छोटी दीपावली: अंधकार पर प्रकाश और बुराई पर अच्छाई की विजय का पर्व
दीपावली भारत के सबसे महत्त्वपूर्ण और उल्लासपूर्ण त्योहारों में से एक है। पांच दिनों तक चलने वाले इस पर्व की प्रत्येक तिथि का अपना धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्त्व है। दीपावली से एक दिन पहले मनाई जाने वाली छोटी दीपावली को नरक चतुर्दशी, रूप चौदस और नरक निवारण चतुर्दशी के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व बुराई पर अच्छाई, अज्ञान पर ज्ञान और अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है। इस दिन दीप जलाने, भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करने, यमदीपदान और घर की स्वच्छता जैसी परंपराओं का विशेष महत्त्व है।
कब मनाई जाती है छोटी दीपावली?
हिंदू पंचांग के अनुसार छोटी दीपावली कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है। यह सामान्यतः अक्टूबर या नवंबर में पड़ती है। इसे नरक चतुर्दशी इसलिए कहा जाता है, क्योंकि पौराणिक मान्यता के अनुसार इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर नामक दैत्य का वध करके उसके अत्याचारों से लोगों को मुक्ति दिलाई थी। कुछ क्षेत्रों में इसे रूप चौदस भी कहा जाता है, जहां प्रातःकाल स्नान, उबटन और सौंदर्य संबंधी पारंपरिक विधियों का विशेष महत्त्व है।
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छोटी दीपावली का एक प्रमुख उद्देश्य मुख्य दीपावली के स्वागत की तैयारी करना भी है। इस दिन घरों की सफाई पूरी की जाती है, दीपक सजाए जाते हैं और संध्या समय घर के कोनों तथा द्वार पर दीप प्रज्ज्वलित किए जाते हैं।
नरकासुर वध की पौराणिक कथा
छोटी दीपावली से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथा भगवान श्रीकृष्ण और नरकासुर की है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार, नरकासुर एक शक्तिशाली असुर था, जिसने अपने बल और अहंकार के कारण देवताओं तथा अनेक निर्दोष लोगों को परेशान कर रखा था। उसने कई राजाओं को पराजित किया और अनेक स्त्रियों को बंदी बना लिया था। उसके अत्याचारों से त्रस्त होकर देवताओं ने भगवान श्रीकृष्ण से सहायता की प्रार्थना की।
कथा के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ नरकासुर के विरुद्ध युद्ध किया और उसका वध कर दिया। इसके बाद बंदी बनाई गई स्त्रियों को मुक्त कराया गया तथा लोगों को भय और अत्याचार से छुटकारा मिला। इस विजय की खुशी में दीप जलाए गए और उत्सव मनाया गया। इसी घटना की स्मृति में नरक चतुर्दशी मनाने की परंपरा प्रचलित हुई।
इस कथा का आध्यात्मिक संदेश यह है कि जब अहंकार, क्रूरता और अन्याय अपनी सीमाएं पार कर जाते हैं, तब उनका अंत निश्चित होता है। छोटी दीपावली हमें अपने भीतर मौजूद नकारात्मक विचारों, क्रोध, लोभ और अहंकार को दूर करने की प्रेरणा भी देती है।
छोटी दीपावली की पूजन विधि और धार्मिक महत्त्व
छोटी दीपावली के दिन प्रातःकाल उठकर स्नान करने की परंपरा है। कुछ क्षेत्रों में सूर्योदय से पहले तेल लगाकर उबटन से स्नान किया जाता है, जिसे अभ्यंग स्नान कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस स्नान से पापों का क्षय होता है और व्यक्ति को आरोग्य तथा सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
संध्या के समय घर के मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण, भगवान गणेश और माता लक्ष्मी का स्मरण कर दीपक जलाए जाते हैं। घर के मुख्य द्वार, आंगन और अन्य स्थानों पर दीप प्रज्ज्वलित किए जाते हैं। पूजा में पुष्प, धूप, दीप, अक्षत और मिठाइयां अर्पित की जाती हैं। इस दिन यमराज के निमित्त दीपदान की भी परंपरा है। मान्यता के अनुसार, घर के बाहर दक्षिण दिशा में दीपक जलाकर परिवार के सदस्यों की दीर्घायु और अकाल मृत्यु से रक्षा की प्रार्थना की जाती है।
