धनतेरसः धन की पूजा नहीं, धन के शुद्ध संस्कारों का पर्व
पंच पर्वों से जुड़े दीपावली महापर्व का दूसरा महत्वपूर्ण पर्व है धनतेरस। धनतेरस के दिन भगवान धनवंतरी और मां लक्ष्मी की पूजा की जाती है और इस दिन खरीदारी और दान-पुण्य करना भी शुभ माना जाता है। इस दिन को धन त्रयोदशी और धन्वंतरि जयंती के नाम से भी जाना जाता है। धनतेरस केवल दीपावली के आरंभ का पर्व नहीं, बल्कि धन के प्रति हमारी दृष्टि को परखने का अवसर है। यह वह दिन है जब भारतीय संस्कृति धन की पूजा के साथ मनुष्य को यह स्मरण कराती है कि धन साधन है, साध्य नहीं, समृद्धि जीवन का अलंकार है, जीवन का आधार नहीं। दुर्भाग्य यह है कि आधुनिक समय में धन की परिभाषा इतनी संकुचित हो गई है कि धन का अर्थ संवेदना, सदाचार और संतोष से नहीं, बल्कि संग्रह, सुविधा, प्रतिष्ठा और शक्ति से जोड़ा जाने लगा है। आज दुनिया में आर्थिक समृद्धि बढ़ी है, लेकिन क्या उसी अनुपात में मनुष्य समृद्ध हुआ है? चंद हाथों में सिमटती संपदा और बढ़ती आर्थिक विषमता ने समाज में एक विचित्र असुरक्षा पैदा की है। भौतिक सुविधाएं बढ़ी हैं, पर विश्वास घटा है। साधन बढ़े हैं, लेकिन साधना कमजोर हुई है। घर बड़े हुए, मगर हृदय छोटे होते गए। परिणामतः हिंसा, छल, भ्रष्टाचार, चोरी, शोषण, दुराचार और असीम संग्रह जैसी प्रवृत्तियां केवल समाज में नहीं, हमारे भीतर भी जगह बनाने लगी हैं। चेहरों की पहचान बची है, लेकिन चरित्र की पहचान धुंधली पड़ रही है।
धनतेरस का वास्तविक संदेश इसी विसंगति को दूर करने में छिपा है। धन का विरोध भारतीय चिंतन कभी नहीं करता, वह धन के अंधे संग्रह और उसके अनुचित उपयोग का विरोध करता है। सनातन दृष्टि में लक्ष्मी तभी मंगलकारी है, जब वह धर्म और लोकमंगल से जुड़ी हो। भगवान महावीर का अपरिग्रह हमें बताते हैं कि आवश्यकता से अधिक संग्रह अंततः मनुष्य को वस्तुओं का स्वामी नहीं, वस्तुओं का दास बना देता है। जैन दर्शन का संयम और अल्पीकरण केवल साधु जीवन की साधना नहीं, बल्कि गृहस्थ जीवन के लिए भी एक महत्वपूर्ण जीवन-दृष्टि है। महात्मा गांधी ने धन के इसी प्रश्न को ट्रस्टीशिप के सिद्धांत से जोड़ा। उनके लिए संपत्ति का अधिकार केवल निजी उपभोग का अधिकार नहीं था, बल्कि समाज के प्रति उत्तरदायित्व भी था। धन हमारे पास हो सकता है, लेकिन उसका अंतिम अर्थ तभी है जब उससे किसी और के जीवन में आशा, सम्मान और अवसर पैदा हों। इसलिए प्रश्न यह नहीं कि हमारे पास कितना धन है, प्रश्न यह है कि हमारे धन का हमारे चरित्र पर कितना अधिकार है और हमारे धन से समाज को कितना अधिकार मिलता है।
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धनतेरस धन की कामना का पर्व है। इस दृष्टि से यह अर्थव्यवस्था का पर्व है। अर्थ से अर्थ-व्यवस्था का सम्यक् एवं गुणात्मक संधान। इस दिन घर एवं बाजारों में आशा के दीप सजते हैं, मुद्रा का आदान-प्रदान होता है। मान्यता है कि इस दिन खरीदी गई चीजों में कई गुना वृद्धि हो जाती है। शास्त्रों में बताया गया है कि इस दिन कुछ उपाय करने से घर में धन-धान्य के भंडार भर जाते हैं और मां लक्ष्मी की कृपा सदैव बनी रहती है। तम मिटाती धनतेरस और प्रकाश बांटती लक्ष्मी यानी भारतीय पद्धति के अनुसार प्रत्येक आराधना, उपासना व अर्चना में आधिभौतिक, आध्यात्मिक और आधिदैविक इन तीनों रूपों का समन्वित व्यवहार होता है। इस तरह इस उत्सव में उपरोक्त तीनों प्रकार से लक्ष्मी की उपासना यानी धन एवं सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति के