जरूरत की खबर- स्कूलों के बाहर जंक फूड पर बैन:बच्चों को अनहेल्दी खाने से कैसे रोकें, हेल्दी ईटिंग हैबिट सिखाने के 8 टिप्स
पिछले दिनों महाराष्ट्र सरकार ने एक बड़ा फैसला लेते हुए स्कूलों और उनके आसपास 50 मीटर के दायरे में जंकफूड की दुकानों पर रोक लगा दी। अब महाराष्ट्र में स्कूलों के भीतर, बाहर और आसपास वड़ा पाव, समोसा, पेस्ट्री, बर्गर, मोमोज जैसे जंक फूड नहीं मिलेंगे। ये सभी फूड HFSS (हाई फैट, शुगर एंड सॉल्ट) फूड की कैटेगरी में आते हैं। सरकार ने यह फैसला बच्चों में हेल्दी खानपान की आदतों को बढ़ावा देने के लिए लिया है। स्कूल के बाहर वड़ा पाव, समोसा, चिप्स और कोल्ड ड्रिंक जैसे फूड आइटम्स बच्चों को आसानी से मिल जाते हैं। रेगुलर ये चीजें खाने से बच्चों में डायबिटीज, मोटापा और अन्य लाइफस्टाइल डिजीज का रिस्क बढ़ रहा है। इसलिए आज ‘जरूरत की खबर’ में ‘HFSS फूड्स’ पर बात करेंगे। साथ ही जानेंगे कि- एक्सपर्ट: डॉ. साकेत कांत, सीनियर कंसल्टेंट, एंडोक्रोनोलॉजी, श्री बालाजी एक्शन मेडिकल इंस्टीट्यूट, दिल्ली सवाल- महाराष्ट्र सरकार ने स्कूल परिसर और उसके आसपास 50 मीटर के दायरे में HFSS फूड पर बैन लगाया है। HFSS फूड क्या है? जवाब- HFSS का मतलब ‘हाई फैट, शुगर एंड सॉल्ट’ होता है। इस कैटेगरी में ऐसे फूड आते हैं, जिनमें फैट, चीनी या नमक की मात्रा बहुत ज्यादा होती है। इनमें ये फूड्स शामिल हैं- सवाल- महाराष्ट्र सरकार ने इन पर प्रतिबंध क्यों लगाया है? जवाब- यह प्रतिबंध राज्य के 'सेफ फूड, सेफ महाराष्ट्र' अभियान का हिस्सा है। महाराष्ट्र सरकार ने बच्चों तक सुरक्षित और पौष्टिक भोजन पहुंचाने के उद्देश्य से यह प्रतिबंध लगाया है। इसका मकसद स्कूलों में हेल्दी ईटिंग हैबिट्स को बढ़ावा देना है। सरकार का कहना है कि स्कूलों के आसपास जंक फूड की आसान उपलब्धता कम करके बच्चों के लिए बेहतर फूड एनवायर्नमेंट बनाया जा सकता है। ग्राफिक में जंक फूड बैन करने का मकसद समझिए- सवाल- 50 मीटर की सीमा क्यों तय की गई है? जवाब- बच्चे स्कूल गेट के आसपास ही सबसे ज्यादा जंक फूड खरीदते हैं। FSSAI के 'सेफ फूड एंड बैलेंस्ड डाइट फॉर चिल्ड्रेन इन स्कूल रेगुलेशंस, 2020' में स्कूलों के आसपास HFSS फूड पर सख्ती का प्रावधान है। इसके तहत स्कूल गेट से 50 मीटर के दायरे में इनकी बिक्री, फ्री-डिस्ट्रिब्यूशन और विज्ञापन बैन है। महाराष्ट्र सरकार ने इसी प्रावधान को लागू किया है। सवाल- अगर कोई दुकानदार नियम तोड़ता है तो उसके खिलाफ क्या कार्रवाई हो सकती है? जवाब- नियमों का उल्लंघन होने पर संबंधित व्यक्ति या प्रतिष्ठान के खिलाफ ‘फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स एक्ट, 2006’ के तहत कार्रवाई की जा सकती है। हालांकि महाराष्ट्र FDA (फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन) के