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आगरा का पेठा: मुगल रसोई से ग्लोबल मार्केट तक, 400 साल पुराना यह स्वाद आज 700 करोड़ का कारोबार

ताजमहल की नगरी आगरा सिर्फ अपनी ऐतिहासिक धरोहर के लिए ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में मशहूर “पेठा” के लिए भी जानी जाती है। 400 साल पुराने इस मीठे सफर की कहानी मुगल दरबार से शुरू होकर आज ग्लोबल मार्केट तक पहुंच चुकी है। कभी शाहजहां की रसोई में तैयार हुई यह मिठाई आज 700 करोड़ के कारोबार में बदल चुकी है और हजारों परिवारों की जिंदगी का सहारा बनी हुई है।

​मुगलिया दौर से शुरुआत: शाहजहां की रसोई का आविष्कार 
पेठे की शुरुआत का इतिहास मुगल बादशाह शाहजहाँ के दौर से जुड़ा माना जाता है। कहा जाता है कि जब ताज महल का निर्माण हो रहा था, तब मुख्य वास्तुकार ने बादशाह से मजदूरों के लिए ऐसी मिठाई की मांग की जो ताज जैसी ही सफेद हो और उन्हें तुरंत ऊर्जा दे सके।

आज यह सादे स्वाद से निकलकर केसर, चॉकलेट और पान जैसे 50 से अधिक आधुनिक स्वादों में उपलब्ध है।

शाही बावर्चियों ने कड़ी मेहनत के बाद सफेद कद्दू, चीनी और चूने के पानी के मेल से 'पेठा' तैयार किया। देखते ही देखते यह शाही रसोई की शान बन गया और ताज महल के साथ-साथ इसकी ख्याति भी दूर-दूर तक फैल गई।

​पहली दुकान और 'पंछी पेठा' का उदय
आगरा में पेठे को एक व्यावसायिक पहचान दिलाने का श्रेय 'पंछी पेठा' को जाता है। इसकी शुरुआत लगभग 1940 के दशक के आसपास हुई थी। पंछी पेठा आगरा का सबसे पुराना और प्रतिष्ठित ब्रांड माना जाता है।

'पंछी पेठा' जैसे प्रतिष्ठित ब्रांडों ने इसे व्यावसायिक पहचान दिलाई।

शुरुआत में पेठा सिर्फ सादा और सूखा मिलता था, लेकिन समय के साथ इसकी गुणवत्ता और ब्रांडिंग ने इसे देश-विदेश में मशहूर कर दिया। आज आगरा में हजारों दुकानें हैं, लेकिन 'पंछी पेठा' के नाम से ही असली पेठे की पहचान की जाती है।

​सफेद कद्दू : पेठे का मुख्य फल और इसकी पैदावार 
पेठा बनाने के लिए जिस खास फल का इस्तेमाल होता है, उसे 'सफेद कद्दू' या स्थानीय भाषा में 'भुआ' कहा जाता है। इसकी सबसे अच्छी पैदावार उत्तर प्रदेश के चंदौली, प्रयागराज, जौनपुर और दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में होती है।

सफेद कद्दू' से बनने वाला यह उत्पाद आगरा की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, जिसका सालाना टर्नओवर 500 से 700 करोड़ रुपये है।

आगरा के पेठा कारोबारी भारी मात्रा में इन जिलों से कच्चे कद्दू मंगवाते हैं। पेठा बनाने के लिए केवल पूरी तरह पके हुए और सख्त छिलके वाले कद्दू ही चुने जाते हैं, क्योंकि उनमें गूदा अधिक और पानी कम होता है।

​मेकिंग प्रोसेस: चूने के पानी से चाशनी तक का कठिन सफर 
पेठा बनाने की प्रक्रिया काफी लंबी और मेहनत भरी होती है। सबसे पहले कद्दू को छीलकर उसके बीज निकाले जाते हैं और छोटे टुकड़ों में काटा जाता है। इन टुकड़ों को सुइयों से गोदकर चूने के पानी में भिगोया जाता है, ताकि वे सख्त हो सकें।

इसके बाद इन्हें साफ पानी से धोकर उबाला जाता है। अंत में, इन उबले हुए टुकड़ों को चीनी की गाढ़ी चाशनी में घंटों तक पकाया जाता है। चाशनी जब टुकड़ों के अंदर तक समा जाती है, तब इसे ठंडा करके विभिन्न स्वादों में ढाला जाता है।

​कितने तरह के होते हैं पेठे? स्वाद की लंबी फेहरिस्त 
वक्त के साथ पेठे ने अपना पारंपरिक चोला उतारकर आधुनिक स्वाद अपना लिया है। आगरा में आज 50 से ज्यादा किस्मों के पेठे तैयार किए जाते हैं। इनमें सबसे लोकप्रिय अंगूरी पेठा, सूखा पेठा, केसर पेठा और चॉकलेट पेठा हैं।

आगरा में आज 50 से ज्यादा किस्मों के पेठे तैयार किए जाते हैं। इनमें सबसे लोकप्रिय अंगूरी पेठा, सूखा पेठा, केसर पेठा और चॉकलेट पेठा हैं।

इसके अलावा आजकल पान पेठा, सैंडविच पेठा, चेरी पेठा और शुगर-फ्री पेठा भी काफी मांग में रहते हैं। पर्यटकों के लिए अब पेठे को आकर्षक पैकिंग और गिलासों में भी पेश किया जाता है।

​करोड़ों का कारोबार और वैश्विक एक्सपोर्ट
आगरा में पेठे का कारोबार सालाना 500 से 700 करोड़ रुपये से भी अधिक का है। शहर में लगभग 1500 से ज्यादा छोटी-बड़ी पेठा निर्माण इकाइयां हैं, जहाँ रोजाना करीब 700 से 800 टन पेठा तैयार किया जाता है।

आगरा का पेठा सिर्फ भारत के कोनों-कोनों में ही नहीं, बल्कि अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, दुबई और खाड़ी देशों में बड़े पैमाने पर एक्सपोर्ट किया जाता है। यह उद्योग आगरा के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लगभग 50,000 से ज्यादा लोगों को रोजगार प्रदान करता है।

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