छोटी दीपावली के अवसर पर विशेष रूप से भगवान श्रीकृष्ण की आराधना की जाती है, क्योंकि नरकासुर के वध को अधर्म पर धर्म की विजय के रूप में देखा जाता है। हालांकि, अलग-अलग क्षेत्रों में पूजा की परंपराओं और विधियों में अंतर भी मिलता है।
रूप चौदस और दीपोत्सव की तैयारी
छोटी दीपावली को रूप चौदस कहे जाने के पीछे सौंदर्य, स्वच्छता और शारीरिक शुद्धता की परंपरा है। इस दिन महिलाएं और पुरुष पारंपरिक रूप से उबटन लगाते हैं तथा स्नान करके स्वयं को दीपावली के मुख्य पर्व के लिए तैयार करते हैं। इसका सांकेतिक अर्थ बाहरी स्वच्छता के साथ मन और विचारों को भी निर्मल बनाना है।
यह दिन दीपावली के स्वागत का अवसर भी है। घरों को दीपों और रंगोली से सजाया जाता है, परिवार के सदस्य मिलकर मिठाइयां तैयार करते हैं और उत्सव की खुशियां बांटते हैं। दीपक की लौ हमें याद दिलाती है कि कठिन परिस्थितियों में भी आशा का प्रकाश बनाए रखना चाहिए।
छोटी दीपावली का संदेश
छोटी दीपावली केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। यह पर्व हमें अन्याय के विरुद्ध खड़े होने, अहंकार का त्याग करने और अपने जीवन में सकारात्मकता लाने की प्रेरणा देता है। नरकासुर के वध की कथा हमें बताती है कि शक्ति का उपयोग दूसरों को दबाने के लिए नहीं, बल्कि उनकी रक्षा और स्वतंत्रता के लिए होना चाहिए।
आज के समय में छोटी दीपावली का संदेश और भी प्रासंगिक है। हमें अपने भीतर के अंधकार को दूर करने, आपसी मतभेद भुलाने और समाज में प्रेम, सद्भाव तथा सहयोग बढ़ाने का संकल्प लेना चाहिए। दीप जलाने की सार्थकता तभी है, जब हमारे व्यवहार से किसी दूसरे के जीवन में भी उजाला आए।
शुभा दुबे
Narak Chaturdashi 2026: नरक से मुक्ति और अकाल मृत्यु से रक्षा का पर्व है नरक चतुर्दशी
कार्तिक कृष्ण पक्ष में मनाए जाने वाले पांच दिवसीय दीपोत्सव का दूसरा पर्व नरक चतुर्दशी है, जिसे छोटी दीपावली, रूप चतुर्दशी और काली चौदस के नाम से भी जाना जाता है। धनतेरस के अगले दिन मनाया जाने वाला यह पर्व धार्मिक आस्था, पौराणिक मान्यताओं और आध्यात्मिक संदेशों का अनूठा संगम है। ‘नरक चतुर्दशी’ नाम से ही स्पष्ट होता है कि इसका संबंध मृत्यु के देवता यमराज और नरक से मुक्ति की मान्यता से जुड़ा है। धार्मिक विश्वास है कि इस दिन यमराज की पूजा, व्रत और दीपदान करने से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है तथा मनुष्य को नरक की यातनाओं से मुक्ति मिलती है। यह पर्व बुराई पर अच्छाई, अत्याचार पर न्याय और अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है। इस पर्व पर अभ्यंग स्नान का विशेष महत्व है। मान्यता है कि सूर्योदय से पूर्व शरीर पर तिल का तेल लगाकर उबटन करने और स्नान करने से रूप, सौंदर्य तथा आरोग्य की प्राप्ति होती है। इसी कारण इसे रूप चतुर्दशी भी कहा जाता है। इस दिन घरों की साफ-सफाई, दीप प्रज्वलन, हनुमान जी की पूजा और यमराज के निमित्त दीपदान करने की परंपरा भी प्रचलित है। विशेष रूप से घर के बाहर दक्षिण दिशा में दीपक जलाकर यमराज से परिवार की सुख-समृद्धि और दीर्घायु की कामना की जाती है।
इस वर्ष चतुर्दशी तिथि दो दिन रहने के कारण पर्व की तिथि को लेकर असमंजस की स्थिति है। कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी 7 नवंबर को सुबह 10 बजकर 47 मिनट से प्रारंभ होकर 8 नवंबर को सुबह 11 बजकर 27 मिनट तक रहेगी। प्रदोष काल में चतुर्दशी तिथि होने के कारण यम दीपदान, हनुमान पूजा और काली चौदस की पूजा 7 नवंबर को की जाएगी जबकि उदयातिथि के अनुसार 8 नवंबर की सुबह अभ्यंग स्नान होगा। नरक चतुर्दशी केवल धार्मिक कर्मकांड का पर्व नहीं है बल्कि जीवन से नकारात्मकता, अहंकार और बुराइयों को दूर कर सद्गुणों का प्रकाश फैलाने की प्रेरणा भी देता है। इसका संदेश है कि जिस प्रकार दीपक अंधकार को मिटाता है, उसी प्रकार सदाचार, विवेक और सकारात्मकता मनुष्य के जीवन से अज्ञान तथा विकारों के अंधकार को दूर कर सकते हैं।