आदेश में दुकानदारों के लिए किसी निश्चित जुर्माने या सजा का अलग से जिक्र नहीं किया गया है। वहीं स्कूल परिसर में यह नियम लागू कराने की जिम्मेदारी प्रिंसिपल और स्कूल मैनेजमेंट की है। सवाल- कौन-से स्नैक्स हेल्दी दिखते हैं, लेकिन वास्तव में HFSS होते हैं? जवाब- कई पैकेज्ड स्नैक्स और ड्रिंक्स हेल्दी होने का दावा करते हैं, लेकिन उनमें चीनी, नमक या सैचुरेटेड फैट की मात्रा ज्यादा हो सकती है। ऐसे फूड आइटम्स HFSS कैटेगरी में आते हैं। इसलिए सिर्फ पैकेट पर लिखे 'हेल्दी', 'बेक्ड', 'मल्टीग्रेन', 'लो-फैट' या 'हाई-फाइबर' जैसे दावों पर उन्हें पौष्टिक मान लेना सही नहीं है। ग्राफिक में ऐसे फूड आइटम्स की लिस्ट देखिए- सवाल- अगर कोई बच्चा HFSS स्नैक्स ज्यादा खाता है तो इसका उसकी सेहत पर क्या असर पड़ता है? जवाब- HFSS स्नैक्स में कैलोरी ज्यादा और पोषक तत्व कम होते हैं। इन्हें रेगुलर खाने से बच्चे की डाइट का बैलेंस बिगड़ जाता है। सवाल- स्टडीज बताती हैं कि HFSS फूड के कारण बच्चों में मोटापा बढ़ रहा है। मोटापे के कारण बच्चों में किन बीमारियों का रिस्क बढ़ता है? जवाब- बचपन का मोटापा शरीर के कई अंगों और मेटाबॉलिज्म को प्रभावित करता है। अगर समय रहते इस पर ध्यान न दिया जाए, तो कम उम्र में ही कई गंभीर हेल्थ प्रॉब्लम्स का रिस्क बढ़ जाता है। ग्राफिक में सभी हेल्थ रिस्क देखिए- सवाल- क्या स्कूलों के बाहर HFSS फूड बैन से बच्चों का मोटापा कम होगा? जवाब- यह बच्चों में मोटापा रोकने की दिशा में एक अहम कदम है। लेकिन सिर्फ इससे समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होगी। बच्चे को हेल्दी और स्लिम रखने में माता-पिता और परिवार की भूमिका भी बहुत अहम है। आखिरकार, बच्चे वही आदतें सीखते हैं, जो घर में रोज देखते हैं। इसलिए हेल्दी रहना पूरे परिवार की जीवनशैली का हिस्सा होना चाहिए। सवाल- बच्चों के लिए नमक, चीनी और फैट इनटेक की डेली मात्रा कितनी होनी चाहिए? जवाब- WHO और ICMR एक्स्ट्रा नमक, चीनी और अनहेल्दी फैट का सेवन सीमित रखने की सलाह देते हैं। नमक शुगर फैट ध्यान रखें: नमक, चीनी और फैट की बड़ी मात्रा अक्सर चिप्स, नमकीन, बिस्कुट, केक, चॉकलेट, कोल्ड ड्रिंक, इंस्टेंट नूडल्स और फास्ट फूड से आती है। इसलिए सिर्फ खाने में डाली गई चीनी या नमक नहीं, पैकेज्ड फूड में छिपी मात्रा पर भी नजर रखें। सवाल- बच्चे को जंक फूड खाने से कैसे रोकें? जवाब- बच्चों की फूड चॉइस बदलने की शुरुआत घर से होती है। अगर घर में रोज हेल्दी विकल्प मिलें और माता-पिता भी वही खाएं, तो बच्चे उन्हें आसानी से अपनाने लगते हैं। ग्राफिक में बच्चे को जंक फूड खाने से रोकने के टिप्स देखिए- सवाल- बच्चों में हेल्दी ईटिंग हैबिट्स कैसे विकसित करें? जवाब- बच्चों में हेल्दी खानपान की आदत विकसित