Uttarakhand News: सीएम धामी ने अपने पास रखे सबसे ताकतवर विभाग, मंत्रियों में बंटवारे के पीछे क्या है रणनीति?
Uttarakhand News: मुख्यमंत्री ने हाल ही में अपने मंत्रिमंडल का विस्तार करने के बाद अब मंत्रियों के बीच विभागों का बंटवारा कर दिया है. यह बंटवारा काफी समय से इंतजार में था, क्योंकि कुछ महत्वपूर्ण विभाग लंबे समय से सीधे मुख्यमंत्री के पास ही थे. अब नई व्यवस्था के तहत कई विभाग मंत्रियों को सौंपे गए हैं, जबकि कुछ अहम और संवेदनशील विभाग मुख्यमंत्री ने अपने पास ही रखे हैं.
पहले थी 35 से ज्यादा विभागों की जिम्मेदारी
जानकारी के अनुसार, पहले मुख्यमंत्री के पास 35 से ज्यादा विभागों की जिम्मेदारी थी. यह संख्या काफी बड़ी मानी जाती है, जिससे काम का बोझ भी अधिक हो जाता है. अब नए बंटवारे के बाद उन्होंने कुछ विभाग मंत्रियों को दे दिए हैं, लेकिन फिर भी कई महत्वपूर्ण विभाग अपने पास ही रखे हैं.
सीएम संभालेंगे ये विभाग
मुख्यमंत्री ने सामान्य प्रशासन, गृह विभाग, कार्मिक, सतर्कता, नियुक्ति एवं प्रशिक्षण और सूचना एवं जनसंपर्क जैसे प्रमुख विभाग खुद संभालने का फैसला किया है. ये सभी विभाग सरकार के संचालन के लिए बेहद जरूरी माने जाते हैं. खासकर गृह विभाग और सामान्य प्रशासन के जरिए कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक फैसलों पर सीधा नियंत्रण रहता है. इसलिए इन विभागों को अपने पास रखना एक रणनीतिक फैसला माना जा रहा है.
ताकि तेजी आगे बढ़ सके काम...
दूसरी तरफ, बाकी विभागों को अलग-अलग मंत्रियों के बीच बांटा गया है, ताकि हर मंत्री अपने विभाग पर पूरा ध्यान दे सके और काम तेजी से आगे बढ़ सके. सरकार का मानना है कि इस बंटवारे से विभागों के काम में बेहतर तालमेल बनेगा और योजनाओं को जमीन पर जल्दी लागू किया जा सकेगा.
इन 5 मंत्रियों को अलग-अलग विभागों का मिला जिम्मा
हाल ही में पांच नए मंत्रियों को शपथ दिलाई गई थी. इनमें खजान दास, मदन कौशिक, भरत सिंह चौधरी, प्रदीप बत्रा और राम सिंह कैड़ा शामिल हैं. इन सभी को अब अलग-अलग विभागों की जिम्मेदारी दी गई है. दरअसल, मंत्रिमंडल में पांच पद काफी समय से खाली थे. इनमें से तीन पद पहले से ही खाली थे, एक पद एक मंत्री के निधन के कारण खाली हुआ था और एक पद इस्तीफे के चलते खाली हो गया था.
इसलिए बढ़ गया था काम का दबाव
इन खाली पदों की वजह से कई विभागों का काम सीधे मुख्यमंत्री के पास चला गया था. इससे काम का दबाव बढ़ गया था और फैसलों में देरी की संभावना भी रहती थी. अब नए मंत्रियों के आने और विभागों के बंटवारे से इस समस्या को काफी हद तक हल करने की कोशिश की गई है.
राजनीतिक नजरिया क्या कहता है?
राजनीतिक नजरिए से देखें तो यह बंटवारा काफी सोच-समझकर किया गया है. इसमें क्षेत्रीय संतुलन, सामाजिक प्रतिनिधित्व और प्रशासनिक दक्षता को ध्यान में रखा गया है. यानी कोशिश की गई है कि अलग-अलग क्षेत्रों और वर्गों को प्रतिनिधित्व मिले और साथ ही सरकार का काम भी बेहतर तरीके से चल सके.
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
विशेषज्ञों का मानना है कि मुख्यमंत्री द्वारा अहम विभाग अपने पास रखना एक मजबूत रणनीति है. इससे सरकार की मुख्य कमान उनके हाथ में रहती है और वे बड़े फैसलों पर सीधा नियंत्रण रख सकते हैं. वहीं, बाकी विभाग मंत्रियों को देकर जिम्मेदारियों का सही बंटवारा किया गया है. कुल मिलाकर, यह नया विभागीय बंटवारा सरकार को ज्यादा संगठित, जिम्मेदार और परिणाम देने वाला बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है. इससे उम्मीद की जा रही है कि विकास कार्यों में तेजी आएगी और प्रशासनिक कामकाज पहले से ज्यादा बेहतर होगा.