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‘नरक चतुर्दशी’ पर्व को ‘नरक चौदस’, ‘रूप चतुर्दशी’, ‘काल चतुर्दशी’ तथा ‘छोटी दीवाली’ के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन मृत्यु के देवता यमराज और धर्मराज चित्रगुप्त का पूजन किया जाता है और यमराज से प्रार्थना की जाती है कि उनकी कृपा से हमें नरक के भय से मुक्ति मिले। इसी दिन रामभक्त हनुमान का भी जन्म हुआ था और इसी दिन वामन अवतार में भगवान विष्णु ने राजा बलि से तीन पग भूमि दान में मांगते हुए तीनों लोकों सहित बलि के शरीर को भी अपने तीन पगों में नाप लिया था। हनुमान जयंती वैसे तो चैत्र मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है, लेकिन उत्तर भारत के कई भागों में यह दीवाली से एक दिन पहले भी मनाई जाती है। यम को मृत्यु का देवता और संयम के अधिष्ठाता देव माना गया है। नरक चतुर्दशी के दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करना शुभ माना गया है और सायंकाल के समय यम के लिए दीपदान किया जाता है। आशय यही है कि संयम-नियम से रहने वालों को मृत्यु से जरा भी भयभीत नहीं होना चाहिए। इस दिन सूर्योदय से पहले स्नान करने का आशय ही आलस्य का त्याग करने से है और इसका सीधा संदेश यही है कि संयम और नियम से रहने से उनका स्वास्थ्य उत्तम रहेगा और उनकी अपनी साधना ही उनकी रक्षा करेगी।
नरक चतुर्दशी के साथ भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध की पौराणिक कथा भी जुड़ी हुई है। नरक चतुर्दशी मनाए जाने के संबंध में मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने इसी दिन प्रागज्योतिषपुर के राजा ‘नरकासुर’ नामक अधर्मी राक्षस का वध किया था और ऐसा करके उन्होंने न केवल पृथ्वीवासियों को बल्कि देवताओं को भी उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाई थी। उसके आतंक से पृथ्वी के समस्त शूरवीर और सम्राट भी थर-थर कांपते थे। अपनी शक्ति के घमंड में चूर नरकासुर शक्ति का दुरूपयोग करते हुए स्त्रियों पर भी अत्याचार करता था। उसने 16000 मानव, देव एवं गंधर्व कन्याओं को बंदी बना रखा था। देवों और ऋषि-मुनियों के अनुरोध पर भगवान श्रीकृष्ण ने सत्यभामा के सहयोग से नरकासुर का संहार किया था और उसके बंदीगृह से 16000 कन्याओं को मुक्ति दिलाई थी। नरकासुर से मुक्ति पाने की खुशी में देवगण व पृथ्वीवासी बहुत आनंदित हुए और उन्होंने यह पर्व मनाया गया। माना जाता है कि तभी से इस पर्व को मनाए जाने की परम्परा शुरू हुई।
धनतेरस, नरक चतुर्दशी तथा दीवाली के दिन दीपक जलाए जाने के संबंध में एक मान्यता यह भी है कि इन दिनों में वामन भगवान ने अपने तीन पगों में सम्पूर्ण पृथ्वी, पाताल लोक, ब्रह्माण्ड व महादानवीर दैत्यराज बलि के शरीर को नाप लिया था और इन तीन पगों की महत्ता के कारण ही लोग यम यातना से मुक्ति पाने के उद्देश्य से तीन दिनों तक दीपक जलाते हैं तथा सुख, समृद्धि एवं ऐश्वर्य की प्राप्ति हेतु मां लक्ष्मी का पूजन करते हैं। यह भी कहा जाता है कि बलि की दानवीरता से प्रभावित होकर भगवान विष्णु ने बाद में पाताल लोक का शासन बलि को ही सौंपते हुए उसे आशीर्वाद दिया था कि उसकी याद में पृथ्वीवासी लगातार तीन दिन तक हर वर्ष उनके लिए दीपदान करेंगे। नरक चतुर्दशी का संबंध स्वच्छता से भी है। इस दिन लोग अपने घरों का कूड़ा-कचरा बाहर निकालते हैं। इसके अलावा यह भी मान्यता है कि इस दिन प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व तेल एवं उबटन लगाकर स्नान करने से पुण्य मिलता है।
- योगेश कुमार गोयल
(लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और हिन्दी अकादमी दिल्ली के सौजन्य से प्रकाशित ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ पुस्तक के लेखक हैं)
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