ी

RCB Players will wear 11 no jersey: डिफेंडिंग चैंपियन रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु (RCB) ने एक बहुत ही भावुक और बड़ा फैसला लिया है. आईपीएल 2026 में टीम के सभी खिलाड़ी हर मैच से पहले प्रैक्टिस के दौरान 11 नंबर की जर्सी पहनेंगे. पिछले साल 4 जून को जब RCB ने अपना पहला आईपीएल खिताब जीता था, तो बेंगलुरु के चिन्नास्वामी स्टेडियम में जश्न के दौरान भारी भीड़ की वजह से भगदड़ मच गई थी. इस दर्दनाक हादसे में 11 फैंस की जान चली गई थी. फ्रेंचाइजी ने उन वफादार फैंस के सम्मान और उनकी याद में यह कदम उठाया है. Tue, 24 Mar 2026 23:56:14 +0530

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