करने का कोई शॉर्टकट फॉर्मूला नहीं है। छोटे-छोटे बदलाव ही लंबे समय में अच्छी आदत बनाते हैं। ग्राफिक में देखिए कि बच्चों को हेल्दी ईटिंग हैबिट्स कैसे सिखाएं- फूड बैन से जुड़े कॉमन सवाल जवाब सवाल- क्या बच्चों को जंक फूड देना पूरी तरह बंद कर देना चाहिए? जवाब- नहीं, जंक फूड को पूरी तरह बंद करने की बजाय सीमित मात्रा में कभी-कभार दे सकते हैं। इन्हें रोजमर्रा की डाइट का हिस्सा नहीं बनाना चाहिए। इसकी जगह घर के बने हेल्दी स्नैक्स को प्राथमिकता देनी चाहिए। सवाल- क्या दुबले-पतले बच्चों के लिए भी जंक फूड नुकसानदायक है? जवाब- हां, दुबला-पतला दिखने का मतलब यह नहीं कि बच्चा स्वस्थ है। अगर वह रेगुलर जंक फूड खाता है, तो उसके शरीर में जरूरी पोषक तत्वों की कमी हो सकती है, भले ही उसका वजन सामान्य हो। सवाल- क्या पॉकेट मनी देने से बच्चों में जंक फूड की आदत बढ़ती है? जवाब- हां, अगर बच्चा पॉकेट मनी से रेगुलर जंक फूड खरीदता है, तो उसकी यह आदत बढ़ सकती है। इसलिए बच्चों को पैसे के साथ सही फूड चॉइस करना भी सिखाएं। ……………………………………. ये खबर भी पढ़ें… जरूरत की खबर- जंक फूड पर हो सिगरेट वाली चेतावनी:लग सकती है अल्ट्रा–प्रोसेस्ड फूड की लत, डॉक्टर से जानें बचाव के 7 टिप्स स्मोकिंग सेहत के लिए खतरनाक है। यह बात सभी जानते हैं। इसलिए सिगरेट के पैकेट पर बड़े अक्षरों में चेतावनी लिखी होती है। फिर भी कई लोग खुद को एक कश लेने से नहीं रोक पाते हैं। इसकी वजह है आदत, जो धीरे-धीरे लत बन जाती है। ठीक ऐसी ही लत होती है अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड की। पूरी खबर पढ़ें…
मेंटल हेल्थ– बुढ़ापे में बीमारी का डर:मामूली दर्द भी हार्ट अटैक लगता है, टेस्ट में कुछ नहीं आता, लेकिन डर नहीं जाता, क्या करूं
सवाल– मेरी उम्र 62 साल है। मैं दो साल पहले ही गवर्नमेंट जॉब से रिटायर हुआ हूं। पिछले साल मेरे एक दोस्त को अचानक हार्ट अटैक आया और उसकी डेथ हो गई। उसके बाद से अपनी सेहत को लेकर मेरे मन में एक अजीब सा डर बैठ गया है। शरीर में हल्का-सा भी दर्द हो तो मुझे लगता है कि कोई गंभीर बीमारी हो गई है। हर छोटी प्रॉब्लम पर मैं पूरा बॉडी चेकअप करवाता हूं। डॉक्टर कहते हैं कि सब नॉर्मल है, लेकिन फिर भी मेरा मन नहीं मानता। लगता है कि मुझे भी अचानक किसी दिन हार्ट अटैक आ जाएगा। मेरी वजह से मेरी वाइफ-बच्चे भी परेशान होते हैं। मैं क्या करूं? इस डर से कैसे बाहर निकलूं? एक्सपर्ट– डॉ. द्रोण शर्मा, कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट, आयरलैंड, यूके। यूके, आयरिश और जिब्राल्टर मेडिकल काउंसिल के मेंबर। किसी करीबी दोस्त की अचानक मौत बहुत बड़ा मानसिक झटका हो सकती है। इसके बाद अपनी सेहत को लेकर ज्यादा सतर्क हो जाना भी सामान्य है। लेकिन अगर बार-बार जांच कराने