ईरान युद्ध के चलते कच्चे तेल से ज्यादा बढ़ सकते हैं डीजल और जेट फ्यूल के दाम: रिपोर्ट
नई दिल्ली, 17 मार्च (आईएएनएस)। ईरान युद्ध के चलते वैश्विक तेल बाजार में आई उथल-पुथल का असर कच्चे तेल से ज्यादा डीजल और जेट फ्यूल जैसे पेट्रोलियम उत्पादों पर पड़ सकता है। यह जानकारी गोल्डमैन सैक्स ग्रुप की एक रिपोर्ट में सामने आई है।
रिपोर्ट के अनुसार, कई रिफाइंड उत्पादों (जैसे डीजल और जेट फ्यूल) की कीमतों में कच्चे तेल की तुलना में ज्यादा तेजी देखी जा रही है। विश्लेषकों ने कहा कि मीडियम और हेवी क्रूड की सप्लाई में भारी बाधा आने से डीजल, जेट फ्यूल और फ्यूल ऑयल का उत्पादन कम हो सकता है।
अमेरिका और इजरायल के ईरान के खिलाफ युद्ध ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को हिला कर रख दिया है। यह संघर्ष बीते 28 फरवरी को शुरू हुआ और अब तीसरे हफ्ते में पहुंच चुका है, जिससे पूरे मध्य पूर्व क्षेत्र पर असर पड़ा है।
इस संघर्ष के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए तेल और पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात रुक गया है, और क्षेत्र में कई ऊर्जा ढांचे पर हमले भी हुए हैं। इससे तेल उत्पादकों को उत्पादन कम करना पड़ा है और कुछ रिफाइनरी संचालन भी रोकने पड़े हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, पहले हमलों के बाद से कच्चे तेल की कीमतों में 40 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है, और ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है।
हालांकि, डीजल और जेट फ्यूल जैसे पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में इससे भी ज्यादा तेजी आई है। एशिया के कुछ हिस्सों में तो ईंधन की कीमतें दोगुनी तक हो गई हैं, और चीन, थाईलैंड और दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने अपने घरेलू बाजार को बचाने के लिए निर्यात सीमित कर दिया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस संकट से कोई भी क्षेत्र पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। युद्ध के कारण पर्शियन गल्फ (फारस की खाड़ी) के देशों के लिए रिफाइंड उत्पादों का निर्यात करना मुश्किल हो गया है, जिससे रिफाइनरी बंद हो रही हैं और डीजल जैसे ईंधन बनाने वाले क्रूड की सप्लाई कम हो रही है।
गोल्डमैन सैक्स की रिपोर्ट में बताया गया कि पर्शियन गल्फ से होने वाले करीब 60 प्रतिशत कच्चे तेल का हिस्सा मीडियम और हेवी क्रूड होता है, जिसका इस्तेमाल मुख्य रूप से डीजल, जेट फ्यूल और फ्यूल ऑयल बनाने में किया जाता है, जिसके विकल्प भी सीमित हैं।
इस वैश्विक संकट का असर नेफ्था पर भी पड़ेगा, जो पेट्रोकेमिकल्स बनाने में इस्तेमाल होता है और कई उद्योगों के लिए जरूरी कच्चा माल है।
रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि एशिया अपने नेफ्था का करीब 50 प्रतिशत फारस की खाड़ी क्षेत्र से पूरी करता है, जबकि यूरोप अपने 40 प्रतिशत जेट फ्यूल के लिए इसी क्षेत्र पर निर्भर है। ऐसे में यह संकट वैश्विक स्तर पर ईंधन सप्लाई और कीमतों पर बड़ा असर डाल सकता है।
--आईएएनएस
डीबीपी
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
श्रीलंका: 'ईंधन संकट' से बचाव का उपाय: बुधवार को स्कूल-दफ्तर रहेंगे बंद, सड़क पर दिखेंगे सीमित वाहन