जनक धन्वंतरि देव समुद्र मंथन से प्रकट हुए थे और प्रकट होते समय उनके हाथ में अमृत से भरा कलश था। यही कारण है कि इस दिन बर्तन खरीदे जाते हैं। हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, धन संपदा की देवी मां लक्ष्मी धनतेरस के दिन ही समुद्र मंथन के दौरान प्रकट हुईं थीं इसीलिए ऐसा माना जाता है कि इस दिन सोना-चांदी घर लाने से मां लक्ष्मी प्रसन्न होती है, घर में सुख-शांति, समृद्धि एवं खुशहाली आती है और अच्छा भाग्य भी घर लाते हैं। सोना खरीदने से बुरी शक्तियां और नकारात्मक ऊर्जा घर से दूर होती है। कई परिवार इस दिन सोना-चांदी खरीदकर अपनी सैकड़ों साल पुरानी परंपरा का पालन करते हुए इस दिन दिव्यता एवं धन की देवी लक्ष्मी देवी की पूजा करते हैं।
लक्ष्मीजी का स्वरूप त्रिगुणात्मक है। उनका वास तन, मन और धन तीनों में है। पांच प्रकार के सुख कहे गये हैं- तन, मन, धन, पत्नी और संतान। देवी भगवती कमला यानी लक्ष्मीजी के आठ रूप कहे गये हैं। आद्य लक्ष्मी या महालक्ष्मी (कन्या), धन लक्ष्मी (धन, वैभव, निवेश, अर्थव्यवस्था), धान्य लक्ष्मी (अन्न), गजलक्ष्मी (पशु व प्राकृतिक धन), सनातना लक्ष्मी (सौभाग्य, स्वास्थ्य, आयु व समृद्धि), वीरा लक्ष्मी (वीरोचित लक्ष्मी अर्थात रक्षा, सुरक्षा), विजया लक्ष्मी (दिगदिगंत विजय), विद्या लक्ष्मी (विद्या, ज्ञान, कला विज्ञान), इन आठों स्वरूपों को मिलाकर महालक्ष्मी का पर्व बना दिवाली। दिवाली अर्थात दीप पर्व। जहां इन आठों स्वरूपों का प्रकाश हो, वहां दिवाली निश्चित रूप से होती है। प्रकाश, पुष्टि, प्रगति की प्रार्थना के साथ। दूसरे अर्थ में समझिए। लक्ष्मीजी का वास एक लघु इकाई में है। एक माटी के दीपक में है। उसके प्रकाश में है। एक फकीर की भी दिवाली है तो एक अमीर की भी। एक कुम्हार की भी दिवाली है, तो एक सर्राफ की भी। यही लक्ष्मी है। मन की लक्ष्मी। सबकी लक्ष्मी। इसका आशय यह है कि तन, मन, धन, परिवार और संतान की पुष्टि एक दीप की तरह प्रकाशवान रहें। धनवर्षा के साथ, अमृतवर्षा के साथ।
आज आवश्यकता धन कमाने की नहीं, धन कमाने की शुद्ध पद्धति और उसके शुद्ध उपयोग की है। यदि साध्य समृद्धि है तो साधन भी शुद्ध होने चाहिए। बेईमानी, शोषण, छल और भ्रष्टाचार से अर्जित धन चाहे कितनी भी बड़ी संपत्ति क्यों न बना दे, वह जीवन में शांति और समाज में सम्मान नहीं ला सकता। इसके विपरीत परिश्रम, ईमानदारी और नैतिकता से अर्जित सीमित धन भी जीवन को गरिमा प्रदान करता है। धनतेरस हमें संग्रह के साथ विसर्जन की चेतना देता है। जिस धन का प्रवाह समाज तक नहीं पहुँचता, वह अंततः जड़ हो जाता है। दान, सेवा, शिक्षा, चिकित्सा, जरूरतमंदों की सहायता, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक उत्थान में धन का उपयोग उसकी सार्थकता बढ़ाता है। दीपक की तरह धन भी तभी प्रकाश देता है, जब वह स्वयं जलकर दूसरों के जीवन में उजाला फैलाए।
इसलिए धनतेरस पर हमें केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि इस वर्ष हमारी संपत्ति कितनी बढ़ी, बल्कि यह भी पूछना चाहिए कि हमारा संतोष कितना बढ़ा, हमारा चरित्र कितना मजबूत हुआ, हमारी करुणा कितनी गहरी हुई और हमारे धन से कितने जीवनों में उजाला आया। हमारे पास कार न हो, कोठी न हो, ऊँची कुर्सी न हो-कोई बात नहीं, लेकिन हमारे पास ईमान, इंसानियत, आत्मसम्मान, संयम और चरित्र अवश्य होना चाहिए। यही वह संपदा है जिसे न बाजार खरीद सकता है, न समय छीन सकता है। धनतेरस का दीप तभी सच्चे अर्थों में जलेगा, जब हमारे भीतर धन के साथ धर्म, समृद्धि के साथ संवेदना, भोग के साथ संयम और अधिकार के साथ उत्तरदायित्व का प्रकाश भी जले। धन की समृद्धि जीवन को सुविधापूर्ण बना सकती है, लेकिन चरित्र की समृद्धि ही जीवन को महान बनाती है। यही धनतेरस का सनातन संदेश है और यही आधुनिक समाज की सबसे बड़ी आवश्यकता भी।
- ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
मुंबई: 5 महीने की लंबी लड़ाई के बाद 700 ग्राम के प्रीमेच्योर बच्चे को मिली नई जिंदगी
मुंबई, 8 नवंबर (आईएएनएस)। नवजात शिशु देखभाल (नियोनेटल केयर) के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए एक सरकारी अस्पताल ने समय से पहले जन्मे एक बच्चे को 5 महीने की लंबी लड़ाई के बाद नई जिंदगी दी है।
जन्म के समय, इस बच्चे का वजन केवल 700 ग्राम था।
बच्चे की नाजुक हालत को देखते हुए उसे मुंबई के केईएम अस्पताल के नियोनेटल इंटेंसिव केयर यूनिट (एनआईसीयू) में भर्ती कराया गया था।
बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) द्वारा संचालित इस अस्पताल और मेडिकल कॉलेज ने 5 महीने तक 700 ग्राम के इस बच्चे की देखभाल की। रविवार को जब उसका वजन 3.3 किलोग्राम हो गया, तो उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।
अस्पताल ने एक बयान में कहा कि नियोनेटल इंटेंसिव केयर यूनिट (एनआईसीयू) में 5 महीने बिताने के बाद, बच्चा 3.3 किलोग्राम वजन के साथ घर गया है और वह पूरी तरह से मां का दूध पी रहा है।
नवजात शिशुओं को नया जीवन देने वाली यह नवजात देखभाल (नियोनेटल केयर), नियोनेटोलॉजी विभाग की प्रमुख अनीता हरिबालकृष्ण की देखरेख में की गई। इसमें एक लंबी और चुनौतीपूर्ण प्रक्रिया शामिल थी, जिसके लिए गहन देखभाल (इंटेंसिव केयर) और श्वसन सहायता (रेस्पिरेटरी सपोर्ट) की आवश्यकता थी।
डॉक्टर ने बताया कि बच्चे ने जानलेवा जटिलताओं का सामना किया। लगातार निगरानी, कई विशेषज्ञों की मिली-जुली देखभाल, और समर्पित मेडिकल व नर्सिंग सपोर्ट की मदद से इन जटिलताओं पर धीरे-धीरे काबू पा लिया गया।
अस्पताल ने कहा कि बच्चे का सफलतापूर्वक अस्पताल से डिस्चार्ज होना, केईएम अस्पताल में उपलब्ध विशेष नवजात देखभाल की गुणवत्ता को दर्शाता है। यह अस्पताल की एनआईसीयू सुविधाओं, डॉक्टरों की विशेषज्ञता, बेहतरीन टीम वर्क और मरीजों की लगातार देखभाल करने की सामूहिक ताकत का परिणाम है, जिसकी मदद से सबसे नाजुक नवजात शिशुओं का इलाज संभव हो पाता है।
गौरतलब है कि नवजात देखभाल के क्षेत्र में यह कोई पहली बड़ी उपलब्धि या मिसाल नहीं है।
इस साल मार्च में, नागपुर के एक सरकारी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञों ने 700 ग्राम वजन वाले एक और बच्चे की जान बचाई थी, जिसका जन्म 26 सप्ताह में ही समय से पहले (प्रीमेच्योर) हो गया था।
एनआईसीयू में 100 दिनों की सघन देखभाल और चौबीसों घंटे निगरानी के बाद, डॉक्टर बच्चे को बचाने में सफल रहे। जब बच्चे का वजन 1.88 किलोग्राम हो गया, तो उसे स्थिर हालत में अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।
डॉक्टरों के अनुसार, समय से पहले जन्मे इस बच्चे को सांस लेने में गंभीर परेशानी हो रही थी, और जन्मजात हृदय संबंधी समस्याओं का भी इलाज किया गया।
चौबीसों घंटे देखभाल की बदौलत बच्चे का वजन और स्वास्थ्य बेहतर हुआ। यह डॉक्टरों की समर्पित कोशिशों और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की मजबूती को दर्शाता है।
--आईएएनएस
एमएस/
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