के बाद भी मन को तसल्ली न मिले, हर छोटे लक्षण को गंभीर बीमारी मान लिया जाए और यह डर रोजमर्रा की जिंदगी पर असर डालने लगे तो यह सिर्फ सतर्कता नहीं है। यह हेल्थ एंग्जाइटी का संकेत हो सकता है। इसका मतलब यह नहीं कि व्यक्ति बीमारी का बहाना बना रहा है। उसे जो डर और बेचैनी महसूस होती है, वह वास्तविक है। हेल्थ एंग्जाइटी में समस्या यह है कि दिमाग सामान्य शारीरिक संकेतों को भी गंभीर बीमारी का सबूत मानने लगता है। हेल्थ एंग्जाइटी और सोमैटिक सिम्पटम डिसऑर्डर में फर्क पुराने जमाने में ऐसे मामलों को हाइपोकॉन्ड्रियासिस कहा जाता था। लेकिन अब डॉक्टर ज्यादा सटीक शब्द का इस्तेमाल करते हैं। हेल्थ एंग्जाइटी में व्यक्ति को गंभीर बीमारी होने का डर सबसे ज्यादा परेशान करता है। कई बार शरीर में कोई खास लक्षण भी नहीं होता। सोमैटिक सिम्पटम डिसऑर्डर में शरीर में दर्द, थकान या दूसरे शारीरिक लक्षण सचमुच मौजूद होते हैं। लेकिन व्यक्ति उन लक्षणों को लेकर जरूरत से ज्यादा डरने लगता है। उसकी चिंता वास्तविक खतरे से कहीं ज्यादा होती है। दोनों स्थितियों में व्यक्ति का डर असली होता है। इसलिए इसे कमजोरी या वहम कहकर टालना ठीक नहीं है। हेल्थ एंग्जाइटी का चक्र हेल्थ एंग्जाइटी में डर अक्सर एक पैटर्न पर चलता है। आसपास हुई कोई ट्रेजेडी उस डर को और बढ़ा देती है। व्यक्ति शरीर के सामान्य बदलावों को भी बीमारी का संकेत मानने लगता है। इससे चिंता और बढ़ती है। आपके केस में ट्रिगर पॉइंट था, दोस्त का हार्ट अटैक। इस पूरे चक्र को ग्राफिक से समझिए– रिटायरमेंट के बाद क्यों बढ़ती समस्या रिटायरमेंट के बाद अचानक दिनचर्या बदल जाती है। काम कम हो जाता है। लोगों से मिलना-जुलना भी घट सकता है। ऐसे में कई लोगों का ध्यान अपने शरीर पर ज्यादा जाने लगता है। अगर इसी दौरान किसी दोस्त की मौत, कोई गंभीर बीमारी या परिवार में स्वास्थ्य से जुड़ी घटना हो जाए तो यह डर और बढ़ सकता है। उम्र बढ़ने के साथ भविष्य को लेकर चिंता भी बढ़ती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर दर्द हेल्थ एंग्जाइटी है। क्या आपको हेल्थ एंग्जाइटी है? करें सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट यहां मैं आपको एक सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट दे रहा हूं। पिछले चार सप्ताह को ध्यान में रखकर नीचे दिए सवालों के जवाब दें। नीचे ग्राफिक्स में कुल 10 सवाल हैं। आपको इन सवालों को 0 से 3 के स्केल पर रेट करना है। जैसेकि पहले सवाल के लिए अगर आपका जवाब 'बिल्कुल नहीं' है तो 0 नंबर दें और अगर आपका जवाब 'लगभग हर दिन' है तो 3 नंबर दें। अंत में अपने टोटल स्कोर की एनालिसिस करें। स्कोर का इंटरप्रिटेशन भी ग्राफिक में दिया है। छह हफ्तों में कैसे कम करें यह डर? हेल्थ एंग्जाइटी से बाहर निकलने में