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स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की ‘माइन स्वीपिंग’ आखिर क्या? क्यों जापान ने दिखाई दिलचस्पी
टोक्यो/नई दिल्ली, 22 मार्च (आईएएनएस)। जापान के विदेश मंत्री तोशिमित्सु मोटेगी का हालिया बयान एक ऐसे सैन्य ऑपरेशन की ओर इशारा करता है, जो दिखने में सफाई जैसा लगता है, लेकिन असल में बेहद खतरनाक और तकनीकी रूप से जटिल होता है। बात हो रही है स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में माइन स्वीपिंग —यानी समुद्र में बिछाए गए बारूदी जाल को हटाने की।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में गिना जाता है, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। अगर यहां माइंस बिछा दी जाएं, तो यह सिर्फ एक सैन्य खतरा नहीं रहता, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को झटका दे सकता है। यही वजह है कि जापान ने साफ कहा है कि अगर अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच संघर्ष में युद्धविराम होता है, तो वह इस जलडमरूमध्य को सुरक्षित बनाने के लिए अपने सैन्य संसाधनों से माइंस हटाने पर विचार कर सकता है।
अब सवाल उठता है कि ये “माइन स्वीपिंग” असल में होता क्या है? समुद्र में बिछाई गई माइंस किसी भी जहाज के लिए छिपे हुए बम की तरह होती हैं। ये कभी टकराने से, कभी जहाज़ के मैग्नेटिक फील्ड से, तो कभी उसकी आवाज से सक्रिय हो जाती हैं। इन्हें हटाने के लिए विशेष जहाज, हेलीकॉप्टर और अब तो पानी के भीतर चलने वाले रोबोट तक इस्तेमाल होते हैं।
कुछ मामलों में जहाज पानी में तार खींचते हुए चलते हैं, जो माइंस को पकड़कर उनकी पकड़ काट देता है, जिससे वे सतह पर आ जाती हैं और फिर उन्हें दूर से नष्ट कर दिया जाता है। आधुनिक तकनीक में पहले सोनार से माइंस को खोजा जाता है और फिर रोबोट जाकर उन्हें निष्क्रिय करता है—एक तरह से यह समुद्र के अंदर बम निरोधक दस्ता काम करता है।
इतिहास गवाह है कि यह कोई नया विचार नहीं है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान समुद्रों में इतनी बड़ी संख्या में माइंस बिछाई गई थीं कि युद्ध खत्म होने के बाद भी कई वर्षों तक उन्हें हटाने का काम चलता रहा। इसी तरह ऑपरेशन एंड स्वीप के तहत अमेरिका ने वियतनाम युद्ध के बाद समुद्री रास्तों को साफ किया था ताकि जहाजों की आवाजाही फिर से शुरू हो सके।
जापान को नौसेना के माइन-स्वीपिंग में एक शीर्ष-स्तरीय विशेषज्ञ माना जाता है। इसकी क्षमताएं दुनिया में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती हैं। एक द्वीपीय राष्ट्र होने के नाते जापान ने एक अत्यंत विशिष्ट मैरीटाइम सेल्फ-डिफेंस फोर्स (जेएमएसडीएफ) का माइन-स्वीपिंग बेड़ा विकसित किया है, जिसे समुद्री मार्गों को खुला रखने के लिए डिजाइन किया गया है।
जापान के पास उन्नत माइन-स्वीपर जहाज हैं। इनमें अवाजी-श्रेणी गहरे पानी में संचालन के लिए डिजाइन किया गया है, और मोगामी-श्रेणी के फ्रिगेट बारूदी सुरंगों का पता लगाने और उन्हें निष्क्रिय करने के लिए उन्नत मानवरहित प्रणालियों से लैस हैं।
जापान का यह संकेत इसलिए भी अहम है क्योंकि वह खुद एक ऊर्जा-निर्भर देश है और उसका बड़ा तेल आयात इसी रास्ते से आता है। ऐसे में अगर यह मार्ग असुरक्षित होता है, तो इसका सीधा असर जापान की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। इसलिए उसका यह कदम केवल सैन्य सहयोग नहीं, बल्कि अपने आर्थिक हितों की रक्षा भी है।
--आईएएनएस
केआर/
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