कोलंबो, 17 मार्च (आईएएनएस)। पश्चिम एशिया संकट के कारण ईंधन सप्लाई को लेकर कई देश चिंतित हैं। कहीं मंत्रियों और आला अधिकारियों के वेतन में कटौती की जा रही है, और कहीं सरकारी महकमों में लिफ्ट पर पाबंदी लगा दी गई है। श्रीलंका सरकार ने बड़ा फैसला लिया और हफ्ते में सिर्फ चार दिन काम का ऐलान किया। सरकार के निर्देशानुसार, बुधवार को ज्यादातर स्कूल और दफ्तर बंद रहेंगे, तो वहीं इस दिन सार्वजनिक वाहन भी सड़कों पर कम दौड़ेंगे।
आवश्यक सेवा आयुक्त जनरल प्रभात चंद्रकीर्ति ने सोमवार को कहा कि श्रीलंका में बुधवार को सार्वजनिक अवकाश घोषित किया गया है और इस दिन सार्वजनिक परिवहन सेवाएं भी सीमित रहेंगी।
इस फैसले पर बात करते हुए, चंद्रकीर्ति ने कहा कि यह कदम सरकारी कार्यालयों के बंद रहने और इन दिनों स्कूलों से छात्रों की अनुपस्थिति के अनुरूप है।
उन्होंने आगे कहा कि निजी क्षेत्र से भी बुधवार को आवागमन कम करने का अनुरोध किया गया है। सीलोन चैंबर ऑफ कॉमर्स और एम्प्लॉयर्स फेडरेशन ऑफ सीलोन के साथ चर्चा की गई है, जिसमें निजी क्षेत्र के संस्थानों से आग्रह किया गया है कि जहां भी संभव हो, वर्क-फ्रॉम-होम (घर से काम करने) की व्यवस्था की अनुमति दें। उन्होंने कहा कि इससे सार्वजनिक परिवहन की मांग में काफी कमी आएगी।
चंद्रकीर्ति ने कहा, इसके परिणामस्वरूप, सार्वजनिक परिवहन सेवाएं सीमित रहेंगी, और सलाह दी कि जनता को इनका उपयोग केवल आवश्यक यात्रा के लिए ही करना चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अस्पतालों तक जाने जैसी अत्यंत महत्वपूर्ण आवश्यकताओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
इससे पहले, सरकार के एक नए निर्देश के बाद, अब पूरे देश में इंटरनेशनल स्कूलों, निजी विश्वविद्यालयों और वोकेशनल ट्रेनिंग सेंटर्स के छात्रों की बुधवार को छुट्टी रहेगी।
श्रीलंका के प्रमुख दैनिक डेली मिरर ने मंत्रालय के हवाले से बताया कि, भविष्य के ऊर्जा संकट से बचाने की मुहिम के तहत ये कदम उठाया गया है। सरकार का तर्क है कि अगर अभी से इस पर नियंत्रण कर लिया तो आगे चलकर आवश्यक सेवाओं में कोई व्यवधान नहीं पैदा होगा।
शिक्षा, उच्च शिक्षा और वोकेशनल शिक्षा मंत्रालय ने सभी प्रभावित संस्थानों से अपने शेड्यूल में बदलाव करने और इस फैसले का पालन सुनिश्चित करने को कहा है। मंत्रालय ने कहा कि सप्ताह के बीच में यह छुट्टी एक अस्थायी उपाय है, जिसे राष्ट्रीय ऊर्जा-बचत पहल में मदद करने के लिए डिजाइन किया गया है।
मंत्रालय के सचिव नलका कलुवेवा ने स्कूलों और संस्थानों से आग्रह किया कि वे छात्रों और कर्मचारियों के साथ तालमेल बिठाएं, ताकि बदले हुए शेड्यूल के बावजूद पढ़ाई प्रभावी ढंग से जारी रहे।
डेली मिरर के अनुसार, इस फैसले ने अभिभावकों और छात्रों के बीच इस बात पर चर्चा छेड़ दी है कि सप्ताह के बीच में इस छुट्टी से ऑनलाइन कक्षाएं, पाठ्येतर गतिविधियां और शैक्षणिक समय-सीमाएं कैसे मैनेज होंगी।
श्रीलंका उन देशों में से एक है जो ईंधन बचाने के लिए काम के घंटे कम कर रहा है; यह देश ज्यादातर ईंधन मध्य पूर्व से मंगाता है।
श्रीलंका के चार साल पहले के आर्थिक संकट की याद दिलाने वाले दृश्यों के बीच, रविवार से ईंधन की राशनिंग शुरू हो गई। पेट्रोल पंपों के बाहर लंबी कतारें लग गईं और गाड़ी चलाने वालों के लिए हफ्ते में 15 लीटर पेट्रोल या डीजल की सीमा तय कर दी गई, जबकि सार्वजनिक परिवहन के लिए 200 लीटर तक ईंधन आवंटित किया गया।
--आईएएनएस
केआर/
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