कॉग्निटिव बिहेवियर थेरेपी (CBT) काफी असरदार मानी जाती है। इसका मकसद यह नहीं है कि आप स्वास्थ्य की परवाह करना छोड़ दें। इसका मकसद है कि आपका जीवन डर नहीं, बल्कि समझदारी से चले। पहला कदम: एंग्जाइटी जर्नल बनाएं जब भी डर लगे, डायरी में ये पांच बातें लिखिए— उदाहरण: क्या हुआ– सीने में हल्का दर्द मन में पहला विचार क्या आया– "हार्ट अटैक है" डर कितना था– 90/100 आपने क्या किया– बीपी चेक किया बाद में सही निष्कर्ष क्या निकला– पता चला कि गैस थी। इस तरह धीरे-धीरे आपका दिमाग समझने लगेगा कि हर लक्षण का मतलब गंभीर बीमारी नहीं होता। दूसरा कदम अपने विचारों को चुनौती दें हर बार खुद से चार सवाल पूछिए— याद रखिए, लक्ष्य यह नहीं है कि "मुझे कभी हार्ट अटैक नहीं होगा।" लक्ष्य यह है कि "हर धड़कन या हर दर्द हार्ट अटैक नहीं होता।" तीसरा कदम बार-बार जांच करना कम करें एक सप्ताह तक लिखिए— कितनी बार बीपी चेक किया। चौथा कदम तुरंत प्रतिक्रिया न दें पांचवां कदम फिर से सक्रिय बनें डॉक्टर की सलाह के अनुसार— व्यायाम के दौरान धड़कन बढ़ना सामान्य बात है। इसे बीमारी का संकेत मानने की जरूरत नहीं है। छठा कदम जिंदगी को फिर से जिएं रिटायरमेंट के बाद अपने जीवन की नई योजना बनाइए और समय निकालिए— हेल्थ चेकअप भी जरूरी 62 साल की उम्र में किसी भी परेशानी को सीधे मानसिक समस्या मान लेना भी सही नहीं है। इसलिए आप– डॉक्टर से मिलना कब जरूरी? अगर हेल्थ एंग्जाइटी हल्की है, तो कई लोगों को सिर्फ CBT और काउंसिलिंग से फायदा मिल जाता है। लेकिन अगर इसके साथ डिप्रेशन, पैनिक डिसऑर्डर या गंभीर एंग्जाइटी भी हो, तो डॉक्टर दवा की सलाह दे सकते हैं। याद रखें: कोई भी स्लीपिंग पिल या एंटी-एंग्जाइटी दवा अपनी मर्जी से शुरू न करें। तुरंत इमरजेंसी में जाएं, अगर… अंतिम बात हेल्थ एंग्जाइटी का मतलब यह नहीं कि आपको अपनी सेहत की चिंता छोड़ देनी चाहिए। सही तरीका यह है कि जरूरी मेडिकल जांच कराएं, डॉक्टर की सलाह मानें और डर को अपनी जिंदगी चलाने न दें। बीमारी से 100 फीसदी बचाव की गारंटी किसी के पास नहीं। लेकिन सही जानकारी, संतुलित सोच और समय पर इलाज की मदद से आप डर नहीं, बल्कि अपने जीवन को फिर से केंद्र में ला सकते हैं। ………………… मेंटल हेल्थ से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए मेंटल हेल्थ- शादी के बाद नौकरी छोड़ दी: अब सिर्फ एक पत्नी और मां हूं, सबको खुश करने की कोशिश में अपनी खुशी भूल गई, क्या करूं ये समस्या आपकी अकेले की नहीं है। हजारों महिलाएं जीवन के किसी-न-किसी मोड़ पर ये महसूस करती हैं। वे अच्छी मां हैं, जिम्मेदार पत्नी हैं, परिवार की मजबूत आधारशिला हैं, लेकिन जब बात खुद की आती है तो जवाब धुंधला पड़ जाता है। पूरी खबर पढ़िए…
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