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Monsoon Health Tips: क्या मॉनसून में दही खाने से बढ़ती है सर्दी-खांसी? जानिए फैक्ट और मिथक

Monsoon Health Tips: बारिश का मौसम शुरू होते ही खानपान को लेकर कई तरह की सलाह सुनने को मिलती है। दही भी ऐसी ही चीज है, जिसे लेकर लोगों के मन में अक्सर सवाल रहते हैं। कुछ लोग मानते हैं कि मॉनसून में दही खाने से सर्दी-जुकाम हो सकता है।

कई लोग इसे रोजाना खाते हैं। ऐसे में यह जानना जरूरी हो जाता है कि इस बात में कितनी सच्चाई है। आइए जानते हैं कि बारिश के मौसम में दही खाना सही है या नहीं।

क्या बारिश में दही खाने से सच में सर्दी-जुकाम होता है?
अक्सर लोग मानते हैं कि मॉनसून में दही खाने से सर्दी या जुकाम हो जाता है, लेकिन ऐसा मानने के लिए कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। सर्दी-जुकाम आमतौर पर वायरस की वजह से होता है। हालांकि, अगर पहले से गले में दर्द, खांसी या साइनस की समस्या है, तो बहुत ठंडा दही खाने से असहज महसूस हो सकता है।

क्या बारिश में दही खाने से सच में सर्दी-जुकाम होता है?

मॉनसून में दही खाना क्यों हो सकता है फायदेमंद?
अगर दही ताजा और अच्छी तरह रखा गया हो, तो यह सेहत के लिए अच्छा माना जाता है। इसमें प्रोटीन, कैल्शियम और पेट के लिए फायदेमंद अच्छे बैक्टीरिया पाए जाते हैं, जो पाचन को बेहतर रखने में मदद कर सकते हैं। सही मात्रा में खाया गया दही रोज की डाइट का भी अच्छा हिस्सा बन सकता है।

किन लोगों को बरतनी चाहिए थोड़ी सावधानी?

किन लोगों को बरतनी चाहिए थोड़ी सावधानी?

हर व्यक्ति का शरीर अलग तरह से काम करता है। अगर आपको दूध या उससे बनी चीजों से एलर्जी है, दही खाने के बाद पेट खराब हो जाता है या गले और साइनस की परेशानी अक्सर बनी रहती है, तो दही खाते समय थोड़ा ध्यान रखें। साथ ही हमेशा ताजा दही ही खाएं और लंबे समय तक बाहर रखा हुआ दही खाने से बचें।

मॉनसून में दही खाते समय ये बातें याद रखें 

  • कोशिश करें कि हमेशा ताजा दही ही खाएं।
  • दही को लंबे समय तक बाहर न रखें, इसे फ्रिज में ही सुरक्षित रखें।
मॉनसून में दही खाते समय ये बातें याद रखें 
  • बहुत ठंडा दही खाने से बचें, खासकर अगर गले में तकलीफ हो।
  • दही को दोपहर के खाने के साथ खाना बेहतर माना जाता है।
  • अगर दही का स्वाद, रंग या खुशबू सामान्य से अलग लगे, तो उसे खाने से बचें।

क्या बारिश में दही खाना बंद कर देना चाहिए?
सिर्फ मॉनसून आने की वजह से दही छोड़ने की जरूरत नहीं है। अगर दही खाने के बाद आपको कोई परेशानी नहीं होती, तो इसे अपनी डाइट का हिस्सा बना सकते हैं। बस इस बात का ध्यान रखें कि दही ताजा हो, सही तरीके से रखा गया हो और खराब न हुआ हो।

अगर दही खाने के बाद हर बार गले, पेट या शरीर में कोई दिक्कत महसूस होती है, तो इसे खाने से पहले डॉक्टर की सलाह लेना बेहतर रहेगा।

(Disclaimer): यह लेख सामान्य जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य किसी भी तरह की चिकित्सीय सलाह देना नहीं है। अगर आपको पहले से कोई स्वास्थ्य समस्या है, तो इसे अपनी डाइट में शामिल करने से पहले डॉक्टर या योग्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें।

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समुद्र मंथन का दूसरा चमत्कार: जानिए कल्पवृक्ष और कामधेनु गाय का रहस्य

Samudra Manthan: पिछले अध्यायों में हमने समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष और चौदह रत्नों की सूची के बारे में जाना था। इन्हीं चौदह रत्नों में दो ऐसे दिव्य उपहार भी शामिल थे, जिन्होंने ब्रह्मांड की व्यवस्था और समृद्धि में अहम भूमिका निभाई- कामधेनु गाय और कल्पवृक्ष। ये दोनों ही वस्तुएं अपनी असीम और जादुई विशेषताओं के कारण आज भी सनातन संस्कृति में आस्था के बड़े केंद्र हैं।

कामधेनु गाय: समस्त इच्छाओं की प्रदाता (सुरभी)
समुद्र मंथन के दौरान क्षीरसागर से सबसे पहले प्रकट होने वाले चमत्कारों में कामधेनु (जिसे सुरभी भी कहा जाता है) भी एक थीं। यह कोई साधारण गाय नहीं थी, बल्कि इसे समस्त गायों की माता और 'सर्वकामना प्रदात्री' माना गया है।

कामधेनु गाय की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसके सामने खड़े होकर जो भी व्यक्ति जो इच्छा व्यक्त करता था, वह तुरंत पूरी हो जाती थी। इसके दूध में अमृत के समान शक्ति थी और इसके दर्शन मात्र से ही इंसान के सारे कष्ट दूर हो जाते थे। मंथन के बाद ऋषियों और मुनियों ने यज्ञ और अनुष्ठानों की पवित्रता बनाए रखने के लिए कामधेनु गाय को अपने संरक्षण में ले लिया था।

कल्पवृक्ष: ब्रह्मांड का जादुई वृक्ष
कामधेनु के साथ ही क्षीरसागर से कल्पवृक्ष भी प्रकट हुआ था। यह एक ऐसा दिव्य वृक्ष था, जिसके पास बैठने या उसकी छांव में आने से मनुष्य की हर मनोकामना पूरी हो जाती थी। उस काल में इस वृक्ष की महिमा इतनी अधिक थी कि इसने ब्रह्मांड में भौतिक और आध्यात्मिक संतुलन स्थापित करने में मदद की।

देवताओं ने इस वृक्ष के अत्यधिक महत्व को देखते हुए इसे साधारण पृथ्वी पर न रखकर देवलोक (स्वर्ग) में स्थापित करने का निर्णय लिया, ताकि इसकी पवित्रता बनी रहे।

डिस्क्लेमर (Disclaimer): इस लेख में दी गई कथा पौराणिक ग्रंथों और सनातन धर्म की मान्यताओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य पाठकों तक भारतीय संस्कृति और पौराणिक कथाओं की जानकारी पहुंचाना है।

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